फ़र्स्ट पेज

एल्गोरिदम आपका डर बढ़ाने के लिए बनी है

सोशल मीडिया क्यों मार्केट की मामूली गिरावट को भी एक बड़े संकट जैसा महसूस करा रहा है?

सोशल मीडिया क्यों मार्केट की मामूली गिरावट को भी एक बड़े संकट जैसा महसूस करा रहा है?AI-generated image

back back back
5:13

अगर कोई सिर्फ़ सोशल मीडिया पर चल रही बयानबाज़ियों को देख कर फ़ैसला करेगा, तो उसे लग सकता है कि हम एक तबाही वाली मार्केट की गिरावट से गुज़र रहे हैं. हालांकि, असल में ये काफ़ी आम गिरावट है. हाल के महीनों में भारतीय शेयर बाज़ारों में गिरावट ज़रूर आई है, लेकिन इतिहास को देखेंगे, तो ये गिरावट मामूली ही लगेगी. पिछले एक साल में सेंसेक्स 8.8 प्रतिशत ऊपर गया है, और पांच साल के अर्से में - जो गंभीर इक्विटी निवेशकों के लिए एक ज़्यादा सार्थक समय है - कोविड-19 की नाटकीय गिरावट को शामिल करने के बावजूद तस्वीर और भी ज़्यादा ढांढस बंधाने वाली है.

हम संकट की बजाय वैल्यूएशन में स्वाभाविक सुधार देख रहे हैं, जो अब तक कुछ बढ़ा हुआ था. ऐसे तमाम फ़ेज़ के दौरान होता ही है कि कुछ कंपनियों में दूसरों की तुलना में ज़्यादा गिरावट होती है. ये तबाह करने वाला नहीं है; ये मार्केट का अपना स्वभाव है जिसके ज़रिए ये अच्छे, बुरे और बदसूरत को छांटने का काम करता है.

फिर भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर हो रहे शोर-शराबे से आपको लगेगा कि हम दूसरे ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्राइसिस से जूझ रहे हैं. असलियत और सोच के बीच का ये बड़ा फ़ासला आज के दौर में फ़ाइनेंस पर विमर्श के बारे में कुछ ज़ाहिर करता है: सोशल मीडिया सक्रिय तरीक़े से नकारात्मक भावनाओं को प्रोत्साहित करते और बढ़ाते हैं. प्लेटफ़ॉर्म के एल्गोरिदम इंगेजमेंट बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, और आक्रोश से ज़्यादा इंगेजमेंट देने वाला कुछ भी नहीं होता. निराशा से भरी हरेक पोस्ट एक सेल्फ़-रीइन्फ़ोर्सिंग साइकिल (आत्म-सुदृढ़ीकरण चक्र) को बढ़ावा देती है, जिससे नकारात्मकता का एक इको चेंबर बन जाता है.

ये भी पढ़ें: सोशल इन्वेस्टिंग के ख़तरे

ये घटना निवेशकों के लिए ख़ासतौर से ख़तरनाक है क्योंकि इससे ख़राब फ़ैसलों की संभावना बढ़ जाती है. जब आपकी सोशल मीडिया फ़ीड लगातार चिल्लाती है कि आसमान गिर रहा है, तो अच्छे निवेश के फ़ैसलों के लिए ज़रूरी भावनात्मक संतुलन को बनाए रखना काफ़ी मुश्किल हो जाता है. नाटकीय और ध्यान खींचने वाला कंटेंट अपने प्लेटफ़ॉर्म पर चलाने के लिए, नपेतुले अनालेसिस के बजाए डरावनी भविष्यवाणियों को प्राथमिकता दी जाती है.

इसकी विडंबना ये है कि ऐतिहासिक रूप से, निराशावाद के ये बड़े दौर अक्सर निवेश के शानदार मौक़े साबित हुए हैं. जब हर कोई मार्केट की मुश्किलों के लेकर चीख़ रहा होता है, तो अक्सर ये संकेत होता है कि वैल्यूएशन ज़्यादा सही हो गया है. फिर भी सोशल मीडिया पर बढ़ी हुई नकारात्मकता ऐसे मौक़ों का फ़ायदा उठाने को मनोवैज्ञानिक रूप से मुश्किल बना देती है.

ये भी पढ़ें: समय, व्यावहारिकता और निराशावाद

मौजूदा स्थिति एक लॉन्ग-टर्म इक्विटी निवेशक के लिए परिप्रेक्ष्य बनाए रखने का एक क़ीमती सबक़ है. जिस तरह का लंबा समय बड़ी पूंजी बनाने के लिए मायने रखता है, उस तरह की अवधि में मार्केट का प्रदर्शन सकारात्मक बना हुआ है. ये उस सच्चाई को पुख़्ता करता है जिसे अनुभवी निवेशक समझते हैं: मार्केट की रोज़ की कमेंट्री का शोर, ख़ासतौर से सोशल मीडिया का शोर, अक्सर निवेश के फ़ैसलों के लिए उसकी अहमियत के उलटे अनुपात में होता है.

इस माहौल में निवेशकों को क्या करना चाहिए? इसका जवाब काफ़ी आसान है, हालांकि इस पर अमल करना कतई आसान नहीं है: अपने रेग्युलर निवेश को पहले की तरह जारी रखें, बुनियादी बातों पर ध्यान दें और सोशल मीडिया के माहौल को अपने निवेश पर असर मत करने दें. अगर सोशल मीडिया के शोर में आपके लिए कुछ है, तो ये कि जितना लंबा उसका निराशावादी शोर चलेगा, आपकी संभावित ख़रीद के मौक़े उतने ही ज़्यादा हो सकते हैं, बशर्ते आपके निवेश का सिद्धांत ठोस हो और आप लंबे समय का निवेश कर रहे हों.

ये भी पढ़ें: शांत रहें और निवेश जारी रखें

मैंने पिछले कुछ सालों में जिन सबसे सफल निवेशकों को देखा है, उनकी एक ख़ास बात रही है: वे बाज़ार में होने वाली गिरावटों को मुसीबत नहीं समझते बल्कि निवेश का स्वभाव मानते हैं. जिस तरह हर साल मानसून आता है, उसी तरह मार्केट में गिरावट के दौर आते हैं. बड़ी बात ये है कि ऐसे दौर की तैयारी की जाए, आगे का अंदाज़ा लगा कर निवेश में फेरबदल नहीं किए जाएं और ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाया जाए, जो गिरावट का सामना आराम से कर सके. इस सब का मतलब हुआ अच्छा-ख़ासा इमरजेंसी फ़ंड रखना, सही क़िस्म की डाइवर्सिटी का होना और सबसे बड़ी बात, केवल उसी पैसे का निवेश करना जिसकी ज़रूरत कई साल तक नहीं होगी.

याद रखें, सोशल मीडिया का पहला काम इंगेजमेंट बढ़ाना है, निवेश की बैलेंस्ड सलाह देना नहीं. जहां X (पहले ट्विटर) और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफ़ॉर्म किसी कंपनी के विकास या बड़े आर्थिक रुझानों के बारे में जानने के लिए बड़े काम के हो सकते हैं, वहीं उन्हें निवेश के फ़ैसलों का पहला आधार कभी नहीं बनाना चाहिए. अगली बार जब आप ख़ुद को मार्केट की तबाही और निराशा से भरी फ़ीड स्क्रोल करता पाएं, तो सोचें कि क्या आप असली अनालेसिस देख रहे हैं या केवल डर बढ़ाने वाली एल्गोरिदम में फंस गए हैं. इस सोच को बनाए रखेंगे तो आपके निवेश के फ़ैसले और आपके रिटर्न कहीं बेहतर होंगे.

ये भी पढ़ें: मार्केट का पर्सनल इंडीकेटर

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

इंटरनेशनल फ़ंड्स: एकमुश्त निवेश के लिए एक ही विकल्प बचा है

पढ़ने का समय 4 मिनटआकार रस्तोगी

आपका REIT 6% रिटर्न देता है. लेकिन आपको शायद सिर्फ़ 2% मिल रहा है

पढ़ने का समय 3 मिनटसिद्धांत माधव जोशी

क्या बड़ा कैपिटल गेन हुआ है? ऐसे लग सकता है कम टैक्स

पढ़ने का समय 5 मिनटआकार रस्तोगी

RBI डॉलर डिपॉज़िट पर NRI को दे रहा 7% तक ब्याज

पढ़ने का समय 5 मिनटउज्ज्वल दास

इस महीने 6 इक्विटी फ़ंड्स की रेटिंग में हुआ सुधार

पढ़ने का समय 6 मिनटख्याति सिमरन नंदराजोग

स्टॉक पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

इस बार जल्द ख़त्म नहीं होगा मुश्किल दौर!

इस बार जल्द ख़त्म नहीं होगा मुश्किल दौर!

पिछले 30 साल से, मैं पाठकों से हर संकट का डटकर सामना करने के लिए कहता आया हूं. लेकिन अमेरिका-ईरान युद्ध इसका अपवाद है, और यहां ख़बर से ज़्यादा उसका कारण मायने रखता है.

These are advertorial stories which keeps Value Research free for all. Click here to mark your interest for an ad-free experience in a paid plan

दूसरी कैटेगरी