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रिटायरमेंट एक ख़तरा

रिटायरमेंट के बाद निवेश और आमदनी मैनेज करना मुश्किल काम है, ये जितना फ़ाइनांस से जुड़ा है उतना ही मनोविज्ञान के दायरे में भी आता है

रिटायरमेंट एक ख़तरा

अगर बचत और निवेश में कोई समस्या है, तो वो रिटायरमेंट है। सिवाए उन चंद लोगों के जिनके पास काफ़ी संपत्ति है या आमदनी का कोई सुरक्षित ज़रिया है, ऐसा शायद ही कोई हो, जो ये चिंता नहीं करता कि एक बार कमाना बंद हो जाएगा और सिर्फ़ ख़र्चे रह जाएंगे, तब क्या होगा। ये अनजाना भय मन के किसी कोने में रहता ही है। रिटायरमेंट के बाद अब जीवन लंबा होता है। 20 या 25 साल तो आम बात है, और फिर अच्छी सेहत ज़्यादा देर तक साथ नहीं देती और बाद के सालों में मेडिकल ख़र्च बढ़ते जाते हैं। ऐसे बुज़ुर्गों को हम जानते ही हैं जो रोज़मर्रा का ख़र्च चलाने के लिए संघर्ष करते हैं। पैसे काफ़ी न हों, तो ज़िंदगी बोझ बन जाती है।

फ़ाइनांस को लेकर सलाह देने के मेरे अनुभव में, अक्सर मुझे दिखा है कि रिटायर होने वाले कई लोग शुरुआती दिनों में ज़्यादा ख़र्च कर देते हैं और बाद में तंगहाली से गुज़रते हैं। आमतौर पर वेतन पाने वाले किसी शख़्स के रिटायर होने पर उसे क़रीब ₹30 या ₹40 लाख मिलते हैं। देखने में ये रक़म बड़ी लगती है। और अक्सर इतनी रक़म एक साथ पहले कभी नहीं मिली होती। ऐसे में अक्सर लोगों को लगता है कि वो खुल कर ख़र्च कर सकते हैं। एक आसान सा गुणा-भाग बताता है कि ₹50 लाख से हर महीने ₹25 हज़ार निकालें तो ये रक़म कम-से-कम 15 साल चलेगी, है न? इससे भी बड़ी बात है कि रिटायर होने वाले महसूस करते हैं कि क्योंकि पैसा फ़िक्स डिपॉज़िट या किसी सरकारी स्कीम में रखा है, तो पैसे कुछ बढ़ेंगे भी।

बदक़िस्मती से, इसे अटकल ही कहा जाएगा, और सच्चाई से इसका लेना-देना कम है। बुनियादी तौर पर, इस समस्या की वजह वो गहरा विश्वास है जिसमें माना जाता है कि रिटायरमेंट बचत 100 प्रतिशत 'सुरक्षित' एसेट क्लास में ही जमा करनी चाहिए।

ये एक भ्रम है, उनके लिए भी जिनकी बचत अच्छी-खासी है, क्योंकि रिटायरमेंट प्लानिंग में असल मुश्किल है महंगाई की भरपाई। अगर महंगाई साल में दो या तीन प्रतिशत के निचले स्तर पर ही रहे, तब तो पहले लिखे आंकड़े काम करते हैं। पर, सच तो ये है कि रुपए की गिरती हुई क्षमता, हमारी बचत पर ख़ूंख़ार हो जाती है। सालाना 6 प्रतिशत की मंहगाई दर पर रिटायरमेंट के 25वें साल में क़ीमतें क़रीब चार गुना बढ़ जाएंगी और तब बढ़ी हुई आमदनी की ज़रूरत होगी। और यही महंगाई दर अगर 2 प्रतिशत रहती है, तो दाम महज़ 1.6 गुना ही बढ़ेंगे। ये काफ़ी बड़ा फ़र्क़ है, है न? इसमें अहम ये है कि इस मानसिक कंपाउंडिंग और 'डि-कंपाउंडिंग' का ज्ञान, ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आने वाली चीज़ नहीं।

अगर आपको महीने भर के ख़र्च के लिए, आज ₹50,000 की ज़रूरत है, तो 10-12 साल बाद यही ज़रूरत क़रीब ₹1 लाख की होगी, और 20 साल बाद आप ₹1.5 लाख महीने से कम होने पर घर चलाने में संघर्ष करेंगे। न सिर्फ़ आपके पैसों का खाते से निकलना तेज़ हो जाएगा, बल्कि ज़्यादा पैसों की ज़रूरत के लिए बाक़ी के कैपिटल को भी बढ़ाने की ज़रूरत होगी। ये एक समस्या है और इसे सुलझाना आसान नहीं।

मेरे पास एक आसान सा नियम है, जो बताएगा कि बुढ़ापे में ग़रीबी के डर के बिना, ख़र्च के लिए कितने पैसे निकाले जा सकते हैं। पैसे निकालने की दर, महंगाई दर से ऊपर रखने के लिए आपको पैसे तभी निकालने होंगे जब आपकी बचत महंगाई दर से ज़्यादा कमा कर दे रही हो। इसे ध्यान से समझें। अगर आपकी बचत 8 प्रतिशत की दर से कमाई कर रही है, और महंगाई दर 6 प्रतिशत है, तो आपको हर साल केवल 2 प्रतिशत पैसे ही निकालने चाहिए। इससे कम-से-कम आपकी बचत महंगाई के साथ-साथ बढ़ेगी और ये पक्का हो जाएगा कि आपका बुढ़ापा ग़ुरबत की काली छाया में नहीं बीतेगा। इसका मायने है कि आपको अपना कुछ पैसा इक्विटी में निवेश करना होगा।

हालांकि, दूसरी कई चीज़ों की तरह पर्सनल फ़ाइनांस की सफलता सिर्फ़ नंबरों को समझ कर ही नहीं मिल जाती। बल्कि इसमें, निवेशक का मनोविज्ञान ज़्यादा अहमियत रखता है। ऊपर बताए तथ्य समझने में आसान होंगे, मगर डर को हरा पाना और सुरक्षा पाने की सहज प्रवृत्ति से उबर पाना हमेशा ही मुश्किल होता है। मैं उन्हें दोष नहीं देता जिनके लिए ऐसा करना मुश्किल है, पर हां, इससे बाहर निकलने का कोई दूसरा उपाय भी नहीं है।

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