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सारांशः क्या हर अतिरिक्त रुपये को भविष्य के लिए निवेश करना चाहिए, या क्या कोई ऐसा समय भी आता है जब ख़र्च करना एक अच्छी ज़िंदगी जीने का हिस्सा बन जाता है? यह लेख इस बात पर चर्चा करता है कि इसका जवाब इस बात पर कम निर्भर करता है कि आप क्या ख़रीदते हैं और इस बात पर ज़्यादा कि उसे ख़रीदने से पहले आप कैसे इंसान बन चुके हैं.
हाल में एक सॉफ़्टवेयर आंत्रप्रेन्योर ने कुछ ऐसा कहा जो मेरे जैसे लोगों को चिढ़ाने के लिए ही कहा गया लग रहा था. लेकिन मुझे चिढ़ नहीं हुई और इसकी वजह ही इस नोट का विषय है.
हाल में एक पॉडकास्ट में सॉफ़्टवेयर आंत्रप्रेन्योर डेविड हाइनमायर हैंसन, जिन्हें आमतौर पर DHH कहा जाता है, ने कहा कि जो कोई भी कुछ सार्थक बनाता है और उससे ख़ूब कमाता है, उस पर एक तरह की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वह उस रक़म का कुछ हिस्सा ख़ूबसूरत चीज़ों पर ख़र्च करे, उस दौलत का कुछ हिस्सा इटली भेजे और वहां के कारीगरों से अपने लिए एक फ़ेरारी बनवाए. उन्होंने कहा कि अपने जीवन स्तर को बेहतर करने की चाह कोई शर्म की बात नहीं है और अगर दुनिया में कोई भी ऐसी गाड़ी कभी न ख़रीदे, तो यह सबके लिए एक ग़रीब दुनिया होगी, उन लाखों लोगों के लिए भी जो इसे सिर्फ़ सड़क किनारे से निहारते हैं. उनके शब्दों में, हमें ख़ूबसूरत फ़ेरारी और दूसरी लग्ज़री चीज़ों की ज़रूरत है, "भले ही वे हमारी अपनी न हों."
हैंसन की बात यहां ग़ौर से सुनने लायक़ है और इसकी वजह आसानी से नज़रअंदाज़ हो सकती है. वे उन फ़ाउंडर्स में से नहीं हैं जिन्होंने कोई कंपनी बनाई, उसे किसी नाटकीय एग्ज़िट में बेच दिया और अब उनके पास एक ऐसी दौलत है जिसे ख़र्च करना है. वे क़रीब दो दशकों से एक ऐसा सॉफ़्टवेयर बिज़नेस चला रहे हैं जो मुनाफ़े में रहा है, स्वतंत्र रहा है, और जान-बूझकर 'अनफ़ैशनेबल' बना रहा है, यानी उस तरह का उद्यम जिसे VC जगत तंज़ के साथ महज़ एक 'लाइफ़स्टाइल बिज़नेस' कहकर ख़ारिज कर देता है. उन्होंने कभी हाइपरग्रोथ का पीछा नहीं किया, कभी कंपनी को पब्लिक नहीं किया और उन ऊंची वैल्यूएशन को नज़रअंदाज़ किया जिनके पीछे उनके साथी भागते रहे. फ़ेरारी इस पूरी इनकार की आदत के ऊपर आकर मिली.
उन्हें पढ़ते हुए मुझे कुछ साल पहले लिखा अपना एक कॉलम याद आया, जो एक ऐसे युवक के बारे में था जिसने अभी-अभी कमाना शुरू किया था और एक ऐसी मोटरसाइकिल के लिए बेचैन था जिसकी क़ीमत ढाई लाख रुपए थी. सबने उसे सही और सावधानी भरी सलाह दी थी, साथ ही यह हिसाब भी लगाकर बताया था कि इसके लिए उसे कितने समय तक बचत करनी होगी. लेकिन मैंने इसके उलट कहा था कि अगर वह समझदारी से चले तो उसकी उम्र 30 साल हो जाएगी तब तक जाकर वह गाड़ी ख़रीद पाएगा और तब तक शायद उसकी चाहत और उसकी ख़ुशी दोनों फीकी पड़ चुकी हों. मैंने उससे कहा, इसे अभी ख़रीद लो. इस बार नियम को थोड़ा नज़रअंदाज़ कर दो, क्योंकि नियम सिर्फ़ एक ज़रिया है, मंज़िल नहीं. इसलिए मैं वह कॉलमनिस्ट नहीं हूं, और कभी नहीं रहा, जो यह ज़िद करता हो कि अपनी ख़ुशी के लिए हर रुपये के ख़र्च को किसी सुनहरे भविष्य के लिए टाल दिया जाए.
इस वजह से फ़ेरारी वाली बात और दिलचस्प हो जाती है. DHH की सलाह जो चीज़ अच्छी बनाती है, वह फ़िज़ूलख़र्ची नहीं है, बल्कि उससे पहले के 20 साल हैं जो साफ़ तौर पर एक 'बिना फ़ेरारी के' बिताए गए. गाड़ी उस लंबी कहानी का बस आख़िरी दृश्य है, जो बाक़ी पूरी तरह धैर्य, संयम और आसान व चमकदार रास्तों को ठुकराने की कहानी है. मुश्किल यह है कि लोगों को सिर्फ़ गाड़ी और उसके बारे में उनका बयान ही नज़र आता है. गाड़ी गैराज में खड़ी दिखती है, लेकिन जिस अनुशासन ने उसकी क़ीमत चुकाई, वह किसी को नहीं दिखता, इसलिए दुनिया पुरस्कार की तारीफ़ करती है और मेहनत को भूल जाती है.
फिर भी, मोटरसाइकिल वाला युवक और फ़ेरारी वाला शख़्स एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं. ये एक ही ज़िंदगी के दो पड़ाव पर खड़ा एक ही इंसान है, जो अपने ख़र्च को उस पड़ाव के मुताबिक़ ढालता है जहां वह पहुंच चुका है. युवक को वह मामूली ख़ुशी टालनी नहीं चाहिए जिसका ख़र्च वह आराम से उठा सकता है, क्योंकि जीने की आदत बचत की आदत जितनी ही ज़रूरी है. वहीं बड़ी उम्र के शख़्स को अपना इनाम उससे पहले नहीं ले लेना चाहिए था, जब तक कि उसने वह चीज़ न बना ली हो जो यह इनाम पैदा करती है. दोनों तरफ़ की ग़लती एक ही है, ऐसा ख़र्च करना जो ख़र्च करने वाले के पड़ाव से मेल नहीं खाता.
फिर भी, DHH की इस ज़िद में कुछ आकर्षक बात है कि ख़ूबसूरत चीज़ों का होना ज़रूरी है और किसी न किसी को इन्हें बनवाने के लिए क़ीमत चुकानी ही होगी. एक ऐसी ज़िंदगी जिसे सिर्फ़ कंपाउंडिंग के गणित से नापा जाए, जिसमें कोई भी रक़म कभी ख़र्च ही न हो क्योंकि हर रक़म हमेशा थोड़ी और बढ़ सकती है, वह असल में कुछ भी बनाने का मतलब ही भूल चुकी है. तो ज़रूर फ़ेरारी ख़रीदिए, लेकिन उस दिन जब आप वह इंसान बन चुके हों जिसने इसे कमाया है. तब तक, किसी फ़ेरारी को गुज़रते देखकर उसे निहारना ठीक है और उन 'बिना फ़ेरारी के' सालों में जुटे रहना ही असल काम है.
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