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सारांशः NPS है. EPF है. दोनों रिटायरमेंट के लिए हैं. लेकिन दोनों में से एक आपके पैसे को चुपचाप ग़लत दिशा में ले जा रहा है. और आपको पता भी नहीं चल रहा. 2025-26 में तीन नियम बदले जिन्होंने सब कुछ बदल दिया. जानिए क्या बदला और आपको अभी क्या करना चाहिए.
रिटायरमेंट के लिए पैसा जमा कर रहे हैं. हर महीने NPS में जा रहा है. सब ठीक लग रहा है. लेकिन एक बात जो शायद किसी ने नहीं बताई: आपका पैसा शायद उस जगह नहीं जा रहा, जहां जाना चाहिए.
47 साल की उम्र में अगर आप NPS के डिफ़ॉल्ट फ़ंड में बने हुए हैं तो बहुत मुमकिन है कि ज़्यादातर पैसा सरकारी बॉन्ड में चला गया हो. जबकि रिटायरमेंट अभी 12-15 साल दूर है.
यह ग़लती छोटी नहीं है. इसकी क़ीमत लाखों रुपये के नुक़सान के रूप में चुकानी पड़ सकती है.
"NPS में और पैसा लगाऊं या EPF बढ़ाऊं?" 40 के पार हर नौकरीपेशा भारतीय यह सवाल पूछता है. पहले दो बातें साफ़ कर लें. NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम) एक बाज़ार से जुड़ा रिटायरमेंट खाता है जो इक्विटी और बॉन्ड में पैसा लगाता है. EPF (एम्पलॉयीज़ प्रोविडेंट फ़ंड) सरकारी बचत है जो हर साल एक तय ब्याज देती है.
2025-26 में तीन नियम बदले: दिसंबर 2025 के PFRDA विड्रॉल नियम, मार्च 2026 की EPF दर और टैक्स साल 2026-27 से लागू नया इनकम टैक्स क़ानून. इसके बाद असली सवाल बदल गया. "कौन बेहतर है" अब सिर्फ़ प्रोडक्ट से नहीं, दो बातों से तय होता है: पैसा कहां लगा है और टैक्स रिज़ीम कौन सा है.
इस आर्टिकल में एक ज़रूरी बात है. पहले NPS में पैसे का एलोकेशन ठीक करें. फिर टैक्स रिज़ीम के हिसाब से NPS और EPF का रेशियो तय करें.
ग्लाइड पाथ आपकी उम्र के लिए नहीं बना
NPS में दो रास्ते हैं. एक्टिव चॉइस में आप तय करते हैं कि कितना निवेश इक्विटी में जाए. ऑटो चॉइस में सिस्टम एक तय फ़ॉर्मूले से तय करता है, जिसे ग्लाइड पाथ कहते हैं. ग्लाइड पाथ उम्र बढ़ने के साथ इक्विटी कम करता जाता है.
देर से शुरू करने वाले अक्सर ऑटो चॉइस चुनते हैं. सोच यह होती है कि उम्र के साथ जोख़िम ख़ुद कम होता जाएगा. यही दिक्कत है. पारंपरिक लाइफ़ साइकल फ़ंड में इक्विटी 35 साल की उम्र से घटने लगती है.
इसका मतलब क्या है? मान लीजिए आप 47 साल के हैं और मीडियम (LC50) या कंज़र्वेटिव (LC25) फ़ंड में हैं. आपका बड़ा हिस्सा पहले ही सरकारी बॉन्ड में जा चुका है. 50 साल की उम्र में LC50 में इक्विटी सिर्फ़ 20% रह जाती है और LC25 में महज़ 10%. यह बंटवारा 58 साल के इंसान के लिए सही है. 47 साल के लिए नहीं.
12-15 साल कोई कम समय नहीं है. इतने समय में इक्विटी के उतार-चढ़ाव झेलकर उसकी बढ़त पाई जा सकती है. ग्लाइड पाथ आपको बहुत जल्दी बॉन्ड में धकेल देता है और इसकी क़ीमत कम रिटर्न के रूप में चुकानी पड़ती है.
45 से 55 साल के लिए सही NPS मिश्रण
अक्तूबर 2024 में PFRDA ने इसका जवाब बैलेंस्ड लाइफ़ साइकल फ़ंड (BLC) के ज़रिये दिया. यह 45 साल की उम्र तक इक्विटी 50% रखता है और तभी घटाना शुरू करता है. जो निवेशक इक्विटी में रहना चाहते हैं लेकिन सबसे एग्रेसिव विकल्प नहीं चाहते, उनके लिए BLC सीधा रास्ता है.
नीचे दी गई टेबल सरकार के तय पैटर्न पर आधारित है (E = इक्विटी, C = कॉर्पोरेट बॉन्ड, G = सरकारी बॉन्ड):
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उम्र
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LC75 (E/C/G) | LC50 मीडियम | BLC संतुलित | LC25 कंज़रवेटिव |
|---|---|---|---|---|
| 45 | 35/20/45 | 30/20/50 | 50/30/20 | 15/25/60 |
| 50 | 20/20/60 | 20/15/65 | 40/20/40 | 10/15/75 |
| 55 | 15/10/1975 | 10/10/1980 | 35/10/55 | 05/05/1990 |
फ़र्क़ देखिए. 50 साल में BLC 40% इक्विटी रखता है, जबकि LC50 20% और LC25 सिर्फ़ 10% इक्विटी रखता है. सिर्फ़ फ़ंड बदलने से इक्विटी दोगुनी हो सकती है.
ज़्यादा कंट्रोल चाहिए तो एक्टिव चॉइस में जाएं जहां इक्विटी 75% तक जा सकती है. NPS में फ़ंड और स्कीम प्रेफ़रेंस साल में चार बार बदल सकते हैं; पेंशन फ़ंड 10 मैनेजरों में से चुनाव करके, साल में एक बार मैनेजर बदल सकता है. ग़लत फ़ंड में हैं तो बिना किसी जुर्माने के ठीक करें.
एक सावधानी. ज़्यादा इक्विटी का मतलब ज़्यादा उतार-चढ़ाव भी है. NPS इक्विटी फ़ंड ने लंबे समय में सालाना क़रीब 10-14% दिए हैं लेकिन यह नंबर साल-दर-साल काफ़ी बदलता है. एक साल का ऊंचा रिटर्न देखकर फ़ंड मत बदलिए. अपने समय और जोख़िम की समझ के हिसाब से फ़ैसला करें.
नोट: स्कीम A जो ऑल्टरनेटिव एसेट रखती थी, 16 जनवरी 2026 से बंद हो गई है.
NPS vs EPF नहीं, पुराना vs नया टैक्स रिज़ीम
पैसे का सही एलोकेशन होने के बाद अगला सवाल है टैक्स. यहीं ज़्यादातर तुलनाएं चूक जाती हैं. "NPS या EPF" का जवाब इस बात पर टिका है कि आप पुराने टैक्स रिज़ीम में हैं या नए में.
पुराने रिज़ीम में NPS का साफ़ फ़ायदा है. NPS ही एकमात्र तरीक़ा है जो सेक्शन 80C की ₹1.5 लाख लिमिट से अलग, सेक्शन 80CCD(1B) के तहत ₹50,000 की अतिरिक्त छूट देता है. EPF, PPF और ELSS सब उसी ₹1.5 लाख में आते हैं. तो पुराने रिज़ीम में यह ₹50,000 वाला फ़ायदा EPF नहीं दे सकता.
नए रिज़ीम में यह फ़ायदा नहीं मिलता. यहां 80CCD(1) और 80CCD(1B) दोनों काम नहीं करते. सिर्फ़ सेक्शन 80CCD(2) यानी कंपनी का योगदान बचता है. हाल के बदलावों के बाद प्राइवेट सेक्टर की कंपनी भी बेसिक+DA का 14% तक NPS में डाल सकती है, वो भी पूरी तरह टैक्स-फ़्री. EPF में कंपनी का योगदान 12% पर रुकता है. तो नए रिज़ीम में अगर कंपनी NPS में पैसा डालने को तैयार है तो NPS टैक्स के लिहाज़ से ज़्यादा फ़ायदेमंद रास्ता है.
एक नज़र में टैक्स फ़ायदे
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फ़ीचर
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NPS (Tier-1) | EPF/VPF |
|---|---|---|
| पुराने रिज़ीम में टैक्स बचत | 80CCD(1): ₹1.5L में; 80CCD(1B): अतिरिक्त ₹50,000 | 80C में ₹1.5L तक |
| नए रिज़ीम में टैक्स बचत | सिर्फ़ 80CCD(2) कंपनी; 80CCD(1)/(1B) नहीं | कोई अतिरिक्त नहीं |
| कंपनी का हिस्सा | 14% तक | 12% तक |
| बढ़त | टैक्स-फ़्री | EEE लेकिन शर्तों के साथ |
| विड्रॉल | 60% एकमुश्त टैक्स-फ़्री; पेंशन आमदनी पर टैक्स | 5 साल नौकरी के बाद पूरी विड्रॉल टैक्स-फ़्री |
आंकड़ों में देखें
मान लीजिए सुरेश का बेसिक+DA ₹12 लाख सालाना है और वो 30% टैक्स स्लैब में हैं.
ओल्ड रिज़ीम में: 80CCD(1B) के तहत ₹50,000 NPS में डालने से क़रीब ₹15,600 टैक्स बचेगा (30% + 4% सेस). EPF यह बचत नहीं दे सकता क्योंकि वो उसी ₹1.5 लाख 80C लिमिट में है.
न्यू रिज़ीम में: उनका अपना योगदान कुछ नहीं बचाता. लेकिन अगर कंपनी बेसिक+DA का 14% यानी ₹1.68 लाख 80CCD(2) के तहत NPS में डाले तो पूरी रक़म टैक्स-फ़्री रहेगी. अगर यह ₹1.68 लाख तनख़्वाह के रूप में आता तो क़रीब ₹52,400 टैक्स लगता. नए रिज़ीम में NPS का असली फ़ायदा यही है.
2026 का एक और बदलाव: नए इनकम टैक्स क़ानून 2025 में सेक्शन 80CCD की जगह टैक्स साल 2026-27 से सेक्शन 124 आएगी. नियम वही रहेंगे, सिर्फ़ सेक्शन का नंबर बदलेगा.
यह भी पढ़ें: NPS vs PPF vs EPF: बेस्ट रिटायरमेंट इन्वेस्टमेंट
EPF का छुपा टैक्स: अब पूरी तरह टैक्स-फ़्री नहीं
EPF की पहचान उसके भरोसेमंद रिटर्न से है. फ़ाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए EPFO ने दर 8.25% पर बनाए रखी. यह फ़ैसला 2 मार्च 2026 को 239वीं सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ की बैठक में हुआ. वित्त मंत्रालय की मंज़ूरी के बाद ब्याज जून से अगस्त 2026 के बीच जमा हो सकता है. यह लगातार तीसरे साल दर 8.25% है.
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साल
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EPF दर |
|---|---|
| 2025-26 | 8.25% |
| 2024-25 | 8.25% |
| 2023-24 | 8.25% |
| 2022-23 | 8.15% |
| 2021-22 | 8.10% |
| 2020-21 | 8.50% |
नियम सीधे हैं. कर्मचारी बेसिक+DA का 12% देता है, कंपनी भी उतना ही जमा करती है. तय तनख़्वाह की लिमिट ₹15,000 प्रति माह है. ज़्यादा बचाना हो तो VPF (वॉलेंटरी प्रोविडेंट फ़ंड) के ज़रिए बेसिक सैलरी का 100% तक उसी 8.25% पर डाल सकते हैं. कंपनी इस अतिरिक्त रक़म के बराबर जमा करने के लिए बाध्य नहीं है.
लेकिन यहां एक बात है जो ज़्यादा कमाने वालों को चुभती है. EPF की पुरानी EEE यानी तीनों टैक्स-फ़्री वाली पहचान अब बिना शर्त नहीं रही.
₹2.5 लाख की लिमिट: फ़ाइनेंशियल ईयर 2021-22 से कर्मचारी के ₹2.5 लाख से ज़्यादा सालाना योगदान पर मिला ब्याज टैक्स के दायरे में है. TDS भी लगता है. जिनमें कंपनी का योगदान नहीं होता, जैसे GPF धारक, उनकी लिमिट ₹5 लाख है.
5 साल का नियम: लगातार 5 साल की नौकरी से पहले विड्रॉल टैक्स के दायरे में आ सकती है और 10% TDS भी लग सकता है.
बजट 2026: पहले 12% से ज़्यादा कंपनी योगदान को एक टैक्स योग्य सुविधा माना जाता था. यह नियम ख़त्म हो गया. अब सिर्फ़ ₹7.5 लाख की कुल लिमिट (EPF, NPS और सुपरएन्युएशन मिलाकर) मायने रखती है.
बात साफ़ है. अगर VPF से ज़ोरदार बचत करते हैं और सालाना EPF+VPF योगदान ₹2.5 लाख पार करता है तो उस अतिरिक्त रक़म का ब्याज अब टैक्स के दायरे में है.
₹1 करोड़ का हिसाब
मान लीजिए सुरेश 47 साल के हैं, 60 पर रिटायरमेंट तक 13 साल बचे हैं. वो हर महीने ₹30,000 बचाना चाहते हैं यानी 13 साल में कुल ₹46.8 लाख. यह सिर्फ़ नए योगदान पर है, मौजूदा बैलेंस अलग:
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रास्ता
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अनुमानित दर | अनुमानित फ़ंड (13 साल में) |
|---|---|---|
| EPF/VPF | 8.25% (गारंटीड) | ₹83 लाख |
| NPS | 9% | ₹88 लाख |
| NPS | 10% | ₹95 लाख |
| NPS | 11% | ₹1.03 करोड़ |
पहली नज़र में NPS आगे दिखता है. 11% पर ₹1 करोड़ पार करता है, EPF उसी योगदान से ₹83 लाख पहुंचता है. लेकिन असली तस्वीर टैक्स और पेंशन के बाद बनती है.
EPF का ₹83 लाख, अगर ₹2.5 लाख सालाना लिमिट में रहे तो लगभग पूरा टैक्स-फ़्री हाथ में आता है. NPS के ₹1.03 करोड़ का हिसाब अलग है (30% स्लैब मानते हुए):
- 60% यानी ₹61.8 लाख पूरी तरह टैक्स-फ़्री.
- अगर पूरे 80% यानी ₹82.4 लाख निकाले तो 60% से ऊपर का 20% यानी ₹20.6 लाख पर स्लैब दर से टैक्स लगेगा, क़रीब ₹6.4 लाख. तो यह 20% हाथ में लाएगा ₹14.2 लाख.
- बचा 20% यानी ₹20.6 लाख पेंशन में जाता है. 6% पर क़रीब ₹1.24 लाख सालाना, जो हर साल टैक्स के दायरे में होगी.
हाथ में कुल एकमुश्त: क़रीब ₹76 लाख, साथ में आजीवन पेंशन. EPF की तुलना में ₹83 लाख लगभग पूरा टैक्स-फ़्री. यानी NPS का काग़ज़ पर ₹20 लाख का फ़ायदा 30% स्लैब वाले के लिए टैक्स और पेंशन के बाद लगभग ख़त्म हो जाता है. कम स्लैब में और नए रिज़ीम में ₹12 लाख की छूट के साथ हिसाब NPS की तरफ़ झुकता है.
नोट: NPS के लिए 9, 10 और 11% सिर्फ़ अनुमानित संभावनाएं हैं. NPS रिटर्न बाज़ार से जुड़े हैं, गारंटीड नहीं. EPF की 8.25% दर सरकार हर साल तय करती है.
80% निकाल सकते हैं, लेकिन 60% ही टैक्स-फ़्री है
NPS की एक बड़ी शिकायत थी कि पैसा बंद रहता है और 40% पेंशन में लगाना पड़ता है. दिसंबर 2025 में PFRDA ने यह बदल दिया. PFRDA के नए विड्रॉल नियम 2025 के तहत, ख़ासकर ग़ैर-सरकारी सदस्यों के लिए:
- ज़रूरी पेंशन हिस्सा 40% से घटकर 20% हो गया.
- अब 80% तक एकमुश्त निकाल सकते हैं.
- ₹8 लाख तक का फ़ंड 100% एकमुश्त; ₹8-12 लाख में ₹6 लाख तक एकमुश्त, बाकी SUR या पेंशन (या 80/20); ₹12 लाख से ऊपर 80/20 का बंटवारा.
- 5 साल का लॉक-इन ख़त्म. और 60 से पहले 80/20 वाला फ़ायदा तभी मिलेगा जब NPS में कम से कम 15 साल पूरे हों.
- SLW और SUR जैसे नए विकल्प म्यूचुअल फ़ंड के SWP की तरह काम करते हैं, किश्तों में विड्रॉल ताकि टैक्स कई सालों में बंटे.
लेकिन एक ज़रूरी बात जो अक्सर नज़रअंदाज़ होती है. PFRDA 80% विड्रॉल की इजाज़त देता है लेकिन टैक्स क़ानून सिर्फ़ 60% को टैक्स-फ़्री रखता है (पुराने क़ानून में सेक्शन 10(12A); नए क़ानून में यह प्रावधान जारी रहता है). 60 और 80% के बीच का 20% आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स के दायरे में है. यह नियामक और टैक्स का बेमेल अभी हल नहीं हुआ है.
पेंशन के 20% पर भी एक बात. पेंशन दरें आमतौर पर 5-6% के आसपास होती हैं और मिलने वाली आमदनी टैक्स के दायरे में होती है. यह हिस्सा सुरक्षा देता है लेकिन रिटर्न सबसे कमज़ोर है.
राहत यह है कि नए रिज़ीम में ₹12 लाख की छूट उस टैक्स योग्य 20% का बोझ हल्का करती है, ख़ासकर उनके लिए जो रिटायरमेंट के पहले साल न्यू टैक्स रिज़ीम चुनते हैं.
रिटायरमेंट से पहले पैसा: कितनी आसानी से मिलेगा
रिटायरमेंट से पहले पैसा चाहिए तो दोनों के नियम अलग हैं.
EPF तय ज़रूरतों के लिए पैसा देता है: इलाज, घर, बच्चे की पढ़ाई या शादी और नौकरी जाने पर. EPFO ने इन दावों के जल्दी निपटान की लिमिट ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹5 लाख कर दी है. नौकरी छोड़ने के दो महीने बाद पूरा बैलेंस निकाल सकते हैं.
NPS में खाता खोलने के तीन साल बाद अपने योगदान का 25% तक विड्रॉल की इजाज़त है. दिसंबर 2025 के नियमों के बाद यह जीवन में चार बार तक हो सकता है और बीमारी के लिए तय सूची की ज़रूरत नहीं रही. सीमित मदद के लिए एक नया रास्ता भी जोड़ा गया है.
सीधी बात: तुरंत ज़रूरत के लिए EPF का रास्ता आमतौर पर आसान है. NPS की सुविधा बेहतर हुई है लेकिन अभी भी शर्तें और लिमिट्स हैं.
आपके लिए कौन सा विकल्प सही?
"NPS या EPF" का जवाब तीन सवालों से मिलता है, इसी क्रम में.
1. आप किस टैक्स रिज़ीम में हैं?
पुराना टैक्स रिज़ीम: NPS का 80CCD(1B) वाला ₹50,000 लीजिए. बाकी बचत के लिए EPF/VPF एक मज़बूत, गारंटीड आधार है.
न्यू टैक्स रिज़ीम: आपका अपना NPS योगदान कोई छूट नहीं देता. असली मौक़ा है 80CCD(2). अगर कंपनी 14% तक NPS में डाले तो यह टैक्स के लिहाज़ से सबसे फ़ायदेमंद रास्ता है.
2. कितने साल बचे हैं और कितना जोख़िम ले सकते हैं?
12-15 साल बचे और उतार-चढ़ाव झेल सकते हैं: NPS में सही इक्विटी रखें (BLC या एक्टिव चॉइस). ग्लाइड पाथ को बहुत जल्दी बॉन्ड में न धकेलने दें.
कम साल बचे या जोख़िम से बचना चाहते हैं: EPF/VPF की तरफ़ झुकें. गारंटीड 8.25% इस उम्र में मायने रखता है.
3. रिटायरमेंट पर पैसा कैसे चाहिए?
बड़ी एकमुश्त ज़रूरत (इलाज, क़र्ज़, परिवार): NPS का नया 80% एकमुश्त और SLW लचीलापन देते हैं, बशर्ते टैक्स वाले 20% का हिसाब रखें.
नियमित तय आमदनी: पेंशन या EPF का मिश्रण.
नतीजा "एक चुनो, दूसरा छोड़ो" नहीं है. 40 के पार के लिए समझदार स्ट्रैटेजी अक्सर मिश्रण है: EPF/VPF जो भरोसेमंद आधार देता है, और NPS (सही बंटवारे और सही रिज़ीम में) बढ़त और टैक्स की बचत का ज़रिया.
अभी तीन काम करें
पहला: अपना रिज़ीम तय करें. पुराने या नए रिज़ीम में होना NPS और EPF के रेशियो का फ़ैसला करता है.
दूसरा: NPS का बंटवारा जांचें. ऑटो चॉइस LC50 या LC25 में हैं और 12+ साल बचे हैं? BLC या एक्टिव चॉइस देखें. स्कीम प्रेफ़रेंस साल में चार बार और पेंशन फ़ंड मैनेजर साल में एक बार बदल सकते हैं.
तीसरा: VPF लिमिट देखें. यह पक्का करें कि सालाना EPF+VPF योगदान अनजाने में ₹2.5 लाख की टैक्स लिमिट पार न करे.
वैल्यू रिसर्च की राय
NPS हो या EPF, सही फ़ंड चुनना और सही स्ट्रैटिजी बनाना ज़रूरी है. वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपके गोल, जोख़िम और टैक्स रिज़ीम के हिसाब से सही राह दिखाने में मदद करता है.
आज ही फ़ंड एडवाइज़र एक्सप्लोर करें
यह भी पढ़ें: निजी पेंशन और सरकारी पेंशन में क्या अंतर है?
ये लेख पहली बार जून 15, 2026 को पब्लिश हुआ.



