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Gilt Funds: यही वक़्त है इनसे फ़ायदा उठाने का?

ब्याज़ दरों में गिरावट इनमें चार चांद लगा सकती है, पर निवेश से पहले कुछ सावधानियां जान लीजिए.

ब्याज़ दरों में गिरावट इनमें चार चांद लगा सकती है, पर निवेश से पहले कुछ सावधानियां जान लीजिए.

कई विशेषज्ञों का मानना है कि ब्याज़ दरें अपने सबसे ऊंचे स्तर पर हैं और जल्द ही भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इनमें कटौती कर सकता है. अगर ऐसा हुआ, तो गिल्ट फ़ंड्स और भी फ़ायदे का सौदा हो जाएंगे.

वजह: ब्याज़ दर में बदलाव का डेट फ़ंड्स के रिटर्न पर उल्टा असर पड़ता है. ख़ासकर उन फ़ंड्स पर, जो बांड्स में मीडियम या लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट करते हैं. जब RBI ब्याज़ दरें बढ़ाता है, तो इन फ़ंड्स का रिटर्न कम हो जाता है; और जब ब्याज़ दरें गिरती हैं, तो आम तौर पर इनका रिटर्न बढ़ जाता है.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब RBI ब्याज़ दरें कम करता है, तो नए बांड्स पर दी जाने वाली ब्याज़ दर कम हो जाती है. इसलिए, जो बांड्स पहले जारी किए गए थे और ज़्यादा ब्याज़ दे रहे हैं, वे और ज़्यादा क़ीमती हो जाते हैं. नतीजा, पुराने बांड्स की क़ीमत बढ़ जाती है, जिससे इनमें निवेश करने वाले डेट फ़ंड्स का रिटर्न बढ़ जाता है.

और चूंकि गिल्ट फ़ंड्स सरकारी बांड्स में निवेश करते हैं, जो आप तौर पर लॉन्ग-टर्म वाले होते हैं, इसलिए उन पर ब्याज़ दर में बदलाव का बड़ा असर होता है. मिसाल के तौर पर, जब 2020 में COVID के समय ब्याज़ दरों में कटौती की गई थी, तो गिल्ट फ़ंड्स का रिटर्न 12 फ़ीसदी से भी ज़्यादा हो गया था; और जब RBI ने दरें बढ़ाईं, तो गिल्ट फ़ंड्स ने सिर्फ़ तीन फ़ीसदी का मुनाफ़ा दिया.

अब, निवेशकों की उम्मीद के मुताबिक़ अगर इस साल ब्याज़ दरों में गिरावट आई, तो सवाल उठेगा कि क्या कम समय में ज़्यादा मुनाफ़े के लिए गिल्ट फ़ंड्स में निवेश करना चाहिए?

गिल्ट फ़ंड्स में निवेश कब करें?
जैसा ऊपर बताया गया, सरकारी बांड्स आमतौर पर लॉन्ग टर्म के लिए होते हैं, यही वजह है कि गिल्ट फ़ंड्स में ब्याज़ दर से जुड़ा जोख़िम काफ़ी ज़्यादा होता है, ख़ासकर शॉर्ट-टर्म फ़ंड्स की तुलना में.

इसलिए, निवेशकों को गिल्ट फ़ंड्स से जुड़े जोख़िम का ख़ास ध्यान रखना चाहिए. इन फ़ंड्स से मुनाफ़ा कमाने के लिए ब्याज़ दर में उतार-चढ़ाव का सटीक अनुमान लगाना होगा. एक ग़लत फ़ैसला काफ़ी महंगा पड़ सकता है.

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आपको क्या करना चहिए
क्योंकि गिल्ट फ़ंड्स, ब्याज़ दरों पर बहुत ज़्यादा निर्भर करते हैं, इसलिए वे आपके पोर्टफ़ोलियो का मुख्य हिस्सा नहीं होने चाहिए. बेहतर होगा कि आप इन फ़ंड्स में टैक्टिकल या सप्लीमेंट्री एलोकेशन (अतिरिक्त निवेश) करें. ये बात उन निवेशकों पर भी लागू होती है, जो सोचते हैं कि वे ब्याज़ दरों में उतार-चढ़ाव का सटीक अंदाज़ा लगा सकते हैं.

हमारा सुझाव
फ़िक्स-इनकम चाहने वाले निवेशकों के लिए, अपनी पूंजी को बचा के रखना सबसे ज़रूरी है. इसलिए, उनके लिए अच्छी क्वालिटी वाले शॉर्ट-टर्म डेट फ़ंड सबसे अच्छा विकल्प हैं. ऐसे फ़ंड आपके फ़िक्स-इनकम पोर्टफ़ोलियो का बड़ा हिस्सा होने चाहिए. चूंकि शॉर्ट-टर्म फ़ंड को एक से लेकर तीन साल तक की मैकाले ड्यूरेशन बरक़रार रखना ज़रूरी है (जिसके कारण इनके पोर्टफ़ोलियो में ज़्यादातर बांड्स एक-जैसी अवधि के होते हैं), ये फ़ंड बाक़ियों की तुलना में स्थिर होते हैं, जो ग्राफ़ में देखा जा सकता है.

अपने डेट (debt) इन्वेस्टमेंट में जोख़िम भरे फ़ैसले लेने से आपके निवेश का पूरा मक़सद बेकार हो सकता है. अगर आपका मक़सद वेल्थ बनाना है, तो हमारा सुझाव है कि आप इक्विटी फ़ंड्स पर फ़ोकस करें. पर अगर आप सुरक्षित निवेश करना चाहते हैं, तो ऐसे डेट फ़ंड चुनें, जो अच्छी क्वालिटी वाले हों और जिनमें ब्याज़ दर से जुड़ा जोख़िम कम से कम हो.

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