फ़ंड एडवाइज़र

इस बार रिकवरी पिछली तीन जैसी नहीं दिखेगी

पिछले एक दशक में हर रिकवरी V-शेप में आई थी, इस बार शायद ऐसा नहीं होगा

पिछले एक दशक में हर रिकवरी V-शेप में आई थी, इस बार शायद ऐसा नहीं होगाVinayak Pathak/AI-Generated Image

करीब 30 सालों से, जब भी बाज़ार तेज़ी से गिरा है, Value Research की सलाह एक ही रही है: निवेश बनाए रखें. रिकवरी होगी. और 30 सालों में यह सलाह किसी गहरी दूरदर्शिता की वजह से सही साबित नहीं होती रही है, बल्कि इसलिए कि बाज़ार एक ख़ास तरीक़े से काम करता है. वो एकबारगी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है, ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया देता है और फिर जब फ़ंडामेंटल्स हावी होते हैं, तो ख़ुद को ठीक कर लेता है.

रिकॉर्ड इसकी गवाही देता है. 2020 का कोविड क्रैश: Sensex 10 हफ़्तों में 38 प्रतिशत गिरा. आठ महीने बाद, मार्केट ने पूरी तरह वापसी कर ली. नोटबंदी: 11 प्रतिशत की गिरावट, चार महीने में नई ऊंचाई. 2013 का सुस्ती का दौर: 29 दिनों में 12 प्रतिशत नीचे.

अगर यही वो मार्केट हिस्ट्री है जो आप जानते हैं, तो आपने एक ख़ास सबक़ सीखा है: टिके रहो. V-शेप आएगा ही.

और यही वजह है कि अभी जो हो रहा है, उस पर अलग नज़रिए से ध्यान देना ज़रूरी है.

पिछले एक दशक की हर V-शेप रिकवरी में असल नुक़सान सेंटिमेंट को हुआ था. घटनाएं सच्ची थीं, हां (लॉकडाउन, नोटबंदी, ग्लोबल सुस्ती), लेकिन इनमें से किसी ने भी भारतीय कंपनियों की कमाई करने की ताक़त को लंबे समय के लिए नहीं तोड़ा. सेंटिमेंट उबरा, कमाई टिकी रही, और V ख़ुद-ब-ख़ुद बन गया. फ़ंडामेंटल्स सही-सलामत रहे. इसीलिए हमारी सलाह काम आई.

इस बार कुछ और टूट रहा है. यह जंग फ़िज़िकल रिफ़ाइनिंग कैपेसिटी को तबाह कर रही है. अनुमान अलग-अलग हैं, लेकिन ग्लोबल कैपेसिटी का एक बड़ा हिस्सा पहले ही ऑफ़लाइन हो चुका होगा. और कोई नहीं जानता कि यह कब, या आख़िर वापस आएगा भी या नहीं. इसे रेट कट या पॉलिसी स्टेटमेंट से ठीक नहीं किया जा सकता. पेट्रोल, डीज़ल, खाद, प्लास्टिक और कच्चे तेल के बैरल से बनने वाली हर चीज़ तब तक महंगी रहेगी जब तक बुनियादी ढांचा फिर से नहीं बन जाता. और यह काम महीनों में नहीं, सालों में होता है.

भारत सीधे इसकी ज़द में है. हम अपनी 85 प्रतिशत से ज़्यादा क्रूड ज़रूरत आयात से पूरी करते हैं. जब वैश्विक तेल की क़ीमत बढ़ती है, तो वो पेट्रोल के दाम में, सीमेंट की लागत में, महीने के किराने के बिल में उतर आती है. और यह कॉर्पोरेट कमाई में भी उतरती है. आपके म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो की कंपनियां (जो कारें बनाती हैं, घर बनाती हैं, साबुन बेचती हैं) आज छह महीने पहले के मुक़ाबले कच्चे माल के लिए ज़्यादा रक़म चुका रही हैं. यह लागत आपकी स्क्रीन पर एक दिन की गिरावट के रूप में नहीं दिखती. यह कई तिमाहियों में दिखती है, जब मार्जिन सिकुड़ता है और कमाई की रफ़्तार धीमी पड़ती है.

जैसे-जैसे यह जंग बढ़ रही है, निवेशकों के सवाल हैरान करने की हद तक एक जैसे आ रहे हैं. क्या मैं अपना SIP रोक दूं? क्या मैं इक्विटी से डेट में शिफ़्ट हो जाऊं? अपने रिटायरमेंट कैलकुलेटर में अब कौन सा रिटर्न नंबर डालूं? अगर मैं इस पोर्टफ़ोलियो से इनकम ले रहा हूं, तो क्या प्लान अभी भी टिकेगा?

सवाल अच्छे हैं. ऐसे सवाल जो एक पैराग्राफ़ से ज़्यादा के हकदार हैं.

शनिवार, 30 मई को दोपहर 12 बजे, धीरेंद्र कुमार और मैं इन्हें Advisor Live में उठाने वाले हैं. सेशन का नाम है: "क्या बदलें. क्या रखें." पांच चीज़ें जो टिकी रहती हैं. तीन जो सच में बदल जाती हैं. एक आसान सवाल जो बताएगा कि आप किस तरफ़ हैं.

आपके सवाल भी लाइव लेंगे.

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