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डेरिवेटिव ट्रेडिंग बड़ी तादाद में लोगों की बर्बादी का कारण बन रही है. इसे सिर्फ़ और सिर्फ़ एक जुआ कहने का वक़्त आ गया है.

डेरिवेटिव ट्रेडिंग बड़ी तादाद में लोगों की बर्बादी का कारण बन रही है. इसे सिर्फ़ और सिर्फ़ एक जुआ कहने का वक़्त आ गया है.Illustration: Anand Kumar

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साल 2022 के अंत में, मार्केट रेग्युलेटर सेबी की एक चर्चित रिसर्च रिपोर्ट ने दिखाया कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग निवेशकों के लिए भारी घाटे वाला सौदा है. स्टडी से पता चला कि 89 प्रतिशत निवेशकों ने इन गतिविधियों में पैसा गंवा दिया, और केवल 11 प्रतिशत ही फ़ायदे में रहे. वॉरेन बफ़े की कही एक बात प्रसिद्ध है: "डेरिवेटिव सामूहिक विनाश के वित्तीय हथियार हैं." बेशक़, बफ़े पूरी अर्थव्यवस्था के बारे में बात कर रहे थे, लेकिन उनकी ये बात, लोगों के लिए भी उतनी ही सच है और इस स्टडी ने यही साबित किया है. जब रिपोर्ट सामने आई, तो मैंने इस पर लिखा था और अपने लेख को ये कहकर ख़त्म किया था, "ठीक है, पर अब आगे क्या होगा?"

मेरा कहना था कि डेरिवेटिव ने आम ट्रेडरों के साथ जो किया, उसके इतने विनाशकारी ख़ुलासे के बाद, रेग्युलेटर शायद ही इस मामले से अपना हाथ धो सकता है. तार्किक तौर पर देखें तो रिपोर्ट कुछ रेग्युलेटरी कार्रवाइयों के लिए एक शुरुआत साबित हो सकती है. इस स्टडी के नतीजों ने रिटेल निवेशकों के लिए डेरिवेटिव ट्रेडिंग की पहुंच और जोख़िमों के बारे में गंभीर सवाल उठाए हैं. इसने बेहतर शिक्षा, सख़्त नियमों और कौन इन जटिल वित्तीय साधनों में भाग ले सकता है, इस पर अंकुश लगाने की ज़रूरत पर रोशनी डाली है. रिपोर्ट ने इक्विटी मार्केट के मुश्किल क्षेत्रों में होने वाले विनाशकारी नुक़सान से आम निवेशकों की रक्षा करने में वित्तीय साक्षरता की भूमिका के बारे में व्यापक बहस को भी जन्म दिया.

हालांकि, ये सभी विचार ऐसे हैं जिनका कोई स्पष्ट और मापा जाने वाला असर होने की गुंजाइश नहीं है. इस बीच, डेरिवेटिव मार्केट में रिटेल निवेशकों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है. बहुत से लोग हैं जो इससे अच्छा पैसा कमा रहे हैं, जैसे कि ब्रोकर और स्टॉक एक्सचेंज. लोगों को इस ट्रेड में लुभाना एक बढ़िया बिज़नस है. हाल ही में, कुछ नए नियम आए हैं जो इस बिज़नस के कुछ हिस्सों पर रोक लगा सकते हैं. SEBI स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा ब्रोकरों से लिए जाने वाले पैसे और बदले में ब्रोकरों द्वारा ट्रेडरों से वसूले जाने वाले पैसे के लिए 'ट्रू टू लेबल' या नाम के अनुरूप काम करने वाले नियम लाने जा रहा है.

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'ट्रू टू लेबल' नियम, ब्रोकर्स की कमाई कम करेंगे और इससे ट्रेडरों के लिए डेरिवेटिव ट्रेडिंग और भी महंगी हो जाएगी. पर क्या ये इसे इतना महंगा बना देगा कि इसमें भाग लेने वालों में बड़ी कमी आए? इसका जवाब मुझे नहीं पता है. अभी हम जो जानते हैं, उससे लगता है कि इससे कोई ख़ास असर न पड़े.

SEBI प्रमुख ने डेरिवेटिव मार्केट में जुए जैसी ट्रेडिंग पर अंकुश लगाने के बोर्ड के इरादे को सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया है. उनके बयानों से लगता है कि रेग्युलेटर ज़रूरत पड़ने पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है. एक प्रेस वार्ता में उनसे पूछा गया कि क्या वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए डेरिवेटिव प्रोडक्ट पर प्रतिबंध लगाने के लिए तैयार हैं. उनका जवाब था हां, अगर 'डेटा और तर्क उस दिशा में इशारा करते हैं' तो इस पर सोचा जा सकता है. अब देश को तय करना है कि ये गतिविधि किसी मक़सद को पूरा करती है या नहीं.

ये उत्साह बढ़ाने वाली बात है क्योंकि ये तो तय है कि ये एक लत या एडिक्शन है. जब कोई, किसी व्यक्ति के ट्रेड करने के लिए बड़ी रक़म उधार लेने और फिर उसे गंवा देने के बारे में सुनता है तो ये स्पष्ट हो जाता है कि इसे जुए जैसा ही माना जाना चाहिए. डेरिवेटिव ट्रेडिंग किसी भी तरह से आर्थिक या व्यावसायिक उद्देश्य को पूरा नहीं करती है. इस पैसे का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था में नहीं किया जाता है - ये सचमुच एक क़ानूनी जुआ है.

आम तौर पर, मैं अपने पाठकों को ऐसी गतिविधियों से दूर रहने के लिए प्रोत्साहित करके इस तरह के कॉलम को ख़त्म करता हूं. आज मैं कहूंगा कि समझदारी एक क़दम पीछे हटने, तथ्यों का विश्लेषण करने और समझ-बूझ कर फ़ैसले लेने, अपने वित्तीय भविष्य की सुरक्षा करने और लंबे समय के निवेश करने में निहित है. जैसा कि कहावत है, "ये इस बारे में नहीं है कि आप कितना पैसा कमा पाते हैं, बल्कि ये कि आप कितना अपने पास बचा पाते हैं."

हालांकि, इस तरह की बातें कहने का असल में कोई फ़ायदा नहीं. ये एक मनोवैज्ञानिक मुद्दा है. जुए की लत में फंसे लोग ख़ुद की मदद नहीं कर सकते. इसे दूसरे स्तर पर निपटाया जाना चाहिए और मुझे उम्मीद है कि ये जल्द ही हो जाएगा.

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