Anand Kumar/AI-Generated Image
सारांशः ज़्यादातर निवेशक किसी दिन अपने फ़ंड गिनते हैं और एक ऐसा आंकड़ा पाते हैं जिसे वो ठीक से समझा भी नहीं पाते. आम सलाह यही होती है कि इन्हें समेट लो. पर हमें लगता है कि यही सलाह, बिना सोचे अपनाई जाए, तो जितना बचाती है उससे ज़्यादा गंवा देती है.
अपने म्यूचुअल फ़ंड गिनिए. संख्या देखकर हैरान हुए? ज़्यादातर निवेशक होंगे. भारत में पोर्टफ़ोलियो में फ़ंड बस अपने आप जमा होते जाते हैं. एक फ़ंड इसलिए ख़रीदा क्योंकि वो पिछले साल की लिस्ट में सबसे ऊपर था. दूसरा किसी नए फ़ंड ऑफ़र से, जिसे कोई डिस्ट्रीब्यूटर बेच रहा था. कुछ SIP सालों पहले शुरू कीं और फिर कभी देखा ही नहीं. और एक दिन जब आप गिनते हैं, तो 23 निकलते हैं.
अगर आप शुरू से पोर्टफ़ोलियो बना रहे हैं, तो जो भी फ़ंड जोड़ें, सोच-समझकर जोड़ें. चंद फ़ंड के बाद, हर नया फ़ंड ज़्यादातर वही दोहराता है जो आपके पास पहले से है, और आपका पैसा इतने हिस्सों में बंट जाता है कि किसी एक फ़ंड में इतना वज़न ही नहीं बचता कि वो कोई फ़र्क़ डाल सके.
पर क्या हो अगर यह जमावड़ा पहले से मौजूद हो? आम सलाह झट से आती है: समेट लो. इन्हें घटाकर पांच-छह कर लो. बाक़ी बेच दो.
हमें लगता है कि यह सलाह, आंख मूंदकर अपनाई जाए, तो एक महंगी ग़लती है.
यह सलाह एक बात से चूक जाती है, वो यह है- मुनाफ़े वाले हर इक्विटी फ़ंड को बेचने पर, आप अपने लॉन्ग-टर्म मुनाफ़े का 12.5% टैक्स में दे देते हैं. अगर आपके पास जो फ़ंड हैं वो अच्छे हैं, तो सिर्फ़ लिस्ट छोटी करने के लिए कुछ बेच देना आपको एक छोटी लिस्ट के अलावा कुछ नहीं देता. आप सजावट के लिए असली पैसा चुका देते हैं. और आज एक दर्जन फ़ंड पर नज़र रखना बस कुछ मिनटों का काम है. अच्छे फ़ंड से भरा पोर्टफ़ोलियो एक ऊपरी दिखावे की समस्या है. टाला जा सकने वाला टैक्स चुकाना एक असली समस्या है.
तो क्या कभी बेचना ही नहीं चाहिए? नहीं. कुछ फ़ंड को तो जाना ही चाहिए: लंबे समय से पिछड़ते फ़ंड और वो महंगे प्लान जिनके सस्ते जुड़वां मौजूद हैं. और इसके आगे एक ज़्यादा मुश्किल सवाल है. जब आपको पैसा चाहिए हो, किसी लक्ष्य के लिए या किसी अचानक ख़र्च के लिए, तो आप अपने कौन से फ़ंड बेचेंगे? अगर आपके पास सब कुछ अच्छा है, तो यह चुनाव मुश्किल हो जाता है और ग़लत चुन लेना टाला जा सकने वाला टैक्स ला सकता है या आपके पोर्टफ़ोलियो का संतुलन बिगाड़ सकता है. ज़्यादातर निवेशक यह फ़ैसला हड़बड़ी में लेते हैं, जबकि एक आसान, बार-बार दोहराया जा सकने वाला तरीक़ा उनके लिए कहीं बेहतर रहता.
यही वो बात है जिसे धीरेंद्र कुमार और मैं इस महीने के Fund Advisor Live में उठा रहे हैं, शनिवार, 25 जुलाई को दोपहर 12 बजे. पोर्टफ़ोलियो बनाते वक़्त कितने फ़ंड काफ़ी हैं. अच्छे फ़ंड से भरे पोर्टफ़ोलियो को अक्सर वैसे ही छोड़ देना क्यों बेहतर होता है. और जब आपको सच में बेचना पड़े, तो कैसे तय करें कि पहले कौन सा फ़ंड जाएगा.
यह सेशन वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र के सब्सक्राइबरों के लिए है, जो अपने सवाल लाइव पूछेंगे. अगर आपके पास इतने फ़ंड हैं जितने आप समझा भी नहीं सकते, और आप तय नहीं कर पा रहे कि बेचें या बने रहें, तो उनके साथ जुड़ने के लिए यह हफ़्ता अच्छा है.
फ़ंड की भीड़ को समेटना हमेशा समझदारी नहीं होती, कई बार इससे बेवजह टैक्स का बोझ पड़ता है. वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपको बताता है कि क्या रखना है, क्या बेचना है और कब.
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