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यूनिकॉर्न-वाद के ख़तरे

क्या आपको लगता था कि एक देश जितने यूनिकॉर्न प्रमोट करता है वही उसकी आर्थिक ताक़त का पैमाना होता है?

क्या आपको लगता था कि एक देश जितने यूनिकॉर्न प्रमोट करता है वही उसकी आर्थिक ताक़त का पैमाना होता है?

लगता है, पूंजी इकठ्ठी करना कई बिज़नसों का बुनियादी लक्ष्य बन गया है। हर कोई यही बात करता है कि किसी बिज़नस ने कितनी पूंजी इकठ्ठा की और किसका वैल्युएशन कितना है। और जब मैं हर कोई कह रहा हूं, तो मेरा मतलब है हर कोई-फ़ाउंडर, बड़ा इन्वेस्टर, छोटा इन्वेस्टर, कर्मचारी, बड़े सरकारी अधिकारी, और यहां तक की रेग्युलेटरों पर भी यही जुनून सवार है।
एक समय ऐसा था, जब एक सीरियस बिज़नस पब्लिकेशन के लेख किसी बिज़नस के बारे में लिखे जाते थे, तो उसके रेवेन्यू और प्रॉफ़िट का ब्यौरा उसमें हमेशा शामिल रहता था। इससे पढ़ने वाले को बिज़नस के स्केल और उसकी सफलता का अदाज़ा तुरंत लग जाता। अब, पढ़ने वालों से उम्मीद की जाती है कि वो वैल्युएशन से काम चला लें। और ये वैल्युएशन है क्या? ज़्यादा-से-ज़्यादा ये, कंपनी द्वारा पिछली बार इकठ्ठा किए कुल पैसों का वैल्युएशन है। पर ज़्यादातर तो ये उससे भी निचले दर्जे की बात होती है-यानि वो वैल्युएशन जिसके आधार पर कंपनी पैसे इकठ्ठा करने की कोशिश कर रही है, महज़ वो दावा होता है जो फ़ाउंडर करते हैं। कुल मिला कर ये एक बेमानी क़िस्म का आंकड़ा है। असल में, ये चार्ली मंगर की कही एक बात याद दिलाता है कि ‘हर बार जब आप ‘EBITDA अर्निंग’ सुनते हैं इसे बक़वास अर्निंग समझिए’। इस तरह के वैल्युएशन के लिए निवेशकों का यही नज़रिया होना चाहिए। लगता है देश की आर्थिक सेहत इन नए ‘यूनिकॉर्न’ का आकंड़ा हो गई है, जो शायद अब तक का सबसे बक़वास आर्थिक पैमाना है।
ये समस्या निवेशकों के स्तर से आगे की हो गई है। हाल ही में कई न्यूज़ स्टोरियां दिखीं, जिनमें बहुत से हाई-प्रोफ़ाइल स्टार्ट-अप में बड़े स्तर पर छंटनी की बात की गई, ख़ासतौर से एजुकेशन सेक्टर में। इनमें से कई लेख, टीचरों और दूसरे लोगों के अनुभवों पर आधारित हैं। ये वो लोग थे जिन्हें कंपनियां ज्वाइन करने के कुछ ही महीनों बाद नौकरी से निकाल दिया गया। इन पूर्व-कर्मचारियों की कही कुछ बातें दिखाती हैं कि वैल्युएशन का भ्रम फैल गया है। कुछ लोग ने कहा कि उन्हें कुछ महीने पहले दूसरी नौकरी मिल गई थी, मगर उनके मैनेजर ने उन्हें मनाते हुए कहा कि ‘कंपनी का 20 बिलियन यूएस डॉलर का वैलुएशन है तो आप क्यों चिंतित हैं?’ वो आदमी मान जाता है और अब उसे ज़ूम कॉल पर कई सौ लोगों के साथ निकाल बाहर कर दिया गया है।
ये किसी मज़ाक की तरह लगता है और मैं सोचता हूं कि काश ये मज़ाक ही होता। इस तरह के बक़वास वैल्युएशन का आम कर्मचारियों की नौकरी के फ़ैसले का आधार बन जाना, बहुत बुरा नतीजा है। ये नतीजा है वैलुएशन और कैपिटल इकठ्ठा करने पर फ़ोकस करने का, और किसी बिज़नस की सफलता के सबसे अहम पैमाने के तौर पर इस्तेमाल करने का। असल में ऐतिहासिक तौर पर किसी भी इंडस्ट्री में बहुत ज़्यादा कैपिटल इकठ्ठा करना हमेशा से ही निवेशकों के लिए ख़तरे का संकेत रहा है। अगर आप उन कंपनियों को देखते हैं जिन्होंने भारतीय इक्विटी निवेशक के लिए शानदार वैल्थ पैदा की है, तो उनमें से किसी को भी सफल होने के लिए बहुत बड़े कैपिटल की ज़रूरत नहीं पड़ी। ये बात लो-एसेट टेक्नोलॉजी और सर्विस बिज़नस और एसेट-हैवी बिनज़स के लिए सही रही है। हालांकि, आखिरी कैटेगरी के लिए बड़े स्तर पर पूंजी की ज़रूरत रही, जिसे डेट और इक्विटी के जांचे-परखे फ़्रेमवर्क के तहत हासिल किया गया। इससे बड़ी बात है कि किसी बिज़नस प्लान का सबसे अहम हिस्सा उसके मुनाफ़ा हासिल करने के तरीक़े का अंदाज़ा लगाना होता है।
मुनाफ़ा हर बिज़नस का केंद्र है; बिना मुनाफ़े के, कोई बचाव नहीं है और न ही किसी बिज़नस के इवैल्युएशन का और तरीक़ा है। मैं 1991 से स्टॉक का विश्लेषण कर रहा हूं, और अचरज में हूं कि साल 2022 में मुझे पिछला वाक्य लिखने की ज़रूरत पड़ी। ये उसी तरह है जैसे डॉक्टर किसी को समझाए कि अगर कोई सांस लेना बंद कर दे, तो वो मर जाएगा। जब तक लोग किसी भी तरह का बिज़नस कर रहे हैं और बिज़नस में निवेश कर रहे हैं, ये अगला स्टेटमेंट अपने-आप सच साबित होता है: मुनाफ़ा ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी है। कम लागत (कैपिटल और दूसरे स्रोत से) में ज़्यादा मुनाफ़ा बेहतर है। बढ़ता हुआ मुनाफ़ा और बेहतर है। एक बिज़नस जितना जल्दी मुनाफ़े में आए, उतना बेहतर होता है।
जब तक कोई भी बिज़नस शर्तिया मुनाफ़े नहीं हासिल करने लगता उसके लिए ज़्यादा कैपिटल इकठ्ठा करना एक नकारात्मक संकेत है। हालांकि, जो बात पूरे बिज़नस और आर्थिक महौल को नुकसान पहुंचा रही है, वो वैल्युएशन और पूंजी इकठ्ठा करने को लेकर सनक की बहुतायत है, जो हम पर हावी हो गई है। अगर एक बिज़नस मुनाफ़ा कमाता है और बढ़ता है, तो अपने-आप ही उसका इवैल्युएशन ऊंचा होगा और कैपिटल इकठ्ठा करने की उसकी ताक़त ज़्यादा होगी। जो दिख रहा है, वो इस आपसी संबंध का एक आर्टिफ़िशियल रिवर्सल है।
यूनिकॉर्न-वाद एक ख़तरनाक विश्वास आधारित सिस्टम है। चाहे एक निवेशक हो या एक कर्मचारी हो या एक बिज़नस फ़ाउंडर ही क्यों न हो, इससे दूर रहिए।

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