
मेरा एक दोस्त दो अलग-अलग कंपनियों के सर्वर से अपना बिज़नस चलाता है. दोनों ही अमेरिका की हैं; आसानी से समझने के लिए उन्हें MBI और LLED नाम दे देते हैं. मेरा दोस्त LLED से बहुत प्रभावित था क्योंकि जब भी इस कंपनी के सर्वर कोई ख़राबी आती, एक सर्विस इंजीनियर कुछ ही घंटों के भीतर आता और सर्वर ठीक कर देता. एक बार, सर्वर रात के 1 बजे ख़राब हो गया और सुबह के 4 बजते-बजते उसे ठीक कर दिया गया. कितनी शानदार कंपनी है, है न? दूसरी तरफ़, MBI उतनी अच्छी कंपनी नहीं थी. सालों बीत गए मगर इसकी कस्टमर सर्विस के किसी इंसान ने एक नायक की तरह प्रकट होकर सर्वर की जान बचाने की एक भी सनसनीखेज़ घटना अंजाम नहीं दी. हुआ तो ये कि लोग भूल ही गए कि MBI नाम की कोई मशीन सर्वर रूम में है भी, और इस गुमनाम मशीन पर कंपनी का काफ़ी काम चल रहा है.
अब सवाल है कि कौन से फ़ाइनेंशियल सिस्टम का रेग्युलेशन बेहतर होगा, पहला वो, जिसमें सरकार को ख़ाता-धारकों के फ़ंड बचाने के लिए अक्सर मैदान में कूदना पड़ता हो? या वो सिस्टम, जिसमें ऐसा कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती? और आप ये भी बताइए कि इन दोनों में से कौन सी कंपनी अनगिनत छोटे और मझोले साइज़ के बैंकों की याद दिलाती है, जिनके ठप्प पड़ जाने पर अमेरिकी सरकार तुरत-फुरत में उन्हें बचाने के लिए मैदान में उतर पड़ती है? और ज़ाहिर है, अमेरिकी सरकार ने बैंकों को बचाने के अपने काम की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए कहा कि "ये हमारे बैंकिंग सिस्टम में लोगों के भरोसे को मज़बूत करने के लिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने का निर्णायक क़दम है..." सरकारें हमेशा यूं ही अपने बारे में बढ़-चढ़ कर बातें करती ही हैं. पर जहां ये बयान कहता है कि 'लोगों के भरोसे को मज़बूत करने के लिए,' असल में उन्हें कहना चाहिए कि, 'लोगों के बिखरे हुए भरोसे को थोड़ा सा वापस लाने के लिए', और तब ये बात असलियत के ज़्यादा क़रीब लगेगी.
शुरुआत में तो सिलिकन वैली बैंक का घुटनों पर आ जाना चाय की प्याली में तूफ़ान जैसा लगा, और समझा ये गया कि इसका असर इस बैंक के एक ही सेक्टर के सीमित कस्टमर बेस तक ही रहेगा, जो ज़्यादातर कैलिफ़ोर्निया में है. हालांकि, बैंकिंग संकट तेज़ी से वैश्विक संकट में तब्दील होने की फ़ितरत वाले होते हैं. पंद्रह साल पहले एक ऐसी स्टेज थी, जब हम बेयर स्टर्न्स (Bear Stearns) नाम के इन्वेस्टमेंट बैंक के दो-एक म्यूचुअल फ़ंड्स में रिडेम्शन के कुछ मसले देख रहे थे, और फिर दुनिया जानती है उसके बाद क्या हुआ. और पिछले हफ़्ते, दुनिया भर के मार्केट्स ने दिखाया कि हर किसी को 2008 साफ़-साफ़ याद है. पर अचरज इस बात पर है कि दुनिया भर के स्टार्ट-अप जिन्होंने अमेरिकी फ़ंडिंग ली थी, उनका पैसा SVB में था. अकेले भारत में ही ऐसी 40 कंपनियां हैं!
अमेरिकी सरकार के 'निर्णायक' क़दम ने पक्का कर दिया कि कोई भी डिपॉज़िटर अपना पैसा नहीं गंवाएगा, चाहे वो SVB हो या कोई दूसरा बैंक जो ढहने की कगार पर है, जैसे - सिग्नेचर बैंक. कुछ और बैंक भी इसी रास्ते पर न चल पड़ें इसलिए असरदार और 100 प्रतिशत सुरक्षा देने वाले उपायों की घोषणाएं अमेरिकी सरकार ने की हैं. दरअसल मौजूदा संकट के पहले, अमेरिका में डिपॉज़िट इंश्योरेंस की सीमा 2.5 लाख डॉलर थी. अब, सरकार की घोषणा के बाद ये सीमा अनंत हो गई है, क्योंकि अमेरिकी सरकार का बैंकों के ढह जाने का डर के भी अनंत कारण हैं.
भारत में, डिपॉज़िट की इंश्योरेंस सीमा ₹5 लाख है, तीन साल पहले ही इसे ₹1 लाख से बढ़ा दिया गया था. ₹5 लाख काफ़ी पैसा होता है, डिपॉज़ट इंश्योरेंस और क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (DICGC) की वेबसाइट का डेटा दिखाता है कि इस सुरक्षा के दायरे में 97.9 प्रतिशत अकाउंट आ जाते हैं. हालांकि, जब आप इस सुरक्षा गारंटी को पूरे डिपॉज़िट के अनुपात में देखते हैं, तो पता लगता है कि कुल रक़म का आधे से कम (49 प्रतिशत) ही सुरक्षित है. यानी, इसका मतलब हुआ कि बड़ी संख्या में बिज़नस डिपॉज़िट सुरक्षित नहीं है. अगर बैंक फ़ेल होते हैं, तो बहुत से बिज़नस कस्टमर परेशानी में पड़ जाएंगे, और कुछ तो ख़ुद ही फ़ेल हो सकते हैं. SVB में ठीक यही दिक़्क़त थी और इसीलिए अमेरिकी सरकार को डिपॉज़िट की सुरक्षित रक़म पर लगी सीमा हटानी पड़ी. साफ़ है कि रेग्युलेटर ये नहीं चाहते कि कोई भी बैंक फ़ेल हो.
हालांकि, बैंक फ़ेल होते हैं, और अगर आप DICGC की वेबसाइट पर जाएंगे, तो देखेंगे कि चार या पांच छोटे कोऑपरेटिव बैंकों के खाताधारकों को कहा जा रहा है कि वो इंश्योरेंस के दायरे में आने वाली रक़म के लिए अपने क्लेम फ़ाइल करें. हर बैंक के लिए क्लेम फ़ाइल करने की आख़िरी तारीख़ भी दी गई है. बदक़िस्मती से भारत में रिकवरी की प्रक्रिया काफ़ी ज़्यादा लाल-फीताशाही के तले दबी हुई है और अमेरिका के मुक़ाबले दोयम दर्जे की है. भारत की तरह अमेरिका में लोगों को क्लेम नहीं फ़ाइल करना पड़ता; अमेरिकियों का पैसा जो गारंटी की सुरक्षा के दायरे आता है, वो पहले की तरह ही इस्तेमाल के लिए उनके बैंक अकाउंट में बना रहता है. बदक़िस्मती से हमारे यहां, यानी जिस देश ने UPI जैसा दुनिया का सबसे शानदार फ़ाइनेंशियल सिस्टम बनाया है, वो बैंकिंग क्लेम के सिस्टम को लेकर अब भी साठ के दशक में ही छूट गया है. और अब इसे दुरुस्त करने का वक़्त आ गया है.