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इक्विटी रिसर्च की बड़ी परेशानियां

एक ही दिन में फ़ेसबुक स्टॉक का इतना बड़ा क्रैश ये दिखाता है कि इक्विटी रिसर्च में काफ़ी गंभीर समस्याएं हैं।

एक ही दिन में फ़ेसबुक स्टॉक का इतना बड़ा क्रैश ये दिखाता है कि इक्विटी रिसर्च में काफ़ी गंभीर समस्याएं हैं।

फ़रवरी की 3 तारीख़ को फ़ेसबुक (जो अब मेटा है) के 250 बिलियन डॉलर के मार्केट कैपिटलाईज़ेशन का सफ़ाया हो गया। ये सर चकरा देने वाली रक़म है। मैं इसकी तुलना, कुछ देशों की करंसी और उनके जीडीपी से कर के किसी को शर्मिंदा नहीं करूंगा, मगर इस आंकड़े पर इतना कहना ही काफ़ी है कि दुनिया में सिर्फ़ 30 ही कंपनियां हैं जिनकी पूरी मार्केट-कैप, इस रक़म से ज़्यादा है। साथ ही इस घटना को उस ‘शर्मिंदगी का स्मारक’ कहा जा सकता है... जो फ़ेसबुक ही नहीं, बल्कि इक्विटी रिसर्च और आम संस्थागत निवेश के लिए एक सटीक उपमा लगती है।

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इस घटना के इतनी तेज़ी से होने की कोई वजह नहीं थी। फ़ेसुबक की जो एक चौथाई ट्रिलियन डॉलर की वैल्यू ग़ायब हुई, वो दरअसल पहले से ही मौजूद नहीं थी। अब फ़ेसबुक की वैल्यू घट कर, मई 2020 के आस-पास आ गई है जो उस समय चीनी वायरस की वजह से फैली घबराहट के दौर में थी। यानि, फ़ेसबुक और कुछ दूसरे स्टॉक्स में जो उबाल आया हुआ था, वो अब उतर गया है।

मैं समझता हूं कि मेरे पाठकों में बहुत कम ही ऐसे होंगे, जिन्होंने सीधा फ़ेसबुक में निवेश होगा। हालांकि जिन्होंने विदेश में निवेश करने वाले भारतीय म्यूचुअल फ़ंड्स में निवेश किया होगा, उन का इस स्टॉक में कुछ एक्सपोज़र ज़रूर होगा। पर असल परेशानी की वजह है, फ़ेसबुक का इस तरह से अपनी वैल्यू गंवाना। और ये बात यहीं तक सीमित नहीं है, क्योंकि यही परेशानी भारतीय स्टॉक मार्केट में भी मौजूद है।

फ़ेसबुक ने कुछ ऐसे क्रैश किया, जैसे अचानक कोई बहुत बड़ी चौंका देने वाली घटना घट गई हो और वॉल स्ट्रीट-यानि संस्थागत निवेशक-सच में एक ब्लैक स्वान इवेंट का सामना कर रहे हों। ...और ये घटना क्या थी? दरअसल, एप्पल ने अपने नए मोबाईल ऑपरेटिंग सिस्टम के iOS 14 वेरिएंट में, एप की प्राईवेसी में बदलाव किए हैं। इन बदलावों की वजह से फ़ेसबुक का रेवेन्यू काफ़ी कम हो जाएगा। कितना कम? फ़ेसबुक का अनुमान है कि साल 2022 में ये नुकसान 10 बिलियन यूएस डॉलर का होगा(2021 में कुल रेवेन्यू 119 बिलियन यूएस डॉलर था)। कुछ दूसरे विश्लेषक इस नुकसान को 25-30 बिलियन डॉलर तक मान रहे हैं।

इस तरह से देखें तो लगता है कि नुकसान का अंदेशा और उस पर मार्केट की प्रतिक्रिया तर्कसंगत है। मगर अजीब बात ये है-कि ये बात तो महीनों पहले से पता थी। iOS 14 की घोषणा, जून 2020 में की गई थी और iOS का ये वर्ज़न, उसी साल सितंबर में लोगों के लिए उपलब्ध भी था। एप को ट्रैक करने वाला - ट्रांसपेरंसी प्राईवेसी प्रोटेक्शन फ़ीचर, जिसने फ़ेसबुक के विज्ञापन का बिज़नस तबाह किया, वो iOS 14.5 अप्रैल 2021 में ही लाईव हो गया था। और-तो-और इसके डीटेल्स इससे भी कई महीने पहले से सबको पता थे। इस वर्ज़न के लाईव होने के ठीक बाद, विज्ञापन देने वाले, विज्ञापनों के आसानी से न दिखने की शिकायतें कर रहे थे और ये बातें भी होने लगी थीं कि अगर विज्ञापनों के दिखने की मुश्किलें जल्द सुलझाई नहीं जातीं, तो वो विज्ञापनों के बजट को कम कर देंगे। सोशल मीडिया पर, कुछ एडवरटाईज़र, विज्ञापनों के रिस्पॉन्स में 80-100% की कमी की शिकायत कर रहे थे, और कह रहे थे कि वो फ़ेसबुक के विज्ञापनों पर ख़र्च करना बंद कर देंगे।

अगर आप इस तरह की बातचीत की रिपोर्ट गूगल करते हैं, तो इस फ़ीचर के लॉंच होते ही आपको ऐसे कई बयानों की रिपोर्ट दिख जाएंगी। और जो लोग डिजिटल एडवरटाईज़िंग ट्रैक करते हैं, वो इसके बारे में अच्छी तरह से जानते थे, सिवा एक ख़ास सेक्शन के लोगों के: वॉल स्ट्रीट, यानि यूएस इक्विटी निवेश की कम्यूनिटी। ये बात वॉल स्ट्रीट के लिए पूरी तरह से एक सीक्रेट थी। इस पूरे अर्से के दौरान, जब फ़ेसबुक की मुसीबत फल-फूल रही थी, तो सितंबर 2021 में वॉल स्ट्रीट ने कंपनी के शेयरों को एक ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा की ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचा दिया। इसके बाद, स्टॉक के दाम नीचे गिरते चले गए, मगर ये उसके मुक़ाबले कुछ भी नहीं था जो 3 फ़रवरी को घटा।

तो बुनियादी तौर पर ये दिखाता है कि वॉल स्ट्रीट, फ़ेसबुक पर कोई रिसर्च नहीं कर रहा था। उन्हें इस बात की कोई समझ ही नहीं थी कि कंपनी के कस्टमर (विज्ञापन देने वाले) किस अनुभव से गुज़र रहे हैं। वो तभी जागे, जब फ़ेसबुक ने ख़ुद इसे मान लिया। और ये बात हम उस कंपनी की कर रहे हैं जिसकी वैल्यू कुछ महीने पहले तक एक ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा थी!

आखिर ये सब क्या दिखाता है? मुझे लगता है कि ये इन बातों का मिलाजुला रूप है: अयोग्यता, आलसीपन और मिलीभगत, और ये बात सिर्फ़ उनकी ही नहीं है जो फ़ेसकबुक या फिर सिर्फ़ यूएस कंपनियों का आकलन करते हैं, यही बात मुझे भारत के संदर्भ में भी नज़र आती है। कई वजहों से, इन्टरनेट पर आधारित बिज़नस पर इसका असर और भी बुरा होता है। इसमें कोई शक नहीं कि इन्टरनेट के बिज़नस की वैल्यू का अंदाज़ा लगाना एक मुश्किल काम है, मगर इक्विटी के विश्लेषक और निवेशक, दोनों ही कंपनियों द्वारा अपने बारे में सुनाई जा रही हर अच्छी कहानी को मानने के लिए तुले-बैठे दिखते हैं। ये बात कतई मदद नहीं करती कि कुछ बिज़नस अपने बारे में सिर्फ़ अच्छी और सकारात्मक कहानियां ही सुनाएं और असलियत बयान न करें।

अगर इक्विटी रिसर्च पर आपका नज़रिया संदेह का है, तो अच्छी इक्वटी रिसर्च का 50% का काम आपके इसी संदेह से पूरा हो जाता है। जब भी आप किसी कंपनी को अपने बारे में कुछ सकारात्मक बातें कहते सुनते हैं, एक अच्छे इक्विटी रिसर्चर के तौर आपको कहना चाहिए कि, “मुझे इस स्टेटमेंट को ग़ौर से देखना है और ये भी देखना है कि इसमें क्या-क्या झूठ है”। और जब तक साबित न हो जाए, तब तक उन्हें दोषी मानिए: हर इक्विटी रिसर्च करने वाले का यही ध्येय होना चाहिए।

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