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Market @ all-time high: कहां निवेश कर रहे हैं फ़ंड मैनेजर?

एक ने तो 'ज़बरदस्त मुनाफ़े के लिए भीड़ से विपरीत जाने' पर ज़ोर दिया

एक ने तो 'ज़बरदस्त मुनाफ़े के लिए भीड़ से विपरीत जाने' पर ज़ोर दिया

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भारत के इक्विटी मार्केट में दमदार तेज़ी देखने को मिल रही है. इस साल विदेशी निवेशकों ने जहां ₹1.2 लाख करोड़ का निवेश किया है, वहीं घरेलू म्यूचुअल फ़ंड्स (mutual funds) में ₹60,000 करोड़ से ज़्यादा का निवेश किया है. इसी का नतीजा है कि सेंसेक्स ने इस साल, अभी तक डबल डिजिट के आसपास ग्रोथ दर्ज की है. बाज़ार के मौजूदा जोश को देखते हुए, हमने चार प्रमुख फ़ंड मैनेजर्स से बात करने और आगे के लिए उनकी स्ट्रैटजी को समझने का फ़ैसला किया.

वैलुएशन और स्ट्रैटजी
मार्केट के ऊपरी स्तरों पर होने के कारण, सभी फ़ंड मैनेजर मार्केट वैलुएशन को लेकर सतर्क थे.

निकेत शाह (मोतीलाल ओसवाल म्यूचुअल फ़ंड में फ़ंड मैनेजर है)
मोतीलाल ओसवाल (Motilal Oswal Mutual Fund) में फ़्लेक्सी-कैप और मिड-कैप फ़ंड का मैनेजमेंट संभालने वाले शाह (Niket Shah) बताते हैं कि मिड-कैप का वैलुएशन अपने पांच और 10 साल की एवरेज से थोड़ा ज़्यादा है.

वो निकट भविष्य में मार्केट को लेकर भी 'सतर्क' थे. उन्होंने कुछ समय कंसोलिडेशन जारी रहने की संभावनाएं जताते हुए कहा, "मौजूदा हालात को देखते हुए, हम इंडेक्स में सेक्टर का फेरबदल देख सकते हैं और हम पूरे मार्केट को लेकर अलर्ट हैं. कुल मिलाकर, आने वाले समय में ज़्यादा तेज़ी दिखने की संभावना कम है और कुछ कंसोलिडेशन नज़र आ सकता है."

आगे के लिए स्ट्रैटजी
भले ही स्मॉल-कैप कंपनियों ने बहुत अच्छा परफ़ॉर्म किया है, लेकिन मोतीलाल ओसवाल उनमें मौक़े खोजना जारी रखेगा. (निप्पॉन इंडिया और टाटा ने हाल ही में अपने स्मॉल-कैप फ़ंड्स में एकमुश्त निवेश लेना बंद कर दिया है, इस फ़ैसले को देखते हुए ये काफ़ी मुश्किल लगता है.)

वो IT सेक्टर पर ख़ासे बुलिश हो गए हैं, क्योंकि उन्हें उनके निचले स्तर पर पहुंचने के संकेत दिख रहे हैं. वहीं, वो फ़ाइनेंशियल्स पर अंडरवेट हो रहे हैं, क्योंकि बीते दो साल में उनका परफ़ॉर्मेंस मज़बूत रहा है और उन्हें एसेट क्वालिटी में गिरावट और क्रेडिट ग्रोथ धीमी होने की आशंकाओं का सामना करना पड़ सकता है. उन्होंने कहा, "इस तरह की उथल-पुथल में अल्फ़ा जेनेरेट करने के लिए आपको आम राय के खिलाफ़ चलना चाहिए."

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विनीत सांबरे (DSP म्यूचुअल फंड में इक्विटी हेड)
सांबरे भी इस समय सतर्क हैं और उन्होंने कहा कि भले ही वो भारत की ढ़ाचागत लॉन्ग-टर्म स्टोरी पर ज़ोर दे रहे थे, लेकिन हाल में आई तेज़ी को मैनेज करने की ज़रूरत है क्योंकि "फ़ंडामेंटल्स की तुलना में मार्केट का वैलुएशन तेज़ी से बढ़ा है."

उन्होंने कहा, "जब भी मार्केट में इतनी तेज़ी देखी गई है, तो फ़ंडामेंटल्स और वैल्यू के बीच असंतुलन का जोख़िम हमेशा बना रहता है. इसलिए, यहां से, या तो फ़ंडामेंटल्स को इस तेज़ी के साथ तालमेल बैठाने की ज़रूरत है या गिरावट आ सकती है या फिर आगे कंसॉलिडेशन बढ़ेगा."

"जो निवेशक ऊंचे मल्टीपल्स पर आ रहे हैं (जब मार्केट ऑल टाइम हाई लेवल पर हो), उन्हें रिटर्न पाने के लिए सब्र रखना चाहिए. जो लोग कम समय के लिए निवेश करना चाहते हैं तो उन्हें तुरंत रिटर्न की उम्मीद नहीं करनी चाहिए."

उनकी स्ट्रैटजी
ये कहने के बावजूद, उनका अब भी मानना है कि "कुछ स्टॉक ऐसे हैं, जो दो साल के नज़रिए से अच्छी स्थिति में हैं." उनके अनुसार हेल्थकेयर भी इन्हीं हिस्सों में से एक है.

वहीं, इसके दूसरे सिरे पर कैपिटल गुड्स, इंजीनियरिंग और कंज़्यूमर डिस्क्रेशन हैं, जिनमें तेज़ी देखी गई है. यही कारण है कि इन सेगमेंट्स में "वो अपने दांव के आकार को लेकर सतर्क" हैं.

उन्होंने कहा कि, बाज़ार में तेज़ी के बावजूद, वो हाई क्वालिटी बिज़नस और अच्छी कंपनियों में निवेश बनाए रखते हैं क्योंकि उनका फ़ंड हाउस आमतौर पर बड़ी कैश कॉल नहीं लेता. उन्होंने कहा, "लंबे समय में (इस स्ट्रैटजी के साथ) ग़लत होने की संभावना बहुत कम या ना के बराबर होती है."

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नीलेश सुराना (मिराए एसेट इन्वेस्टमेंट्स में चीफ़ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर)
सुराना मार्केट को लेकर आशावादी हैं, लेकिन हाल के हफ़्तों में उन्होंने कच्चे तेल की ऊंची क़ीमतों को लेकर आने वाले समय के जोख़िम के तौर पर पहचान करते हुए अपने रुख में नरमी ला दी है.

भले ही, वो बैंकिंग और फ़ार्मा सेक्टर्स को निवेश के लिए सही मानते हैं, लेकिन हाई वैल्यूएशन के कारण, वो ख़ास तौर पर कैपिटल गुड्स और डिफ़ेन्स जैसे सेक्टर्स में स्मॉल-कैप शेयरों के प्रति आगाह करते हैं.

इसे ऐसे समझिए, मिड-कैप और स्मॉल-कैप दोनों इंडेक्स में लगभग 16 फ़ीसदी की ग्रोथ हुई है, जबकि कैपिटल गुड्स और डिफेंस सेगमेंट्स में क्रमशः 24.79 और 30 फ़ीसदी की ग्रोथ हुई है.

उनकी स्ट्रैटजी
उन्होंने कहा, "मार्केट के मौजूदा हालात में, आपको सेक्टर्स में सावधानी से स्टॉक चुनने पर ज़ोर देना चाहिए, क्योंकि अच्छी कमाई के मौक़े बहुत कम हैं."

हालांकि, सुराना का कहना है कि तीन साल से ज़्यादा टाइम लिमिट वाले निवेशक अभी भी मौजूदा स्तर पर मार्केट में एंट्री कर सकते हैं, लेकिन ऐसा व्यवस्थित तरीक़े से करना चाहिए.

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राहुल सिंह (टाटा म्यूचुअल फ़ंड में इक्विटी के चीफ़ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर)
सिंह ने भी कहा कि भारतीय मार्केट, बाक़ी के इमर्जिंग मार्केट के मुक़ाबले महंगा है.

उन्होंने GARP का एक निवेश स्ट्रैटजी के रूप में उल्लेख किया, जिसका उद्देश्य 'ग्रोथ' और 'वैल्यू' स्टाइल्स का सर्वोत्तम उपयोग करना है. उन्होंने कहा, "हम ग्रोथ एट रीज़नेबल प्राइस (GARP) की स्ट्रैटजी और वैल्यू स्टाइल में भरोसा करते हैं और पोर्टफ़ोलियो में बहुत ज़्यादा जोख़िम नहीं हैं."

उनकी स्ट्रैटजी
उन्होंने कहा कि उनका फ़ंड हाउस ना तो किसी भी सेक्टर पर जोश में है, ना ही किसी पर ओवरवेट है. वो केवल "कुछ मामूली गिरावट आने पर ही अच्छे से आगे बढ़ पाएंगे."

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