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महान निवेशक का सिद्धांत

इतिहास में "महान पुरुष का सिद्धांत" है और उसी तर्ज़ पर निवेश की दुनिया में भी एक "महान निवेशक का सिद्धांत" हो सकता है. लेकिन क्या सच में कोई महान निवेशक होता है, या फिर हर कोई बस ट्रेंड के साथ चल रहा होता है?

इतिहास में "महान पुरुष का सिद्धांत" है और उसी तर्ज़ पर निवेश की दुनिया में भी एक "महान निवेशक का सिद्धांत" हो सकता है. लेकिन क्या सच में कोई महान निवेशक होता है, या फिर हर कोई बस ट्रेंड के साथ चल रहा होता है?Aditya Roy/AI-Generated Image

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बेनज़ीर भुट्टो की मौत के कुछ समय बाद मैंने कहीं "महान पुरुष के सिद्धांत" का ज़िक्र पढ़ा. यह सिद्धांत मानता है कि इतिहास की बड़ी घटनाएं दरअसल कुछ गिने-चुने "महान पुरुषों" (और महिलाओं) के फ़ैसलों और कार्यों का नतीजा होती हैं. इस सिद्धांत के मुताबिक़, अगर ये ख़ास लोग न होते या उन्होंने अलग तरीक़े से काम किया होता, तो इतिहास का रुख़ एकदम अलग होता. एक आसान-सी मिसाल लें: सोचिए कि अगर महात्मा गांधी न होते तो भारत का आज़ादी का आंदोलन कैसा होता, या फिर अगर एडॉल्फ हिटलर पहले विश्वयुद्ध में ही मर जाता तो क्या दूसरा विश्वयुद्ध होता भी?

एक दौर था जब इतिहास को समझने का यही सबसे मान्य तरीक़ा था. मुझे याद है, जब मैं स्कूल में चौथी कक्षा में था, तो इतिहास की किताब के हर चैप्टर में किसी राजा, बादशाह या किसी बड़े शख़्स की संक्षिप्त जीवनी होती थी. बेशक, स्कूली किताबें अक्सर अकादमिक दुनिया के नए विचारों से काफ़ी पीछे होती हैं, लेकिन सच तो यह है कि "महान पुरुष का सिद्धांत" दशकों से अकादमिक हलक़ों में पिछड़ चुका है. आजकल इतिहासकार बड़े आर्थिक और सामाजिक बदलावों को खंगालते हैं और यह देखते हैं कि उनका आम लोगों की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ा. लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर यह नहीं मान पाता कि लोग बेमानी हैं. लोगों के फ़ैसले मायने रखते हैं. नेतृत्व मायने रखता है. ऐसे लोग होते हैं जो इतिहास के अहम मोड़ पर कदम रखते हैं और हालात को अपनी तरफ़ मोड़ लेते हैं. यह सच है कि वे बड़ी ऐतिहासिक ताक़तों की सीमाओं के अंदर ही काम करते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे बेअसर हैं.

तो अब इस सबका आपके निवेश से क्या लेना-देना? दरअसल, "व्यक्ति बनाम ट्रेंड" की यही बहस निवेश को समझने का एक कारगर तरीक़ा है. निवेश की दुनिया में एक "महान निवेशक का सिद्धांत" है. इस सिद्धांत के मुताबिक़, कुछ निवेशक (या फ़ंड मैनेजर) ऐसे होते हैं जो किसी भी बाज़ार में, किसी भी ट्रेंड के बीच मुनाफ़ा निकाल लेते हैं. इसके उलट एक नज़रिया यह भी है कि ज़्यादातर पोर्टफ़ोलियो तो बस बाज़ार के ट्रेंड के पीछे-पीछे चलते हैं. एक कमज़ोर निवेशक ट्रेंड से काफ़ी पिछड़ सकता है, लेकिन एक अच्छा निवेशक भी लंबे समय तक ट्रेंड से बहुत आगे नहीं जा सकता. आख़िरकार ट्रेंड जीत जाता है और जो "महान निवेशक" दिखता था, वह बस वही निकलता है जिसकी क़िस्मत दूसरों से थोड़ी ज़्यादा अच्छी रही. तो सच कहां है? क्या सच में महान निवेशक होते हैं, या फिर सब ट्रेंड पर सवार हैं जिस पर कोई भी जा सकता था? मेरे ख़याल से जवाब बीच में ही कहीं है. ज़्यादातर लोग बस ट्रेंड के साथ बहते हैं, लेकिन एक छोटा-सा तबका ऐसा भी होता है जो सच में बेहतर निवेशक है. इस दायरे के एक सिरे पर शायद कुछ लोग हैं जिन्हें सच में महान निवेशक कहा जा सके. शायद.

लेकिन जब ट्रेंड और अर्थव्यवस्था का रुख़ कोविड के बाद के भारत जैसा हो, तो एक और जोख़िम सामने आता है: बहुत सारे लोग ख़ुद को महान निवेशक समझने लगते हैं! हक़ीक़त यह है कि लगभग सभी निवेशकों ने "महान निवेशक" जैसा रिटर्न पाया है, लेकिन उन्होंने किया कुछ ख़ास नहीं, बस ट्रेंड के साथ चलते रहे. निवेश के फ़ैसले करते वक़्त इसे याद रखना ज़रूरी है.

यह भी पढ़ेंः कब इंसेंटिव निवेशकों के ख़िलाफ काम करते हैं?

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