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सारांशः कैश के बड़े ढेर पर बैठी कोई कंपनी काग़ज़ पर अमीर लग सकती है, पर हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग हो सकती है. हम ऐसी पांच कंपनियों की बात कर रहे हैं जो अपनी 60% से ज़्यादा संपत्ति कैश में रखती हैं, और यह निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है.
पहली नज़र में, कैश के बड़े ढेर पर बैठी कोई कंपनी आकर्षक लग सकती है. पर इसका मतलब यह नहीं कि यह कैश 'मुफ़्त' है.
मिसाल के तौर पर, Indian Energy Exchange (IEX) को ही लीजिए. इस वक़्त, इसकी 74% संपत्ति कैश, बैंक बैलेंस और मौजूदा निवेशों में है. IndiaMART, GlaxoSmithKline Pharmaceuticals, Pfizer और Honeywell Automation, ये सब भी 60% पार कर जाते हैं. काग़ज़ पर, ये बाज़ार की पांच सबसे सुरक्षित बैलेंस शीट लगती हैं. पर असल में, उस कैश का एक बड़ा हिस्सा शेयरधारकों के इस्तेमाल के लिए मुफ़्त नहीं है.
यहां, हम उन वजहों को देखते हैं कि ये कंपनियां कैश के इतने बड़े ढेर क्यों रखती हैं और इसका निवेशकों के लिए क्या मतलब है.
हमारा तरीक़ा
अपनी मनचाही कंपनियों की लिस्ट पाने के लिए, हमने ये फ़िल्टर लगाए:
- ₹10,000 करोड़ से ज़्यादा मार्केट कैप वाली ग़ैर-वित्तीय कंपनियां
- कम से कम पांच साल का लिस्टेड इतिहास
- कंपनी की कुल संपत्ति के 60% से ज़्यादा लिक्विड संपत्ति
वित्तीय कंपनियों को इसमें शामिल नहीं किया गया, क्योंकि ऐसी एसेट्स उनके आम कारोबार का हिस्सा होती है, न कि सरप्लस कैपिटल.
ऊपर के फ़िल्टर लगाने के बाद, हमें पांच कंपनियों की एक लिस्ट मिली, जिसका सार नीचे की टेबल में है.
कैश के बड़े ढेर पर बैठी 5 कंपनियां
ये अपनी 60% से ज़्यादा एसेट कैश के रूप में रखती हैं.
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कंपनी
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कुल संपत्ति में तरल संपत्ति का % | FY21-FY26 रेवेन्यू CAGR (%) | FY21-FY26 PAT CAGR (%) | स्टॉक रेटिंग |
|---|---|---|---|---|
| Indian Energy Exchange | 74 | 16 | 19.2 | 5 |
| IndiaMART InterMESH | 67 | 18.6 | 11.1 | 4 |
| GSK Pharmaceuticals | 64 | 3.7 | 23.7 | 4 |
| Pfizer | 63 | 2.4 | 7.7 | 4 |
| Honeywell Automation | 61 | 9 | 2.7 | 4 |
IEX: कुछ कैश तो कारोबार की नींव है
IEX का 74% वाला रेशियो सबसे नाटकीय लगता है और इसे आसानी से ग़लत समझा जा सकता है.
FY26 में, इस एक्सचेंज के पास मौजूदा निवेशों में ₹1,692 करोड़ थे, पर कैश और कैश जैसी चीज़ों में सिर्फ़ ₹36.5 करोड़, जिसमें से थोड़ा ज़्यादा ₹23 करोड़ सेटलमेंट खातों में पड़े थे. इसके पास दूसरी मौजूदा वित्तीय देनदारियों के रूप में ₹975 करोड़ भी थे.
एक एक्सचेंज कोई आम कंपनी नहीं होती. सदस्यों के मार्जिन और सेटलमेंट का पैसा संपत्ति के रूप में दिखता है और उसके ठीक सामने दूसरी तरफ़ एक बराबर की देनदारी बैठी होती है. IEX एक 'सेटलमेंट गारंटी फ़ंड' भी चलाता है, जिसका एक हिस्सा नियम से ही सुरक्षित, तरल चीज़ों में रखना ज़रूरी होता है.
इसलिए वो हेडलाइन वाला नंबर कंपनी के अपने पैसे को उस कैश के साथ मिला देता है, जो बाज़ार को चलते रहने के लिए चाहिए. FY21 और FY26 के बीच रेवेन्यू और मुनाफ़ा, दोनों क़रीब 16 से 19% सालाना की दर से बढ़े, और कम संपत्ति वाला यह एक्सचेंज मॉडल सच में असली फ़ालतू कैश पैदा करता है. पर निवेशकों को IEX को उस कमाई वाली कैश के लिए श्रेय देना चाहिए, न कि उसके साथ पड़े सेटलमेंट के पैसे के लिए. यह 74% वाला आंकड़ा उस गद्दी को हद से ज़्यादा बड़ा दिखाता है.
Pfizer: सोच-समझकर कैश-रिच
Pfizer सालों से कैश का भारी ढेर रखती आई है. तरल रक़म FY19 में संपत्ति का 49% थी, FY20 में 50%, और FY26 तक 63%. यह कोई अचानक मिली लॉटरी नहीं है.
इसका लिस्टेड भारतीय कारोबार 'दवा बनाने वाली कंपनी' के लेबल से कहीं हल्का है. FY26 में ₹2,520 करोड़ की रेवेन्यू के मुक़ाबले, Pfizer के पास प्रॉपर्टी, प्लांट और मशीनों में सिर्फ़ ₹136 करोड़ थे, और उस साल इसने तयशुदा संपत्ति पर क़रीब ₹25 करोड़ ख़र्च किए. यहां बढ़त नई दवाओं के आने, मज़बूत डिस्ट्रीब्यूशन और कारोबारी साझेदारियों से आती है, नई फ़ैक्ट्रियों से नहीं.
यही मेल, यानी एक मुनाफ़े वाला पोर्टफ़ोलियो जिसे दोबारा निवेश की कम ज़रूरत हो, इस जमा रक़म की वजह बताता है. Pfizer ने FY26 में ₹968 करोड़ की ऑपरेटिंग कैश हासिल किया और साल के आख़िर में यह आंकड़ा ₹3,111 करोड़ की लिक्विड रक़म के स्तर पर पहुंच गया. पर FY21-26 में रेवेन्यू सिर्फ़ 2.4% सालाना बढ़ी, जबकि अकेले ब्याज से हुई आमदनी ने FY26 में ₹166 करोड़ जोड़े. यह कैश सुरक्षा है, और यह एक लक्षण भी है: भारतीय कारोबार को अपने ही मुनाफ़े के लिए काफ़ी ऊंचे रिटर्न वाले इस्तेमाल नहीं मिल पाए हैं.
सच कहें तो, Pfizer कैश लौटाती भी है. इसने FY26 में क़रीब ₹752 करोड़ डिविडेंड के रूप में दिए, FY25 के लिए ₹165 प्रति शेयर घोषित करने के बाद और तब से ₹75 प्रति शेयर की सिफ़ारिश की है. शेयरधारकों को पैसा दिखता तो है. असली परीक्षा यह है कि क्या ये भुगतान इतने ही उदार बने रहेंगे, जबकि एक जमा-जमाया, धीमी बढ़त वाला कारोबार अपने खाते को उससे तेज़ी से भरता रहता है जितनी तेज़ी से वो उसे ख़र्च कर सकता है.
Honeywell Automation: बाहर से औद्योगिक, अंदर से कम-पूंजी वाला
Honeywell Automation ऑटोमेशन सिस्टम, बिल्डिंग सॉल्यूशन और इंजीनियरिंग सेवाएं बेचती है, पर यह लिस्टेड कंपनी कोई आम, फ़ैक्ट्री-भारी निर्माता नहीं है. यह भारत में एक सिस्टम इंटीग्रेटर की तरह काम करती है और अपनी पैरेंट कंपनी को इंजीनियरिंग सेवाएं व कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफ़ैक्चरिंग देती है. इस तरह के प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए वर्किंग कैपिटल चाहिए, तयशुदा एसेट नहीं: FY26 में प्रॉपर्टी, प्लांट और मशीनें सिर्फ़ ₹97 करोड़ थीं.
इस ढांचे ने लगातार रक़म इकट्ठा की हैं. लिक्विड कैश FY21 के ₹1,797 करोड़ (संपत्ति का 45.5%) से बढ़कर FY26 में ₹3,806 करोड़ (61.1%) हो गया. कंपनी कहती है कि ये कैश बिना किसी नोटिस या जुर्माने के निकाला जा सकता है.
यहां पूंजी के इस्तेमाल वाला सवाल और तीखा हो जाता है. FY22 और FY26 के बीच, टैक्स के बाद का मुनाफ़ा ₹339 करोड़ से बढ़कर ₹525 करोड़ हुआ, पर डिविडेंड सिर्फ़ ₹90 से बढ़कर ₹110 प्रति शेयर हुआ. नेट वर्थ ₹2,837 करोड़ से बढ़कर ₹4,463 करोड़ हुई, जबकि नेट वर्थ पर रिटर्न FY24 में सबसे ऊंचा 15.6% रहा और FY26 तक फिसलकर 12.7% पर आ गया.
वो गिरावट अपने आप में वैल्यू के नुक़सान का सबूत नहीं है. FY26 में रेवेन्यू 12% बढ़ी जबकि मुनाफ़ा मुश्किल से हिला, यानी सुस्ती की वजह मार्जिन पर दबाव था, कैश का ढेर नहीं. पर एक बार रिटर्न फिसलने लगे, तो वो बड़ी, बिना इस्तेमाल पड़ी कैश का बचाव करना मुश्किल हो जाता है. मैनेजमेंट ऑटोमेशन, एनर्जी बदलाव और एक्सपोर्ट के मौक़ों की तरफ़ इशारा करता है, जो सब असली हैं, पर सालाना रिपोर्ट उस ₹3,806 करोड़ के ख़ज़ाने को किसी ख़ास अधिग्रहण या क्षमता की योजना से नहीं जोड़ती. जब तक वो ऐसा नहीं करती, वो कैश एक संभावना है, कोई साबित की हुई वैल्यू नहीं.
आपके लिए इसका क्या मतलब है
सबसे पहले यह हिसाब लगाइए कि दिखाई गई कैश में से कितनी सचमुच फ़ालतू है, यानी कर्ज़, कारोबार को चलाने वाली कैश, IEX के सेटलमेंट फ़ंड जैसी बंधी हुई रक़में, और कारोबार को चलाने के लिए सचमुच ज़रूरी वर्किंग कैपिटल, इन सबको घटाने के बाद. जो बचता है, सिर्फ़ वही शेयरधारकों की कैश है.
फिर कारोबार को अपने आप में परखिए. अगर आप मार्केट कैप में से फ़ालतू कैश निकालते हैं, तो मुनाफ़े में से उस पर मिलने वाला ब्याज भी निकाल दीजिए, वरना आप एक ही रुपये को दो बार गिन बैठेंगे.
एक बड़ा कैश बैलेंस एक सच्ची गद्दी हो सकता है, या फिर दशकों पुरानी वो आदत, जिसमें मुनाफ़ा जमा तो होता रहा पर मैनेजमेंट को उसे लगाने का कोई तरीक़ा नहीं मिला. हमारी छलनी वाली पांच कंपनियां इस पूरे दायरे में अलग-अलग जगहों पर खड़ी हैं. IEX का कैश ज़्यादातर ढांचागत है. Pfizer का कैश एक धीमी बढ़त वाला कारोबार है जो जितना दे सकता है, दे रहा है. और Honeywell का कैश वो है जिसे सबसे ज़्यादा एक जवाब चाहिए, और जिसके पास अभी वो जवाब नहीं है.
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