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जंगल म्यूचुअल फ़ंड्स का

पिछले कुछ सालों के दौरान, म्यूचुअल फ़ंड्स के वर्गीकरण को सरल बनाने की कोशिशों ने एक अलग तरह की पेचीदगी खड़ी कर दी है

पिछले कुछ सालों के दौरान, म्यूचुअल फ़ंड्स के वर्गीकरण को सरल बनाने की कोशिशों ने एक अलग तरह की पेचीदगी खड़ी कर दी है

ज़्यादातर म्यूचुअल फ़ंड निवेशक अपना पूरा ध्यान एक ही सवाल पर बनाए रखते हैं, वो ये कि उन्हें किस फ़ंड में निवेश करना चाहिए। ख़ासतौर पर नए निवेशकों पर ये बात ज़्यादा सही बैठती है। हालांकि, कम-से-कम शुरुआत में ये सवाल ग़लत है। असल में, अगर सारा ध्यान इस सवाल पर है तो ये पक्का हमें उस रास्ते पर डाल देगा जहां हम ग़लत चुनाव ही करेंगे। सबसे अहम सवाल तो ये है कि आपको किस प्रकार के फ़ंड में निवेश करना चाहिए। और म्यूचुअल फ़ंड निवेश की भाषा में कहें, तो किस फ़ंड कैटेगरी या कौन-कौन सी फ़ंड की कैटेगरी हैं जिनमें आपको निवेश करना चाहिए। ये मुश्किल है, पर अहम सवाल है। और एक बार फ़ैसला हो जाने पर सटीक म्यूचुअल फ़ंड का चुनाव आसान हो जाता है। कम-से-कम काफ़ी हद तक आसान।
नोट करें कि मैंने इस विषय का परिचय देते हुए ऊपर दो तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया है: ‘प्रकार के फ़ंड’ और ‘फ़ंड कैटेगरी’। ये दोनों बातें एक ही होनी चाहिए, मगर ऐसा है नहीं। कारण है कि फ़ंड का कैटेगराइज़ेशन वो है, जिसे आधिकारिक तौर पर रेग्युलेटर परिभाषित करता है, और कैटेगरी फंड्स की वो आधिकारिक लिस्ट है, जो शिष्टता से कहें, तो एक जंगल है। तो इस घने जंगल में आप अपना रास्ता कैसे बनाएंगे? चलिए हम अपने बुनियादी सवाल की तरफ़ लौटते हैं।
फ़ंड का चुनाव महत्वपूर्ण इसलिए है कि: जब आप उन इनपुट के बारे में सोचते हैं, जो फ़ंड में निवेश के बारे में फ़ैसले के लिए चाहिए तो प्राइमरी इनपुट आपकी फ़ाइनेंशियल ज़रूरत का होता है। ज़ाहिर है, यही फ़ंड कैटेगरी की पहचान का आधार तय कर देता है। फिर, जब एक बार आप फ़ैसला कर लेते हैं, तो अगला स्टेप ये पता करने का होता है कि आपके लिए कौन सी फ़ंड कैटेगरी सही है। जैसा कि मैंने कहा, अगर आपने सही कैटेगरी चुनी है, तो ये मुश्किल नहीं है।
चलिए यहां असल ज़िंदगी की मिसाल लेते हैं ताकि बात आसान हो जाए। मान लीजिए आपको किसी चीज़ के लिए पैसे बचाने हैं, जिसकी ज़रूरत 10-15 साल में होगी और आप उससे ज़्यादा रिटर्न चाहते हैं जितना कि डिपॉज़िट वाले तरीक़े दे सकते हैं। तो ज़ाहिर है इसके लिए आपकी पसंद इक्विटी कैटेगरी होगी। इक्विटी में, कुछ और पैमानों के आधार पर, आप किसी ऐसे कॉम्बिनेशन में इक्विटी फ़ंड चुनेंगे जिसमें लार्ज और मिड-स्मॉल कैप शामिल हों। अगर आप नए निवेशक हैं जो छोटे निवेश से शुरुआत कर रहे हैं, तो आपकी सारी ज़रूरतें एक या दो हाइब्रिड फ़ंड से पूरी हो सकती हैं। ऐसे कई सिद्धांत और नियम हैं जो किसी भी तरह की आर्थिक ज़रूरत का मिलान फ़ंड के प्रकार से करने में मदद करते हैं। समझने की बात है कि सारी कैटेगरी की लंबी-चौड़ी आधिकारिक लिस्ट को पढ़ने भर से ज़रूरत के मुताबिक़ सही फ़ंड की पहचान में मदद नहीं मिलती है। ये सभी कैटेगरी सिर्फ़ ये बताती हैं कि ये फ़ंड निवेश कहां करते हैं-किस तरह की एसेट क्लास में निवेश करते हैं।
फ़ंड कंपनियों ने हमेशा कड़ी मेहनत की है कि उनके फ़ंड का क्लासिफ़िकेशन गोल-मोल ही रहे। ये बात अजीब लगेगी, मगर इसकी सीधी-सीधी व्यावसायिक वजह है। एक बार क्लासिफ़िकेशन सिस्टम तैयार हो जाए, तो उसका बुनियादी काम है रेटिंग, रैंकिंग और फ़ंड की कैटेगरी के भीतर मौजूद किसी भी फ़ंड से तुलना करना। मार्केटिंग की सहज समझ कहती है कि फ़ंड कंपनी अपना प्रोडक्ट दूसरों से अलग दिखाए, ताकि दावा किया जा सके कि उनके फ़ंड का आकलन सिर्फ़ उनकी मनपसंद ख़ूबियों पर हो, न कि किसी और फ़ंड की तुलना में। इसमें कुछ नया नहीं है-ये सिर्फ़ ख़ुद को अलग दिखाने (de-commoditisation) की ज़रूरत है, जो हर बिज़नस की होती है। फ़ंड कैटेगरी की आधिकारिक लिस्ट के साथ मुश्किल ये है कि इसके मेन फ़ंड एक जैसे लगते हैं और हर एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) को इनमें से हर एक कैटेगरी का केवल एक फ़ंड रखने की अनुमति है। वहीं, रेग्युलेशन में एक कमी ये है कि फ़ंड कंपनियां अनगिनत ख़ास तरह के फ़ंड (speciality funds) रख सकती हैं।
जहां तक अमल करने की बात है, तो निवेशकों का काम आसान नहीं हुआ है। पिछले पांच साल में, जब से समान कैटेगरी का सिस्टम (uniform categorisation system) शुरु हुआ, तो इससे पुराना भ्रम ख़त्म हो गया, मगर उसकी जगह नए ने ले ली है। अनुभवी निवेशक-जो फ़ंड की मार्केटिंग मशीनरी को संदेह से देखते हैं-वो अपने फ़ंड का चुनाव बेहतर कर सकते हैं। वैल्यू रिसर्च में हमारे पास भी ऐसा सिस्टम है, जो कई आधिकारिक फ़ंड्स की कैटेगरी में से निवेशकों की असल ज़रूरतों को पहचान में मदद करता है। ये सिस्टम वैल्यू रिसर्च प्रीमियम और दूसरी सर्विस के साथ शामिल है। फ़ंड कैटगरी का सरल सिस्टम नए निवेशकों की बुनियादी ज़रूरत है ताकि वो जान सकें कि उन्हें कैसे और क्या करना है। ऐसी समझ ख़ुद भी पैदा की जा सकती है, मगर इसके लिए ज़रूरत से ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत होगी।

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