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एल्गोरिदम आपका डर बढ़ाने के लिए बनी है

सोशल मीडिया क्यों मार्केट की मामूली गिरावट को भी एक बड़े संकट जैसा महसूस करा रहा है?

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अगर कोई सिर्फ़ सोशल मीडिया पर चल रही बयानबाज़ियों को देख कर फ़ैसला करेगा, तो उसे लग सकता है कि हम एक तबाही वाली मार्केट की गिरावट से गुज़र रहे हैं. हालांकि, असल में ये काफ़ी आम गिरावट है. हाल के महीनों में भारतीय शेयर बाज़ारों में गिरावट ज़रूर आई है, लेकिन इतिहास को देखेंगे, तो ये गिरावट मामूली ही लगेगी. पिछले एक साल में सेंसेक्स 8.8 प्रतिशत ऊपर गया है, और पांच साल के अर्से में - जो गंभीर इक्विटी निवेशकों के लिए एक ज़्यादा सार्थक समय है - कोविड-19 की नाटकीय गिरावट को शामिल करने के बावजूद तस्वीर और भी ज़्यादा ढांढस बंधाने वाली है.

हम संकट की बजाय वैल्यूएशन में स्वाभाविक सुधार देख रहे हैं, जो अब तक कुछ बढ़ा हुआ था. ऐसे तमाम फ़ेज़ के दौरान होता ही है कि कुछ कंपनियों में दूसरों की तुलना में ज़्यादा गिरावट होती है. ये तबाह करने वाला नहीं है; ये मार्केट का अपना स्वभाव है जिसके ज़रिए ये अच्छे, बुरे और बदसूरत को छांटने का काम करता है.

फिर भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर हो रहे शोर-शराबे से आपको लगेगा कि हम दूसरे ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्राइसिस से जूझ रहे हैं. असलियत और सोच के बीच का ये बड़ा फ़ासला आज के दौर में फ़ाइनेंस पर विमर्श के बारे में कुछ ज़ाहिर करता है: सोशल मीडिया सक्रिय तरीक़े से नकारात्मक भावनाओं को प्रोत्साहित करते और बढ़ाते हैं. प्लेटफ़ॉर्म के एल्गोरिदम इंगेजमेंट बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, और आक्रोश से ज़्यादा इंगेजमेंट देने वाला कुछ भी नहीं होता. निराशा से भरी हरेक पोस्ट एक सेल्फ़-रीइन्फ़ोर्सिंग साइकिल (आत्म-सुदृढ़ीकरण चक्र) को बढ़ावा देती है, जिससे नकारात्मकता का एक इको चेंबर बन जाता है.

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ये घटना निवेशकों के लिए ख़ासतौर से ख़तरनाक है क्योंकि इससे ख़राब फ़ैसलों की संभावना बढ़ जाती है. जब आपकी सोशल मीडिया फ़ीड लगातार चिल्लाती है कि आसमान गिर रहा है, तो अच्छे निवेश के फ़ैसलों के लिए ज़रूरी भावनात्मक संतुलन को बनाए रखना काफ़ी मुश्किल हो जाता है. नाटकीय और ध्यान खींचने वाला कंटेंट अपने प्लेटफ़ॉर्म पर चलाने के लिए, नपेतुले अनालेसिस के बजाए डरावनी भविष्यवाणियों को प्राथमिकता दी जाती है.

इसकी विडंबना ये है कि ऐतिहासिक रूप से, निराशावाद के ये बड़े दौर अक्सर निवेश के शानदार मौक़े साबित हुए हैं. जब हर कोई मार्केट की मुश्किलों के लेकर चीख़ रहा होता है, तो अक्सर ये संकेत होता है कि वैल्यूएशन ज़्यादा सही हो गया है. फिर भी सोशल मीडिया पर बढ़ी हुई नकारात्मकता ऐसे मौक़ों का फ़ायदा उठाने को मनोवैज्ञानिक रूप से मुश्किल बना देती है.

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मौजूदा स्थिति एक लॉन्ग-टर्म इक्विटी निवेशक के लिए परिप्रेक्ष्य बनाए रखने का एक क़ीमती सबक़ है. जिस तरह का लंबा समय बड़ी पूंजी बनाने के लिए मायने रखता है, उस तरह की अवधि में मार्केट का प्रदर्शन सकारात्मक बना हुआ है. ये उस सच्चाई को पुख़्ता करता है जिसे अनुभवी निवेशक समझते हैं: मार्केट की रोज़ की कमेंट्री का शोर, ख़ासतौर से सोशल मीडिया का शोर, अक्सर निवेश के फ़ैसलों के लिए उसकी अहमियत के उलटे अनुपात में होता है.

इस माहौल में निवेशकों को क्या करना चाहिए? इसका जवाब काफ़ी आसान है, हालांकि इस पर अमल करना कतई आसान नहीं है: अपने रेग्युलर निवेश को पहले की तरह जारी रखें, बुनियादी बातों पर ध्यान दें और सोशल मीडिया के माहौल को अपने निवेश पर असर मत करने दें. अगर सोशल मीडिया के शोर में आपके लिए कुछ है, तो ये कि जितना लंबा उसका निराशावादी शोर चलेगा, आपकी संभावित ख़रीद के मौक़े उतने ही ज़्यादा हो सकते हैं, बशर्ते आपके निवेश का सिद्धांत ठोस हो और आप लंबे समय का निवेश कर रहे हों.

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मैंने पिछले कुछ सालों में जिन सबसे सफल निवेशकों को देखा है, उनकी एक ख़ास बात रही है: वे बाज़ार में होने वाली गिरावटों को मुसीबत नहीं समझते बल्कि निवेश का स्वभाव मानते हैं. जिस तरह हर साल मानसून आता है, उसी तरह मार्केट में गिरावट के दौर आते हैं. बड़ी बात ये है कि ऐसे दौर की तैयारी की जाए, आगे का अंदाज़ा लगा कर निवेश में फेरबदल नहीं किए जाएं और ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाया जाए, जो गिरावट का सामना आराम से कर सके. इस सब का मतलब हुआ अच्छा-ख़ासा इमरजेंसी फ़ंड रखना, सही क़िस्म की डाइवर्सिटी का होना और सबसे बड़ी बात, केवल उसी पैसे का निवेश करना जिसकी ज़रूरत कई साल तक नहीं होगी.

याद रखें, सोशल मीडिया का पहला काम इंगेजमेंट बढ़ाना है, निवेश की बैलेंस्ड सलाह देना नहीं. जहां X (पहले ट्विटर) और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफ़ॉर्म किसी कंपनी के विकास या बड़े आर्थिक रुझानों के बारे में जानने के लिए बड़े काम के हो सकते हैं, वहीं उन्हें निवेश के फ़ैसलों का पहला आधार कभी नहीं बनाना चाहिए. अगली बार जब आप ख़ुद को मार्केट की तबाही और निराशा से भरी फ़ीड स्क्रोल करता पाएं, तो सोचें कि क्या आप असली अनालेसिस देख रहे हैं या केवल डर बढ़ाने वाली एल्गोरिदम में फंस गए हैं. इस सोच को बनाए रखेंगे तो आपके निवेश के फ़ैसले और आपके रिटर्न कहीं बेहतर होंगे.

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