Aditya Roy/AI-Generated Image
ये पैटर्न उतना ही दोहराव वाला है, जितना निराशाजनक. कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर लिखता है कि कैसे किसी इंश्योरेंस एजेंट ने उसे ठगा, और कुछ ही घंटों में वो थ्रेड उसी तरह की दर्जनों डरावनी कहानियों का संग्रह बन जाता है. हालिया उदाहरण में एक महिला ने लिखा कि उसने जो पॉलिसी 'टर्म इंश्योरेंस' समझकर ली थी, वो असल में एक महंगा एंडोमेंट प्लान निकला - उसे 'रिटर्न' और 'बेनेफ़िट्स' का झांसा दे कर बेच दिया गया था. उसके बाद जो प्रतिक्रियाएं आईं, वे एक जानी-पहचानी तस्वीर पेश करती हैं: लोगों ने शेयर किया कि कैसे उन्हें गुमराह किया गया, ज़रूरत से ज़्यादा पैसे ऐंठे गए, या कुछ ऐसा बेचा गया जो उन्होंने कभी चाहा ही नहीं था.
इन घटनाओं में जो बात सबसे ज़्यादा खटकती है कि उनकी बातें लगभग एक जैसी थी, जो हर मामले में नज़र आती है. हर केस में एक असमानता साफ़ दिखती है - जो सिर्फ़ जानकारी की नहीं, बल्कि अनुभव और इरादे की भी होती है. इंश्योरेंस एजेंट या कंपनियों के प्रतिनिधि इस पूरे 'धोखे का ड्रामा' सैकड़ों, शायद हज़ारों बार दोहरा चुके होते हैं. वो बातचीत को मुश्किल सवालों से बचाकर बातें तोड़ना-मरोड़ना जानते हैं, टेक्निकल शब्दावली का इस्तेमाल उलझाने के लिए करते हैं, और ग्राहक के भरोसे और आर्थिक असुरक्षा की भावना का पूरा फ़ायदा उठाते हैं.
दूसरी तरफ़ ग्राहक अक्सर पहली या दूसरी बार इस जाल में क़दम रख रहा होता है. वो इस उम्मीद से आता है कि सामने बैठा व्यक्ति ईमानदारी से उसे बताएगा कि वो क्या ख़रीद रहा है, जो प्रोडक्ट उसे बेचा जा रहा है वो वही करेगा जो जिसका वादा किया जा रहा है, और ये भी कि इससे जायज़ क़ीमत ही ली जाएगी. ये उम्मीदें जितनी वाजिब हैं, उतनी ही उन्हें एक ऐसे सिस्टम के सामने कमज़ोर बना देती हैं जो इन्हीं मासूम अपेक्षाओं को शोषण का ज़रिया बनाता है.
ये भी पढ़ेंः इंश्योरेंस में असल रिफ़ॉर्म की ज़रूरत
ये सिर्फ़ 'ख़रीदार सावधान रहो' वाली बात नहीं है. ये दशकों से जारी रेगुलेशन और कॉरपोरेट गवर्नेंस की असफलता की सुनियोजित तस्वीर है. IRDA के पास इन शोषणकारी प्रथाओं को रोकने के कई मौक़े रहे हैं और समय भी रहा है, लेकिन ये प्रथाएं आज भी धड़ल्ले से जारी हैं. कंपनियों की भूमिका और भी चिंताजनक है. वे जानती हैं कि उनके एजेंट फ़ील्ड में क्या कर रहे हैं. उन्होंने अपने इनसेंटिव स्ट्रक्चर को इस तरह डिज़ाइन किया है कि इन्हीं ग़लत तरीक़ों से उन्हें ज़्यादा कमीशन मिलता है. ULIP और पारंपरिक पॉलिसियों पर टर्म इंश्योरेंस से कई गुना ज़्यादा कमीशन देना कोई हादसा नहीं - बल्कि ग्राहक के हित को ताक पर रखकर मुनाफ़ा कमाने की सोची-समझी रणनीति है. जब ग्राहक शिकायत करते हैं, तो कंपनियां ‘एजेंट बुरा है’ का बहाना बनाकर बच निकलती हैं - जबकि पूरा सिस्टम ही इन्हीं नतीजों की गारंटी देता है.
सालों इस सिस्टम को देखने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि अब तक बताए जाने वाले उपाय - बेहतर रेगुलेशन, इंडस्ट्री का आत्म-अनुशासन, और ग्राहक जागरूकता अभियान - नाकाफ़ी हैं. ये दशकों से आज़माए जा रहे हैं, लेकिन कुछ नहीं बदला. असल दिक़्क़त ये है कि आम ग्राहक इंश्योरेंस जैसी चीज़ कभी-कभार ही खरीदता है, और बिना विशेषज्ञता के एक ऐसे सिस्टम से भिड़ता है जो उसकी जेब ढीली करने में दक्ष है.
शायद अब जो काम कर सकता है, वह है - संगठित ग्राहक शक्ति. सोचिए अगर ग्राहक एकजुट होकर अपनी जानकारी और सौदेबाज़ी की ताक़त को उसी तरह इकट्ठा कर लें, जैसे बीमा कंपनियां जोखिम को लेकर करती हैं. ऐसा संगठन कई रूपों में आ सकता है - ऑनलाइन समुदाय जो अपने अनुभव शेयर करें और ख़राब प्रैक्टिस को उजागर करें, ग्रुप पर्चेज़िंग जिससे पारंपरिक एजेंट चैनलों को बायपास किया जा सके, या फिर ऐसा सामूहिक दबाव जिससे कंपनियों और रेगुलेटरों को ग्राहकों की नाराज़गी की असली क़ीमत समझ आए.
ये भी पढ़ेंः एक ख़तरनाक खेल
आज के समय में ये सब तकनीकी रूप से पूरी तरह संभव है. वही सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म जो आज सिर्फ़ शिकायतें जमा कर रहे हैं, वे कल संगठन और सामूहिक कार्रवाई के टूल बन सकते हैं. ग्राहक सिर्फ़ अपना ग़ुस्सा ही नहीं, बल्कि रणनीतियां भी शेयर कर सकते हैं - कि कैसे एजेंट से डील करें, कौन-कौन से एजेंट या कंपनियां भरोसेमंद हैं और कौन नहीं.
ये किसी लड़ाई की बात नहीं है. ये उस सच्चाई को स्वीकार करने की बात है कि अगर बार-बार एक आम ग्राहक, एक पेशेवर एजेंट से हार जाता है - तो इसका हल सामूहिक ताक़त में ही है. बीमा इंडस्ट्री ने ग्राहकों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में दशकों लगाए हैं. अब शायद वक़्त आ गया है कि ग्राहक भी अपनी ताक़त बढ़ाना शुरू करें.
सवाल अब ये है - क्या लोग सिर्फ़ अपनी कहानी शेयर करने के बजाय एक ऐसा संगठन खड़ा करने को तैयार हैं जो ताक़त का संतुलन बदल सके?
आपका क्या विचार है? क्या संगठित ग्राहक कार्रवाई एक वास्तविक समाधान है? अगर हां, तो उसकी शक्ल क्या हो सकती है?
आपके जवाब का इंतज़ार है.
ये भी पढ़ेंः बीमा, बीमारी और हत्या

