फ़र्स्ट पेज

कभी कुछ नहीं होता

एक अजीब सा बेटिंग बॉट वह सिखाता है जो अनुभवी निवेशक पहले से ही जानते हैं, वो है- सबसे अच्छी रणनीति अक्सर कुछ भी न करना ही होती है

एक अजीब सा बेटिंग बॉट वह सिखाता है जो अनुभवी निवेशक पहले से ही जानते हैं, वो है- सबसे अच्छी रणनीति अक्सर कुछ भी न करना ही होती हैAditya Roy/AI-Generated Image

back back back
4:14

कुछ दिन पहले, स्टर्लिंग क्रिस्पिन नाम के एक अमेरिकी सॉफ़्टवेयर इंजीनियर ने एक बॉट बनाया और उसे पॉलीमार्केट (Polymarket) पर छोड़ दिया. अगर आपने इसका नाम नहीं सुना, तो बता दें कि पॉलीमार्केट एक बेटिंग एक्सचेंज है, जहां लोग इस बात पर असली पैसा लगाते हैं कि भविष्य में कोई घटना होगी या नहीं. क्या कोई देश किसी दूसरे पर हमला करेगा? क्या इस साल कोई बड़ी तकनीकी सफलता मिलेगी? हज़ारों लोग रोज़ यह सोचकर ऐसे सवालों पर दांव लगाते हैं कि ख़बरें पढ़ने से उन्हें बढ़त मिलती है.

क्रिस्पिन के बॉट ने कुछ बेहद आसान काम किया: हर भविष्यवाणी पर 'No' की बेट लगाई. वो न ख़बरें पढ़ता है, न जियोपॉलिटिक्स ट्रैक करता है. बस हर चीज़ को नकार देता है. उसने इसे “कभी कुछ नहीं होता” (Nothing Ever Happens) नाम दिया.

अब असल बात यह है.

पॉलीमार्केट के अपने आंकड़े बताते हैं कि क़रीब 73 प्रतिशत भविष्यवाणियां 'No' पर ख़त्म होती हैं. यानी घटना होती ही नहीं. जिस चीज़ को लेकर सब इतने उत्साहित थे, वो महज़ शोर निकलती है. और भी दिलचस्प बात: 25 लाख अकाउंट्स के एक विश्लेषण में पाया गया कि 84 प्रतिशत ट्रेडर्स को नुक़सान हुआ. ज़्यादातर लोगों के लिए वही करना बेहतर होता, जो यह बॉट करता है. मान लो कि कुछ नहीं होगा और घर बैठे रहो.

'पॉलीमार्केट ट्रेडर्स' की जगह 'F&O ट्रेडर्स' रख दें, तो कहानी वही रहती है. SEBI के आंकड़े बताते हैं कि 90 प्रतिशत रिटेल डेरिवेटिव ट्रेडर्स पैसे गंवाते हैं. प्लेटफ़ॉर्म बदलता है, लेकिन खेल वही रहता है: ख़बरों और आत्मविश्वास से भरे लोग छोटी-छोटी घटनाओं पर दांव लगाते हैं और गणित से हार जाते हैं.

मेरे एक परिचित 2023 की शुरुआत में निफ़्टी ऑप्शंस ट्रेड करने लगे. मुंबई के IT प्रोफ़ेशनल. वो समझदार आदमी, ग्रीक भी समझते हैं, बिज़नेस अख़बार भी पढ़ते हैं. डेढ़ साल में उन्होंने क़रीब 200 ट्रेड लगाए और उनमें से वह लगभग 65 प्रतिशत में सही रहे.

फिर भी ₹3.2 लाख गंवा दिए.

ऐसा क्यों हुआ? औसत फ़ायदा: ₹8,000. औसत नुक़सान: ₹22,000. वो ग़लत से ज़्यादा बार सही थे, लेकिन जब बड़ी ग़लती हुई, तो सब साफ़ हो गया. बॉट की स्ट्रैटेजी ने उसे ₹3.2 लाख के नुक़सान और डेढ़ साल के तनाव से बचा दिया होता.

लेकिन यह बात असल में पॉलीमार्केट या F&O के बारे में नहीं है. यह इस बारे में है कि जब हम फ़ाइनेंशियल ख़बरें पढ़ते हैं, तो क्या होता है.

हर हफ़्ते कोई न कोई बात ज़रूरी लगने लगती है. कोई संकट. किसी सेंट्रल बैंक का अचानक फ़ैसला. कोई नई तकनीक जो सब कुछ बदल देगी. संदेश हमेशा एक होता है: यह अहम है, अभी कुछ करो. डीपसीक. टैरिफ़ वॉर. पिछले एक दशक का हर संकट. हर बार लगा कि पोर्टफ़ोलियो में कुछ बदलाव ज़रूरी है. पीछे मुड़कर देखें, तो सही क़दम अक्सर यही था कि कुछ न करें और इंतज़ार करें.

यह बॉट असल में उसी बात का मशीनी रूप है जो मैं यहां सालों से कहता आया हूं. ख़बरों पर रिएक्ट मत करो. अगले महीने का अनुमान मत लगाओ. व्यस्तता को तरक़्क़ी मत समझो. बिना किसी सोच-समझ के चलने वाला एक प्रोग्राम ज़्यादातर इंसानी ट्रेडर्स को पीछे छोड़ देता है. इसलिए नहीं कि वो बेवकूफ़ है, बल्कि इसलिए कि वो उस शोर से विचलित नहीं होता, जिसके चलते समझदार लोग भी अपने पैसों के साथ बेवकूफ़ी भरी हरकतें कर बैठते हैं.

भारतीय निवेशकों के लिए इसके क्या मायने हैं? दो-तीन इक्विटी फ़ंड्स में एक साधारण SIP उन ज़्यादातर लोगों से बेहतर रिटर्न देगी, जो हर शाम बिज़नेस TV देखते हैं और रात की ख़बरों के आधार पर हर सुबह अपने पोर्टफ़ोलियो में फेरबदल करते हैं. यह मशीनी तरीक़ा कोई कमज़ोरी नहीं है, यही इसकी ताक़त है. यह बिल्कुल ग़लत वक़्त पर चालाकी दिखाने की इच्छा को रोकता है.

सबसे ज़रूरी हुनर यह जानना नहीं है कि आगे क्या होगा. सबसे ज़रूरी यह मान लेना है कि आमतौर पर कुछ ख़ास नहीं होता और आपके पैसे उन कुछ मौक़ों के लिए तैयार रहे, जब कुछ सच में होता है.

बॉट को यह बात इसलिए समझ आ जाती है, क्योंकि उसे कुछ भी पता नहीं होता. हम बाक़ी लोग इसे मुश्किल तरीक़े से सीखते हैं.

यह भी पढ़ेंः चलिए बोरिंग हो जाएं

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

ग्लोबल फ़ंड्स पर ₹5,000 की कैप से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता

पढ़ने का समय 4 मिनटआकार रस्तोगी

क्या फ़्लैट ख़रीदकर उसके किराए से EMI चुकाई जा सकती है?

पढ़ने का समय 5 मिनटउदयप्रकाश

आमदनी का 10 गुना लाइफ़ कवर, क्या सही है यह फ़ॉर्मूला?

पढ़ने का समय 6 मिनटआकार रस्तोगी

क्या गिरावट में ख़रीदारी सच में मंथली SIP से बेहतर है?

पढ़ने का समय 3 मिनटउज्ज्वल दास

RBI के नए नियमों को कबूलनामे की तरह पढ़िए

पढ़ने का समय 4 मिनटधीरेंद्र कुमार

स्टॉक पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

AI क्रांति जो वाक़ई काम की है

AI क्रांति जो वाक़ई काम की है

AI पर लगाए जा रहे खरबों रुपयों को भूल जाइए. असली क्रांति वह है जिसे आप अभी, मुफ़्त में, ख़ुद शुरू कर सकते हैं.

These are advertorial stories which keeps Value Research free for all. Click here to mark your interest for an ad-free experience in a paid plan

दूसरी कैटेगरी