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क्या ETF में मिला डिविडेंड निवेशक के अकाउंट में सीधे क्रेडिट हो जाता है?

जानिए क्या एक्सचेंज-ट्रेडेड फ़ंड डिविडेंड देते हैं और उन पर टैक्स कैसे लगता है

जानिए क्या एक्सचेंज-ट्रेडेड फ़ंड डिविडेंड देते हैं और उन पर टैक्स कैसे लगता है

सारांशः क्या आपने कभी सोचा है कि ETF डिविडेंड सच में आपके अकाउंट में कैश के तौर पर आते हैं? यह लेख साफ़ तौर पर समझाता है कि भारत में ETF डिविडेंड कैसे काम करते हैं, कब पैसा अकाउंट में आता है, कब दोबारा निवेश होता है और टैक्स का नियम क्या है.

क्या ETF पर मिलने वाला डिविडेंड मेरे अकाउंट में क्रेडिट होता है? उस पर टैक्स कैसे लगता है? – वैल्यू रिसर्च सब्सक्राइबर

भारत में ज़्यादातर एक्सचेंज-ट्रेडेड फ़ंड (ETF) डिविडेंड सीधे निवेशक के अकाउंट में जमा नहीं करते. आम तौर पर ETF को जिन शेयरों से डिविडेंड मिलता है, उसे दोबारा उसी फ़ंड में निवेश कर दिया जाता है, ताकि वह अपने बेंचमार्क इंडेक्स के क़रीब बना रहे.

ETF में डिविडेंड को समझें

डिविडेंड कंपनी के मुनाफ़े का वह हिस्सा है जो शेयरहोल्डरों को दिया जाता है. लेकिन भारत में ज़्यादातर इक्विटी ETF में इन शेयरों से मिलने वाला डिविडेंड निवेशकों को कैश नहीं दिया जाता. इसे अपने-आप दोबारा निवेश कर दिया जाता है. इस दोबारा से होने वाले निवेश से कुछ समय के लिए ETF अपने बेंचमार्क से थोड़ा आगे निकल सकता है, क्योंकि कैश रक़म तुरंत बाज़ार में लगा दी जाती है. ETF के रिटर्न और उसके बेंचमार्क के बीच जो अंतर होता है, उसे ट्रैकिंग एरर कहा जाता है. यह अंतर दोबारा निवेश के समय, फ़ंड के ख़र्च और कैश होल्डिंग जैसे कई वजहों से बनता है.

एक फ़ंड हाउस के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, कुछ ETF पहले डिविडेंड घोषित करते थे, लेकिन अब ज़्यादातर मामलों में भुगतान सिर्फ़ लिक्विड ETF तक सीमित है, जहां डिविडेंड की रक़म सीधे अकाउंट में जमा की जाती है.

लिक्विड ETF अलग हैं

लिक्विड ETF, जो ट्रेज़री बिल जैसे शॉर्ट-टर्म डेट इंस्ट्रूमेंट में निवेश करते हैं, अक्सर डिविडेंड घोषित करते हैं. यह डिविडेंड जमा हुए ब्याज को दिखाता है और निवेशकों के डीमैट अकाउंट में सीधे क्रेडिट होता है.

उदाहरण के तौर पर SBI Nifty 1D Rate Liquid ETF और Mirae Asset Nifty 1D Rate Liquid ETF ऐसे फ़ंड हैं, जिन्हें लो-रिस्क और शॉर्ट-टर्म के निवेश के लिए बनाया गया है. ये इक्विटी ETF से अलग हैं, क्योंकि इनका ध्यान शेयरों पर नहीं, बल्कि ओवरनाइट या वन-डे रेट पर फ़ोकस करते हैं है.

ETF के डिविडेंड पर टैक्स कैसे लगता है?

फ़ाइनेंशियल ईयर 2020-21 के बाद से ETF द्वारा दिया गया कोई भी डिविडेंड, ख़ासकर लिक्विड ETF से मिलने वाला, निवेशक की कुल कमाई में जोड़ा जाता है और उस पर निवेशक के इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है.

अगर साल भर में डिविडेंड ₹5,000 से ज़्यादा हो जाए, तो फ़ंड हाउस 10 प्रतिशत TDS काटता है. ETF यूनिट बेचने पर कैपिटल गेन का नियम अलग है. इंडेक्स ETF पर इक्विटी नियम लागू होते हैं. एक साल से ज़्यादा रखने पर ₹1.25 लाख से ऊपर के लॉन्ग-टर्म गेन पर 12.5 प्रतिशत टैक्स लगता है. अन्य ETF पर डेट नियम लागू हो सकते हैं.

अगर ग्रोथ विकल्प वाले ETF में डिविडेंड दोबारा निवेश होता रहे, तो टैक्स रिडेम्प्शन तक टल जाता है.

निवेशकों के लिए फ़ायदे और ध्यान रखने वाली बातें

स्टैंडर्ड ETF में रीइन्वेस्टमेंट से सालाना टैक्स लगे बिना कंपाउंडिंग को बढ़ावा मिलता है, जो इंडेक्स जैसी ग्रोथ का लक्ष्य रखने वाले लंबे समय के निवेशकों के लिए सही है. हालांकि, लिक्विड ETF शॉर्ट-टर्म ज़रूरतों के लिए लिक्विडिटी और रेगुलर इनकम देते हैं, हालांकि रिटर्न महंगाई से कम हो सकता है. निवेश से पहले ETF की डिविडेंड पॉलिसी और ट्रैकिंग एरर ज़रूर देखें. कम ट्रैकिंग एरर, यानी 0.5 प्रतिशत से कम, बेहतर ट्रैकिंग का संकेत है.

शुरुआत करने वालों के लिए Nifty 50 ETF ठीक माने जाते हैं, क्योंकि इनका ख़र्च कम और लिक्विडिटी बेहतर होती है. अलग-अलग विकल्पों की तुलना करने के लिए वैल्यू रिसर्च ETF स्क्रीनर जैसे टूल का इस्तेमाल किया जा सकता है.

ये भी पढ़ें: ETF और उनके डिविडेंड

ये लेख पहली बार फ़रवरी 16, 2026 को पब्लिश हुआ.

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