Illustration: Anand Kumar
कुछ दिनों पहले, मुझे एक दिलचस्प ग्राफ़ दिखा जिसे देख कर दुनिया के कई लोग चौंक जाएंगे. उसमें दिखाया गया था कि पिछले दो साल में ही अमेरिकी सरकार के टैक्स रेवेन्यू में ब्याज के भुगतान का प्रतिशत, 20 से बढ़ कर 36 हो गया है. हम सभी जानते हैं कि बहुत ज़्यादा क़र्ज़ बुरा होता है. अपनी आमदनी के बराबर का क़र्ज़ तो और भी बुरा होता है. पर सबसे बुरा होता है ऐसा क़र्ज़, जिसके ब्याज का पेमेंट ही आपकी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा हो.
अगर आप गूगल सर्च बार में 'neither' टाइप करेंगे तो वाक्य को पूरा करने वाला इसका ऑटो फ़ीचर आपको एक वाक्य सुझाएगा जो शेक्सपीयर के हैमलेट की प्रसिद्ध लाइन है, 'Neither a borrower nor a lender be'. एक पिता की अपने बेटे को सलाह के तौर पर, शेक्सपीयर की कही ये बात आज सबसे जानी-मानी कहावतों में से एक है, और इसमें छुपी ज्ञान की झलक सब के लिए है.
मगर ये ज्ञान क्या है? ये है कि दुनिया में क़र्ज़ होना ही नहीं चाहिए. मॉडर्न फ़ाइनेंस और इन्वेस्टमेंट के नज़रिए से ये बात हास्यास्पद लगेगी. पूरे इतिहास में किसी भी आम फ़ाइनेंशियल लेनदेन में क़र्ज़ हमेशा ही नैतिक तौर पर नीची नज़र से देखा गया है, फिर चाहे अर्थव्यवस्था और व्यापारिक जीवन की बात हो, या निजी और पेशेवर ज़िंदगी की. इससे अक्सर पाप, और व्यक्तियों और संबंधों को बरबाद करने वाला, और नैतिक विफलता समझा गया, और आज भी जब व्यापार और वित्त की दुनिया में इसका बोलबाला है तब भी ऐसा ही है. रोज़मर्रा के आम लेनदेन में पैसा उधार लेना नैतिक नज़रिए से दोयम दर्जे पर देखे जाने के लिए उकसाता है.
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और जब आप दुनिया के सबसे बड़े क़र्ज़दार हों, और दुनिया का ज़्यादातर हिस्सा उसी पैसे से चल रहा हो जिसे आप चला रहे हों, तो आपकी समस्या हर किसी की समस्या हो जाती है. मेरे पास मैक्रोइकोनॉमिक्स की विशेषज्ञता नहीं है. हालांकि, ये स्पष्ट है कि कथित विशेषज्ञों में भी, कुछ मौजूदा आर्थिक स्थिति से चिंतित हैं जबकि कुछ दूसरे इसे अनदेखा कर रहे हैं. और मुझे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो आशावादी हो.
आप अचरज कर सकते हैं कि भारत में हमारे लिए इसकी क्या प्रासंगिकता है, क्योंकि हम घरेलू निवेश पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, हमारे बाज़ार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, और हमारी अर्थव्यवस्था असल में बहुत अच्छी तरह से काम कर रही है. पारंपरिक ज्ञान कहता है कि वास्तव में, ये काफ़ी ज़्यादा मायने रखता है. वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं, इसलिए अमेरिका में होने वाली आर्थिक उथल-पुथल दुनिया भर में हलचल पैदा करती है. वैश्विक वित्तीय बाज़ारों पर अपने प्रभुत्व के कारण, अमेरिका की अस्थिरता अक्सर दूसरी जगहों पर सुनामी का कारण बनती है. ये कहावत सच है कि जब अमेरिका को छींक आती है तो दुनिया को सर्दी लग जाती है. इसमें ये भी जोड़ा जा सकता है कि जब अमेरिका को सर्दी होती है, तो बाक़ी दुनिया को फ़्लू हो सकता है.
फिर भी, दुनिया भर में पैसे की जो तंगी महसूस की जा रही है, वो शायद इतनी बुरी बात नहीं है. ये तनाव की एक स्वागत लायक़ ख़ुराक हो सकती है जो मज़बूती देती है. इस बात पर कोई विवाद नहीं कि कभी-कभार होने वाला तनाव बाज़ार के लिए अच्छा है, आपके निवेश के लिए अच्छा है, और व्यापार के लिए अच्छा है, ठीक उसी तरह जैसे ज़ोरदार कसरत का तनाव असल में शरीर के लिए अच्छा होता है. और इसके कई कारण हैं.
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कचरा साफ़ हो जाता है. जब पैसा आसान होता है, तो बुनियादी तौर पर कमज़ोर व्यवसाय वाली कंपनियां, कहीं ज़्यादा मज़बूत होने का भ्रम पैदा कर सकती हैं. चुनौती भरा समय, अक्सर लोगों को मज़बूत बना देता है. एक प्रचलित कहावत है कि 'जब आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है, तो मुश्किल भी आगे बढ़ जाती है'. जैसा कि हमने महामारी के दौरान और उसके पहले के कई मुश्किल दौर में देखा है, और कई व्यवसाय इस लचीलेपन का उदाहरण देते हैं. जबकि सभी कंपनियां पीड़ित होती हैं, सबसे मज़बूत कंपनियां कम नुक़सान के साथ तूफ़ान का सामना करती हैं, तेज़ी से ख़ुद को ढालती हैं, और तेज़ी से वापसी करती हैं. इसका नतीजा होता है कि वो प्रतिस्पर्धियों से और आगे निकल जाती हैं. बेहतर तरीक़े से मैनेज किए गए बिज़नस, किसी संकट का ज़्यादा असरदार ढंग से जवाब देते हैं, और इसी वजह से बड़े पैमाने पर पुरस्कार भी पाते हैं.
जहां तक वैश्विक आर्थिक मंदी की संभावना की बात है, तो ये कहना सही होगा कि 'जो चीज़ आपको नहीं मारती वो आपको मज़बूत बनाती है.' जो अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक मंदी के दौरान एडजस्ट कर सकती हैं, और ग्रो कर सकती हैं, वो ज़्यादा स्वस्थ और ज़्यादा लचीली बनकर उभरती हैं - एक बार के लिए, इसका होना बुरा नहीं है.
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