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अध्यात्म और निवेश

जीवन के दूसरे पहलू की तरह,आध्‍यात्मिक तौर पर जागरुक होना आपको बेहतर निवेशक बनाता है

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हर इतवार की शाम, मैं आकाशवाणी पर आधे घंटे का शो करता हूं। सवाल-जवाब के इस कार्यक्रम में श्रोता निवेश से जुड़े अपने सवाल पूछते हैं, और मैं लाइव रेडियो पर उन्हें जवाब देता हूं। इस सिलसिले को एक दशक से ज़्यादा हो चला है। मैं इस फ़ॉर्मैट को काफ़ी पसंद करता हूं क्योंकि ये काम लेख लिखने और टीवी के शो से अलग है। इतने सालों के दौरान कई सौ शो हो चुके हैं, हज़ारों लोगों से फ़ोन पर बातें हो चुकी हैं, और जिस तरह के सवाल पूछे जाते हैं, उन्हें लेकर मैं काफ़ी सहज हो गया हूं। आख़िर निवेश पर, निवेशक कितनी तरह के सवाल पूछ सकते हैं। हां, फ़ंड्स के नाम और परिस्थितियां बदलती रहती हैं, मगर बातें कमोबेश एक सी ही रहती हैं।
मगर, पिछले इतवार एक सवाल सुन कर मैं सचमुच अचरज में पड़ गया। मैं मज़ाक में ऐसे सवाल को 'सिलेबस से बाहर' का सवाल कहता हूं। दरअसल, कोलकाता के एक शख़्स ने मुझसे पूछा कि क्या अध्यात्म, निवेश में मदद करता है! अब, मैं इस विषय पर अधिकार का दावा नहीं कर सकता। असल में, ऐसे बहुत कम लोग हैं जो ऐसा दावा कर भी सकते हैं। इस विषय की जानकारी के अभाव की बात कही, फिर मैंने अपने और अपने क़रीबियों के अनुभव की एक बात ज़रूर कही, जो उस वक़्त मुझे याद आ गई। आध्यात्मिक रूप से संतुलित जीवन का नज़रिया, तब सच में आपकी मदद करता है जब आप निवेश के ख़राब दौर से गुज़र रहे हों।
इसमें कुछ भी अनअपेक्षित नहीं है। आध्यात्मिक तौर पर मज़बूत लोग, ख़ुद को बेहतर तरीक़े से समझते हैं और इसलिए वो मुश्किल हालात में भी ज़्यादा संतुलित रह सकते हैं। जैसा कि होता है, पिछले दो साल में चीनी वायरस के कारण बहुत से लोगों ने अपने निजी जीवन में गहरा तनाव और दुःख झेले। इसने जहां कुछ लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर मज़बूत किया, वहीं औरों पर इसका उलटा असर हुआ। ये फ़र्क़ इस बात का भी हो सकता है कि लोग आध्यामिक रूप से कितने जागरुक रहे। और निवेशक भी ऐसे ही होते हैं। देर-सबेर हर निवेशक बुरे दौर से गुज़रता है। जब वो वक़्त ख़त्म होता है, तो कुछ लोग डर कर निवेश से दूर हो जाते हैं, और/ या निवेश से घबराने लगते हैं। पर, कुछ दूसरे लोग बाहरी परिस्थितियों के असर और अपने व्यवहार को लेकर सीख लेते हैं।
मैं जब देखता हूं कि लोग आमतौर पर किस तरह के सवाल-इंटरनेट पर, और वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन पर-निवेश पर पूछते हैं तो एक दिलचस्प पैटर्न उभर कर सामने आता है। ऐसे बचत करने वाले भी हैं, जो सोचते हैं कि निवेश, निवेश के बारे में है और ऐसे लोग भी मिल जाएंगे, जो सोचते हैं कि निवेश उनके अपने बारे में है।
ये साबित करने के लिए कि मैं क्या कह रहा हूं, आपको कुछ अलग-अलग तरह की मिसालें देता हूं। यहां असल सवाल है कि, 'क्या ये सही है कि मौजूदा परिस्थितियों में स्टॉक मार्केट पर आधारित मिड-कैप और स्मॉल-कैप म्यूचुअल फ़ंड्स में निवेश किया जाए? ये परिस्थितियां कब तक ऐसी ही रहेंगी?' सुनने में ये बिल्कुल तर्कसंगत बात लगती है। हालांकि, इस बात को उलट देखिए: 'मैं 40 साल का हूं, मगर सिवा EPF कटवाने के, मैंने अपने रिटायरमेंट की बचत शुरु नहीं की है। जब मैं रिटायर होउंगा, मुझे ₹75,000 महीने की ज़रूरत होगी...', और फिर निजी जानकारियां हैं जिन्हें मैं यहां बताउंगा।
तो आप समझे कि मैं क्या बात कर रहा हूं? ये ऐसा सवाल है जिन्हें दो बचत करने वालों ने ई-मेल से वैल्यू रिसर्च से पूछा। मैं समझता हूं, ये आमतौर पर निवेश के प्रति उनके व्यवहार को दिखाता है। पहला सवाल करने वाला सोचता है कि निवेश के फ़ैसले बाहर की दुनिया की घटनाओं पर आधारित होते हैं, वहीं दूसरा बचत करने वाला सोचता है कि बचत और निवेश उसके अपने जीवन की मुश्किलों का हल पाने का रास्ता है।
इसके अलावा, इससे भी गहरा एक आध्यात्मिक पहलू है जिसे लेकर आपको, अपने-आप को समझने की ज़रूरत है। अलग-अलग लोग, जब मुश्किलों का सामना करते हैं तों अलग स्तर पर चिंतित होते और घबराते हैं। इन्वेस्टमेंट एडवाइज़रों को अपने क्लायंट से ये सवाल पूछना बहुत अच्छा लगता है कि उनका 'रिस्क टॉलरेंस' या रिस्क सहने की क्षमता क्या है। मगर ये सवाल उसके लिए बेकार है जिसने असल ज़िंदगी में नुकसान ही न झेला हो। यही ज़िंदगी की कई दूसरी परिस्थितियों के लिए भी सच है। क्या आप हिम्मत दिखाएंगे जब आप एक आंतकवादी हमले का सामना करेंगे? या जब आपको कोई ख़तरनाक बीमारी हो जाए? इसका जवाब कोई नहीं जानता, जब तक ये हो न जाए।

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