
जैसे किसी दोस्त के खो जाने का दुख होता है, उसी तरह जब स्टॉक्स अच्छे नहीं रह जाते, तब कुछ लोग उनके लिए भी ठीक वैसा ही महसूस करते हैं। एक इससे भी अजीब बात है। मैं एक व्यक्ति से मिला, जिनका कैस्ट्रॉल स्टॉक से-इसे दूसरी तरह से कहने का तरीक़ा नहीं है-काफ़ी पुराना और भरोसे वाला रिश्ता रहा था। क़रीब दो दशक तक इस शख़्स ने, परिवार की बचत का बड़ा हिस्सा इस स्टॉक में निवेश किया। और इस स्टॉक में उनका ये भरोसा फ़ायदे के तौर पर उन्हें वापस भी मिला। ज़िंदगी के जो भी अहम फ़ाईनेंशियल गोल कहे जा सकते हैं, इस स्टॉक ने उनके लिए वो सभी गोल पूरे किए। ये स्टॉक एक ऐसे दोस्त जैसा था, जिसने ज़िंदगी के हर मोड़ पर मदद की हो। मगर फिर, क़रीब सात साल पहले, सबकुछ बदल गया। ठीक वैसी ही, जैसे कोई पुराना दोस्त धोखा दे जाए, और आपकी परवाह करनी बंद कर दे।
ये कोई अजीब बात नहीं है। जिस तरह से कारें फ़ेवरेट होती हैं, जूते या दूसरी तमाम चीज़ें फ़ेवरेट हुआ करती हैं, उसी तरह से कई इक्विटी निवेशकों के लिए स्टॉक्स उनके फ़ेवरेट होते हैं। आमतौर पर ये तब होता है, जब निवेश की शुरुआत में कोई स्टॉक ख़रीदते और वो स्टॉक मल्टी-बैगर हो जाए। कई बरस या दशकों तक बढ़ता रहे, और बहुत बड़े रिटर्न दे। जो स्मार्ट लोग सही समय पर निवेश की शुरुआत करते हैं और उतार-चढ़ाव के मुश्किल दौर में भी किसी एक स्टॉक्स के साथ बने रहते हैं, उसी के ज़रिए बड़ी दौलत जमा कर लेते हैं, ऐसे में उस स्टॉक को लेकर उनमें गहरा भरोसा पैदा हो जाता है। कुछ ऐसे ही दूसरे उदाहरण जिनके बारे में मैंने सुना है, वो हैं - एशियन पेंट्स, HDFC बैंक, और कुछ बड़ी IT कंपनियां।
इसी की एक अजीब सी मिसाल मैंने देखी, जब पिछले दिनों मैं एक वीडियो यू-ट्यूब पर ढ़ूंढ रहा था। जिसकी मुझे तलाश थी वो बफ़ेट और मंगर की बर्कशायर हैथवे की सालाना शेयर होल्डर मीटिंग का था। तभी मुझे मिला एक और वीडियो जो US के जाने पहचाने कंट्री सिंगर जिमी बफ़ेट का था। जिमी और वॉरेन बफ़ेट का सरनेम एक ही है, हालांकि दोनों में कोई रिश्तेदारी या जान-पहचान नहीं है। क़रीब 25 साल पहले जिमी बफ़ेट ने बर्कशायर हैथवे के स्टॉक्स ख़रीदे थे। ये स्टॉक उन्होंने कभी नहीं बेचे और इससे, उनकी दौलत में ज़बर्दस्त इज़ाफ़ा हुआ। आज जिमी काफ़ी दौलतमंद हैं, हालांकि मुझे इसकी सही-सही जानकारी तो नहीं मिली कि बर्कशायर के स्टॉक ने उनकी दौलत कितना बढ़ा दी। मगर ढाई दशक तक इस स्टॉक को अपने पास रखने से उन्हें काफ़ी फ़ायदा मिला होगा।
मैं ये सलाह नहीं देता कि आप ऐसी कंपनी के स्टॉक ख़रीदें, जिसके प्रमोटर का नाम और आपका नाम एक हो, पर जिमी बफ़ेट की कहानी ये बात तो साबित करती है कि किसी ख़ास स्टॉक के प्रति मोह की बात दुनिया भर में देखी जाती है। यही मोह, कुछ निवेशकों में म्यूचुअल फ़ंड को लेकर भी होता है। मगर ये कहीं कम है-शायद इसलिए कि म्यूचुअल फ़ंड का आसानी से मानवीकरण नहीं हो पाता, क्योंकि ये एक बिज़नस है। म्यूचुअल फ़ंड अपने स्वरूप में अवैयक्तिक (impersonal) कहे जा सकते हैं।
पर ऐसा व्यवहार अच्छे निवेश के फ़ैसलों के आड़े आता है। जिनका कोई फ़ेवरेट स्टॉक होता है, वो लोग तक़रीबन हर मामले में, उन्हें बेचने से इनकार कर देते हैं, तब भी जब बिज़नस मुश्किल दौर में हो। ये मुश्किल दौर की बात भी नहीं है। ये तो बस ऐसा है जैसे गुज़रते समय के साथ, और कभी बिज़नस के सितारे बदलने की वजह से मुश्किल दौर आ जाए। अब चाहे ये अर्थव्यवस्था के कारण हो या पूरी इंडस्ट्री की वजह से या फिर सेक्टर में आए बदलावों के कारण भी ऐसा हो सकता है। ऐसे में बिज़नस सुस्त हो जाते हैं, और उन्हें वापस अपनी ऊर्जा और रफ़्तार पाने में वक़्त लगता है। भारत में, यूनीलीवर इसका अच्छा उदाहरण है। पिछली सदी के बदलने तक, ख़रीद कर रखने के लिए ये स्टॉक अच्छा हुआ करता था। फिर, क़रीब 2001 में हवा का रुख़ बदला, और क़रीब एक दशक तक, ये स्टॉक थम सा गया। इसके बाद एक बार और इसकी वापसी हुई और बाद का दशक शानदार रहा। ये लंबे समय में बदलाव के ट्रेंड हैं, जिन्हें शॉर्ट-टर्म में दांव लगाने वाले सटोरिए नज़रअंदाज़ कर देते हैं, और ये ठीक भी है।
हालांकि, लॉन्ग-टर्म का ये मतलब नहीं कि आप अपने स्टॉक्स पर ध्यान देना ही बंद कर दें। कुछ हफ़्ते पहले, जब HDFC का मर्जर अनाउंस हुआ, तो मुझे एक फ़ंड मैनेजर का कमेंट याद आ गया (शायद समीर अरोड़ा थे), जिन्होंने कई साल पहले HDFC बैंक के शेयर लिए थे और काफ़ी अच्छे रिटर्न पाए। उनकी पूरी बात तो याद नहीं, मगर ये कहना याद है कि उन्होंने HDFC बैंक को 20 साल तक होल्ड नहीं किया, बल्कि 80 क्वार्टर तक होल्ड किया। लॉन्ग टर्म निवेश को देखने का यही तरीक़ा, सही तरीक़ा है। वक़्त के साथ कुछ बातें बदल जाती हैं, और कुछ नहीं। पर आपको याद रखना होता है कि कौन सी बात क्या है।

