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कभी कुछ नहीं होता

एक अजीब सा बेटिंग बॉट वह सिखाता है जो अनुभवी निवेशक पहले से ही जानते हैं, वो है- सबसे अच्छी रणनीति अक्सर कुछ भी न करना ही होती है

एक अजीब सा बेटिंग बॉट वह सिखाता है जो अनुभवी निवेशक पहले से ही जानते हैं, वो है- सबसे अच्छी रणनीति अक्सर कुछ भी न करना ही होती हैAditya Roy/AI-Generated Image

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कुछ दिन पहले, स्टर्लिंग क्रिस्पिन नाम के एक अमेरिकी सॉफ़्टवेयर इंजीनियर ने एक बॉट बनाया और उसे पॉलीमार्केट (Polymarket) पर छोड़ दिया. अगर आपने इसका नाम नहीं सुना, तो बता दें कि पॉलीमार्केट एक बेटिंग एक्सचेंज है, जहां लोग इस बात पर असली पैसा लगाते हैं कि भविष्य में कोई घटना होगी या नहीं. क्या कोई देश किसी दूसरे पर हमला करेगा? क्या इस साल कोई बड़ी तकनीकी सफलता मिलेगी? हज़ारों लोग रोज़ यह सोचकर ऐसे सवालों पर दांव लगाते हैं कि ख़बरें पढ़ने से उन्हें बढ़त मिलती है.

क्रिस्पिन के बॉट ने कुछ बेहद आसान काम किया: हर भविष्यवाणी पर 'No' की बेट लगाई. वो न ख़बरें पढ़ता है, न जियोपॉलिटिक्स ट्रैक करता है. बस हर चीज़ को नकार देता है. उसने इसे “कभी कुछ नहीं होता” (Nothing Ever Happens) नाम दिया.

अब असल बात यह है.

पॉलीमार्केट के अपने आंकड़े बताते हैं कि क़रीब 73 प्रतिशत भविष्यवाणियां 'No' पर ख़त्म होती हैं. यानी घटना होती ही नहीं. जिस चीज़ को लेकर सब इतने उत्साहित थे, वो महज़ शोर निकलती है. और भी दिलचस्प बात: 25 लाख अकाउंट्स के एक विश्लेषण में पाया गया कि 84 प्रतिशत ट्रेडर्स को नुक़सान हुआ. ज़्यादातर लोगों के लिए वही करना बेहतर होता, जो यह बॉट करता है. मान लो कि कुछ नहीं होगा और घर बैठे रहो.

'पॉलीमार्केट ट्रेडर्स' की जगह 'F&O ट्रेडर्स' रख दें, तो कहानी वही रहती है. SEBI के आंकड़े बताते हैं कि 90 प्रतिशत रिटेल डेरिवेटिव ट्रेडर्स पैसे गंवाते हैं. प्लेटफ़ॉर्म बदलता है, लेकिन खेल वही रहता है: ख़बरों और आत्मविश्वास से भरे लोग छोटी-छोटी घटनाओं पर दांव लगाते हैं और गणित से हार जाते हैं.

मेरे एक परिचित 2023 की शुरुआत में निफ़्टी ऑप्शंस ट्रेड करने लगे. मुंबई के IT प्रोफ़ेशनल. वो समझदार आदमी, ग्रीक भी समझते हैं, बिज़नेस अख़बार भी पढ़ते हैं. डेढ़ साल में उन्होंने क़रीब 200 ट्रेड लगाए और उनमें से वह लगभग 65 प्रतिशत में सही रहे.

फिर भी ₹3.2 लाख गंवा दिए.

ऐसा क्यों हुआ? औसत फ़ायदा: ₹8,000. औसत नुक़सान: ₹22,000. वो ग़लत से ज़्यादा बार सही थे, लेकिन जब बड़ी ग़लती हुई, तो सब साफ़ हो गया. बॉट की स्ट्रैटेजी ने उसे ₹3.2 लाख के नुक़सान और डेढ़ साल के तनाव से बचा दिया होता.

लेकिन यह बात असल में पॉलीमार्केट या F&O के बारे में नहीं है. यह इस बारे में है कि जब हम फ़ाइनेंशियल ख़बरें पढ़ते हैं, तो क्या होता है.

हर हफ़्ते कोई न कोई बात ज़रूरी लगने लगती है. कोई संकट. किसी सेंट्रल बैंक का अचानक फ़ैसला. कोई नई तकनीक जो सब कुछ बदल देगी. संदेश हमेशा एक होता है: यह अहम है, अभी कुछ करो. डीपसीक. टैरिफ़ वॉर. पिछले एक दशक का हर संकट. हर बार लगा कि पोर्टफ़ोलियो में कुछ बदलाव ज़रूरी है. पीछे मुड़कर देखें, तो सही क़दम अक्सर यही था कि कुछ न करें और इंतज़ार करें.

यह बॉट असल में उसी बात का मशीनी रूप है जो मैं यहां सालों से कहता आया हूं. ख़बरों पर रिएक्ट मत करो. अगले महीने का अनुमान मत लगाओ. व्यस्तता को तरक़्क़ी मत समझो. बिना किसी सोच-समझ के चलने वाला एक प्रोग्राम ज़्यादातर इंसानी ट्रेडर्स को पीछे छोड़ देता है. इसलिए नहीं कि वो बेवकूफ़ है, बल्कि इसलिए कि वो उस शोर से विचलित नहीं होता, जिसके चलते समझदार लोग भी अपने पैसों के साथ बेवकूफ़ी भरी हरकतें कर बैठते हैं.

भारतीय निवेशकों के लिए इसके क्या मायने हैं? दो-तीन इक्विटी फ़ंड्स में एक साधारण SIP उन ज़्यादातर लोगों से बेहतर रिटर्न देगी, जो हर शाम बिज़नेस TV देखते हैं और रात की ख़बरों के आधार पर हर सुबह अपने पोर्टफ़ोलियो में फेरबदल करते हैं. यह मशीनी तरीक़ा कोई कमज़ोरी नहीं है, यही इसकी ताक़त है. यह बिल्कुल ग़लत वक़्त पर चालाकी दिखाने की इच्छा को रोकता है.

सबसे ज़रूरी हुनर यह जानना नहीं है कि आगे क्या होगा. सबसे ज़रूरी यह मान लेना है कि आमतौर पर कुछ ख़ास नहीं होता और आपके पैसे उन कुछ मौक़ों के लिए तैयार रहे, जब कुछ सच में होता है.

बॉट को यह बात इसलिए समझ आ जाती है, क्योंकि उसे कुछ भी पता नहीं होता. हम बाक़ी लोग इसे मुश्किल तरीक़े से सीखते हैं.

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