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ये दंगल बराबरी का नहीं

शेयर बाज़ार में बुल बनाम बेयर का संघर्ष काफ़ी एकतरफ़ा है और हमेशा एकतरफ़ा ही रहा है।

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बुल (Bull) मार्केट और बेयर (Bear) मार्केट। वो दौर, जब मार्केट ऊपर जाते हैं और वो दौर, जब वो गिरते हैं। नए-नए लोग जो निवेश के समंदर में अभी बस पांव गीले ही कर रहे हैं, और वो सटोरिए भी, जो इसके उठने-गिरने की चाल पर ट्रेड करते रहे हैं, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू दिखते हैं। कई बार मार्केट ऊपर उठते हैं, कई बार नीचे जाते हैं। कभी आप पैसा बनाते हैं, तो कभी गंवाते हैं। अगर क़िस्मत वाले हुए, या सही जानकारी पा गए, तो गंवाने से ज़्यादा पैसे भी बना पाते हैं। ये सिलसिला इसी तरह चलता रहता है।

मगर ऐसा है नहीं। वो निवेशक जो काफ़ी समय से इसमें रहे हैं, और सावधानी से और लगातार निवेश करते रहे हैं, उनके लिए ये काफ़ी अलग क़िस्म का अनुभव है। वो बुल या बेयर के बीच लगातार संघर्ष का सामना नहीं करते, जो अक्सर मीडिया में दिखाई देता है। इसके बजाए, वो मुनाफ़े के लंबे दौर देखते हैं जहां बीच-बीच में हलचल के दौर आते-जाते रहते हैं।

मेरा यक़ीन नहीं है? तो 1980 से सेंसेक्स पर एक नज़र डालते हैं, जो कमोबेश बाज़ार का पूरा इतिहास है। 1980 में सेंसेक्स क़रीब 120 पर शुरु हुआ। 1986 के मध्य तक, ये मज़बूती से ऊपर उठता रहा, और अप्रैल तक 600 के थोड़ा ऊपर पहुंच गया। ये छः साल में 500 प्रतिशत था। इसके बाद दो-साल की गिरावट रही, जब 1988 के मध्य तक 400 के ज़रा नीचे चला गया। इसके बाद एक लंबा बुल-रन हुआ जो बहुत तेज़ था। ये वो वक़्त था जब हर्षद मेहता और कुछ दूसरे लोगों ने पहले उदारीकरण के दौरान अपना ‘कारनामा’ किया, जो अप्रैल 1992 में 4400 पर जा कर रुका। तब एक ही साल में, 1993 के मध्य तक, 2200 की गिरावट आई। इसके बाद, सेंसेक्स फिर ऊपर उठना शुरु हुआ, और 1994 के अंत तक वापस 4000 पर जा पहुंचा।

इसके बाद आया 1990, इस दौर में सेंसेक्स ज़्यादातर 3000 से 5000 के बीच रहा जब भारतीय अर्थव्यवस्था सुधारों को पचाने की प्रक्रिया में थी और विजेताओं से हारने वालों की छंटाई हो रही थी। तब कुछ वक़्त के लिए उन्माद के दौर आए और ये उस समय बड़ी घटना लगे, मगर फिर जून 2003 में टर्निंग प्वाईंट आया जब नंबर बढ़ते हुए 3500 से, 2008 की शुरुआत में 20000 का आंकड़ा छू गए। ज़ाहिर है इसके बाद एक बार फिर गिरावट आई और एक साल से थोड़े ही ज़्यादा समय में सेंसेक्स आधे से भी कम पर पहुंच गया।

फिर बीच के कुछ ठहराव के दौर और थोड़े समय के कमज़ोर बाज़ार के बाद, स्टॉक के दाम लगातार बढ़ते ही रहे हैं, जिसमें कुछ वक़्त के लिए चीनी वायरस ने खलल डाला। पंटर जिसे इक्वीट मार्केट के तौर पर देखते हैं, ये उस तेज़ी और मंदी के बराबरी के संघर्ष से काफ़ी अलग तस्वीर है। ये एक लंबा और सतत बढ़ोतरी है। कभी-कभी, बढ़त ज़रूरत से ज़्यादा हो जाती है और इसलिए इसे औसत पर वापस लौटना होता है। कई बार स्कैम या वायरस होते हैं। पर कहना होगा कि सभी चीज़ों को देखने के बाद, ये एकतरफ़ा कहानी है।

असल में, चलिए कुछ अनोखा करते हैं। मुझे सबसे निचले स्तर से दूसरे सबसे निचले स्तर को देखते हैं। देखिए कि एक बुरे बेयर मार्केट के बाद सेंसेक्स कहां तक नीचे गया। हम 1980 के 120 प्वाईंट्स से शुरु करेंगे। ये सबसे-कम-से-सबसे-कम स्तर की सीरीज़ है। मार्च 1988: 390; जुलाई 1993: 2100; सितंबर 2001: 2600; मार्च 2009: 8200. अप्रैल 2020: 28000.

ये वो दुःख भरे समय थे जब निवेशक गहरी निराशा में थे। और फिर भी, ये प्रगति उतनी बुरी नहीं लगती, क्या लगती है? जैसा कि मैंने कहा, ये एकतरफ़ा कहानी है। तथाकथित बेयर के दौर जिनमें सबसे ख़राब प्रदर्शन रहा तब भी, दिशा साफ़ थी। ये बुल-बनाम-बेयर का संघर्ष असल में सच नहीं है, सिवा बहुत छोटे अंतराल के लिए जब पंटर और ट्रेडर ऑपरेट करते हैं।

अप्रैल 1979 से, जो तब से है जब से सेंसेक्स कैलकुलेट किया जाता था, तब से अब तक क़रीब 10,000 ट्रेडिंग दिन हो चुके हैं, 9983 मेरे डेटाबेस के हिसाब से। इनमें से, सेंसक्स 4,681 दिनों में गिरा और 5,302 दिनों में ऊपर उठा। ये काफ़ी क़रीब का मामला लगता है, और इसी सब से शाश्वत संघर्ष का विचार जन्म लेता है। वो लोग जिनका ट्रेड करने का दायरा घंटों या दिनों का है सच में ऐसा महसूस करते हैं कि किसी भी दिन कुछ भी हो सकता है, और वो अपनी जगह सही हैं। हममें से जो जो बरसों या दशकों तक निवेश करते हैं जानते हैं कि यही सब हर समय होता रहता है।

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