बॉस्टन के लोगान इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर ये 11 सितंबर 2001 की सुबह है। भीड़ अनजान है, साऊदी अरब के 19 युवा चार अलग-अलग फ़्लाइट में चढ़ने वाले हैं, उनका इरादा न्यूयॉर्क सिटी और वॉशिंग्टन डीसी की प्रसिद्ध इमारतों में विमान टकरा देने का है। हालांकि, एक दिन पहले ही FBI की काउंटर-टेरररिज़्म टीम ने महीनों से मिल रही जानकारी के सिरे जोड़ लिए थे। इसीलिए एयरपोर्ट सिक्योरिटी एक्स्ट्रा अलर्ट पर है, जिससे हाइजैक करने जा रहे लोगों के चाकुओं का पता लग जाता है और उन्हें ज़ब्त कर लिया जाता है। हथियार जैसी कोई भी चीज़ न होने की वजह से, ये 19 लोग अपना मिशन छोड़ देते हैं। वो सभी एयरपोर्ट टर्मिनल से बाहर निकल कर अपने-अपने अपार्टमेंट की तरफ़ जाते हैं। उस रात, उन सभी को गिरफ़्तार कर लिया जाता है। ये ख़बर मुश्किल से किसी अख़बार के अंदर के पन्नों में जगह पाती है, और टीवी की ख़बरों में तो इसे पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। सोशल मीडिया के दौर से पहले के इस वक़्त में, शायद ही कोई इसके बारे में सुनता है।
अगर आप 9/11 के घटनाक्रम के सिलसिले पर नज़र डालेंगे, तो आपको एहसास होगा कि ये ऐसे ही हुआ होता अगर अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने बहुत सारे स्पष्ट सुराग़ों को नज़अंदाज़ नहीं किया होता। दिलचस्प ये है कि अगर ये ऐसे हुआ होता, तो जिन्होंने ये सुराग़ जोड़े होते और हाइजैकिंग रोकी होती वो हीरो नहीं हुए होते। किसी को पता नहीं चलता कि ग्लोबल संकट टाल दिया गया है क्योंकि गिरफ़्तारियां एक आम बात होतीं, छोटा सा काउंटर-टेरररिज़्म का ऑपरेशन। इस कहानी की सीख समझना सरल है: कुछ होने से रोकने का क्रेडिट किसी को नहीं मिलता। किसी को पता भी नहीं चलता कि कुछ होने से रोका गया। एक्सीडेंट को, टेरर अटैक को, रैनसमवेयर अटैक सफलता से शांत कर दिया जाना एक रुटीन बात होती है।
क्या यही बात सावधानी से निवेश के बारे में भी सही है? सभी तर्कसम्मत बातों के बारे में जो एक निवेशक को करनी चाहिए? मैं समझता हूं कि ऐसा ही है, और इससे भी बढ़ कर, मेरी लिखी 9/11 का वैकल्पिक इतिहास से उलट, सचेत रह कर सुरक्षात्मक बने रहना और आपके निवेश को क्या चीज़ सुरक्षित रखे हुए है उसके प्रति लगातार जागरुक रहना एक सफल निवेशक के लिए महत्वपूर्ण स्किल है। कुछ समय पहले, समीर अरोड़ा के साथ मेरी दिलचस्प बातचीत हुई, समीर भारतीय मार्केट के जाने-माने इन्वेस्टमेंट मैनेजर हैं जो पिछले 25 सालों के दौरान कई अवतारों में रहे हैं। अरोड़ा का निवेश के सिद्धांतों को समझाने का बड़ा मज़ाकिया और ओरिजनल स्टाइल है। एक इंटरव्यू में, उन्होंने अपनी मौजूदा 100% निवेशित स्थिति (ज़ीरो कैश) को परिभाषित करते हुए कहा 'जब प्यार किया तो डरना क्या!'
मेरी बातचीत में, अरोड़ा ने निवेश किए जाने वाले स्टॉक के यूनिवर्स और उसके प्रति रवैये को मोटे तौर पर आसानी से समझ आने वाले और अमल में लाने वाले तरीक़े के तौर पर समझाया। करने वाली पहली चीज़ है कि कंपनियों को अच्छी और ख़राब में क्लासिफ़ाई कर लें। अब तक, सब ठीक है। हर कोई ऐसा ही करता है। नहीं, हर कोई ऐसा नहीं करता है। असल में, ज़्यादातर निवेशक कंपनियों को इस नज़रिए से देखने पर फ़ोकस करते हैं कि कौन सी अच्छी कंपनियां हैं जिनके स्टॉक में उन्हें इन्वेस्ट करना चाहिए। करने के लिए ये एक तर्कपूर्ण बात लगती है, सिवा इसके कि इसकी शुरुआत दूसरे सिरे से करना ज़्यादा बेहतर रहेगा।
जैसा कि अरोड़ा कहते हैं, आप अच्छी और ख़राब कंपनियों के चुनाव से शुरुआत कर सकते हैं। जो असल बात वो कहते हैं वो ये कि: अच्छे और अच्छे में चुनाव करना मुश्किल है, मगर अच्छे और ख़राब में चुनाव करना आसान है। आपको दर्जनों चीज़ें देखने की ज़रूरत होगी अगर आपको फ़ैसला करना हो कि कौन सी कंपनी आपके निवेश के लिए सही है, मगर एक या दो ही नकारात्मक प्वाइंट काफ़ी होते हैं ये फ़ैसला करने के लिए कि आपको किसी कंपनी में निवेश नहीं करना है, फिर चाहे और कितने भी सकारात्मक फ़ैक्टर उसमे हों।
ये प्वाइंट काफ़ी दिलचस्प और मददगार है। जब स्टॉक सलेक्ट करने की बात हो, तो आप कभी भी 100% पक्का नहीं कह सकते कि ये निवेश करने लायक़ है ही। जब आप स्टॉक ख़रीदते हैं तब भी, आप पक्के तौर पर नहीं कह सकते। हालांकि, नकारना या रिजैक्ट कर देना अलग बात होती है। एक बार जब आप किसी ग़लत चीज़ को पहचान लेते हैं, तब और ज़्यादा पूछने के लिए कुछ नहीं बचता और दूसरे जवाबों का आकलन करने की ज़रूरत नहीं होती। आप 100% पक्का होते हो कि ये स्टॉक छोड़ना ही चाहिए।
तो, शुरुआत दुश्मनी के भाव या नकारात्मक रवैये से करिए। जब कोई स्टॉक का सुझाव देता है, तो ये तलाशना शुरु कर दीजिए कि ये क्यों एक ख़राब निवेश है। नकारात्मक होने के काफ़ी सकारात्मक पहलू हैं।

