फ़र्स्ट पेज

इंश्योरेंस में असल रिफ़ॉर्म की ज़रूरत

इंश्योरेंस में कमीशन कम करने का प्रस्ताव इसलिए ध्यान ख़ींचने वाला है क्योंकि ये बेतुका है

इंश्योरेंस में कमीशन कम करने का प्रस्ताव इसलिए ध्यान ख़ींचने वाला है क्योंकि ये बेतुका है

भारत के इंश्योरेंस रेग्युलेटर, IRDAI ने, कुछ दिनों पहले एक दस्तावेज़ पब्लिश किया जो ख़र्च के नए नियमों और कमीशन पर उनके प्रस्ताव का एक्सपोज़र ड्राफ़्ट था। इसमें जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के कमीशन की सीमा 35 प्रतिशत से घटा कर, 20 प्रतिशत करने का प्रस्ताव किया गया। रेग्युलेटर ने ये प्रस्ताव भी दिया कि जिन लाइफ़ इंश्योरेंस कंपनियों का ख़र्च 70 प्रतिशत की अधिकतम सीमा के अंदर है, उन्हें ख़ुद अपना कमीशन रेट सेट करना चाहिए। जो इस सीमा से ऊपर हैं, उनके लिए प्रस्तावित अधिकतम कमीशन की अनुमति मौजूदा 40 प्रतिशत के अधिकतम कमीशन से काफ़ी कम करने की सिफ़ारिश की गई है।
प्रस्ताव ये भी है कि पॉलिसी के दौरान 5वें, 10वें, और 15वें साल में कमीशन दिया जाए। सैद्धांतिक रूप से, ये एजेंट्स को ऐसी पॉलिसियों की सलाह देने और बेचने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है जिन्हें कस्टमर के लंबे समय तक जारी रख सकें। अब ऐसा हो पाएगा या नहीं, ये आने वाले वक़्त में ही पता चलेगा। पर हां, ये प्रस्तावों का ड्राफ़्ट है और इसपर 14 सितंबर तक अपनी राय दी जा सकती है। इसके बाद क्या होगा, कमीशन की दर कम करने की ये सिफ़ारिशें अमल में आती हैं या नहीं, ये तो समय ही बताएगा।
हालांकि, एक बात पक्की है। जो भी कोई, किसी भी तरह की दूसरी फ़ाइनेंशियल सर्विस में मिलने वाले कमीशन या इंटरमीडियेरी फ़ीस के स्तर से परिचित है, वो इंश्योरेंस में कमीशन का स्तर देख कर अचरज में पड़ जाता है। इंश्योरेंस के मुक़ाबले, कन्ज़ूमर फ़ाइनेंशियल सर्विस में-चाहे म्यूचुअल फ़ंड हों या इक्विटी या कुछ और-अधिकतम कमीशन की इजाज़त हमेशा ही 1/10वें या 1/20वें या ऐसा ही कुछ बहुत छोटे से हिस्से की होती है। अब जो लोग इक्विटी ट्रेडिंग और म्यूचुअल फ़ंड निवेश में या तो कुछ नहीं या शायद 2 प्रतिशत तक देने के आदी हैं, उनसे कहना कि अभी 40 प्रतिशत है और उसे घटा कर 20 प्रतिशत कम किया जा रहा है, और इसे एक उपलब्धि के तौर पर पेश करना, काफ़ी चकरा देने वाली बात है।
इतना ही नहीं, अगर आप वो न्यूज़ आर्टिकल पढ़ें, जिनमें इंड्स्ट्री के एग्ज़ीक्यूटिव अपने विचार रख रहे हैं, तो आपको पता चलेगा कि वो सभी एक-मत हैं कि ऐसा करना पॉलिसी-होल्डरों के हितों के लिए बुरा है। सभी (अनुमानतः) गंभीरता के साथ ये कह रहे हैं कि ख़र्च में कमी कस्टमरों के लिए नुक़सानदायक होगी।
असल में, इंश्योरेंस के साथ एक बुनियादी मुश्किल है। कस्टमर्स को ये पता ही नहीं होता कि जब वो प्रीमियम के पैसे देते हैं, तो वो कहां जाता है। उनका प्रीमियम एक ब्लैक बॉक्स में चला जाता है जिसके अंदर की चीज़ें आपके लिए एक सीक्रेट हैं। मैं एक आसान से रिफ़ॉर्म का प्रस्ताव देता हूं, आप बस कस्टमर को बता दें कि उनका पैसा कहां जा रहा है। जब आप कोई इंश्योरेंस पॉलिसी ख़रीदते हैं, तो आप एक तयशुदा पैसे देते हैं और आपको एक ख़ास कॉम्बिनेशन के आधार पर भविष्य के लाइफ़ कवर की वैल्यू पता चलती है। सोचिए, आपने जो भी पैसे दिए हैं उसका हर हिस्सा अलग से बिल में दर्ज हो, और उसे अलग से दिया जाए, चाहे जिस भी काम में उसका उसका इस्तेमाल हो। मोटे तौर पर, जो पैसा आप पॉलिसी के लिए देते हैं उसे चार हिस्सों में बांटा जाता है। कुछ पैसों का इस्तेमाल आपके लाइफ़ कवर के लिए होता है। कुछ निवेश किया जाता है जिसे (उम्मीद है) बढ़ी हुई वैल्यू के साथ आप अंत में वापस पाते हैं। इसमें से कुछ पैसे कमीशन के तौर पर एजेंट को दिए जाते हैं और कुछ इंश्योरेंस कंपनी अपने ख़र्च और मुनाफ़े के लिए रखती है।
मान लीजिए, आपको हर चीज़ के लिए अलग-अलग बिल किया गया है। आप आसानी से एक बार में पैसा दे सकते हैं, मगर आपको एक साफ़ और सरल स्टेटमेंट मिलता है, जो दिखाता है कि आपका कितना पैसा इनमें से किस मद में गया। मेरा अनुमान है कि ऐसा होने से आप कहीं ज़्यादा समझदार ख़रीदार बन जाएंगे और इंश्योरेंस प्रॉडक्‍ट और इंश्योरेंस कंपनियों और एजेंटों को आपको कुछ भी बेचने में कहीं ज़्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। जब आप ₹1 लाख का चेक लिखते हैं और आपके सामने एक स्टेटमेंट आता है, जिसमें लिखा है ₹18,000 सीधे आपके एजेंट के पास गए और ₹12,700 इंश्योरेंस के ख़र्च और मुनाफ़े में गए, तब आप गहराई से, बहुत गहराई से सोचेंगे। अगर देश के हर इंश्योरेंस कस्टमर के पास ये जानकारी होती, तो असल इंश्योरेंस रिफ़ॉर्म न केवल आसानी से होते बल्कि उन्हें नज़रअंदाज़ करना भी मुश्किल होता।

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

एक ग्लोबल फ़ंड नई SIP के लिए फिर से खुला

पढ़ने का समय 5 मिनटआकार रस्तोगी

Motilal Oswal Nasdaq Q50 ETF: ₹213 की यूनिट में ₹96 प्रीमियम, क्या निवेश करना सही?

पढ़ने का समय 6 मिनटआकार रस्तोगी

इन 5 इक्विटी फ़ंड को मिली परफ़ेक्ट 5-स्टार रेटिंग

पढ़ने का समय 5 मिनटख्याति सिमरन नंदराजोग

Fortis vs Aster: दो हॉस्पिटल चेन, लेकिन क्यों एक-दूसरे अलग हैं दांव?

पढ़ने का समय 7 मिनटसत्यजीत सेन

Rentomojo IPO: मुनाफ़ा असली, लेकिन क्या वैल्यूएशन बहुत महंगी है?

पढ़ने का समय 7 मिनटLekisha Katyal

वैल्यू रिसर्च हिंदी पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

आसान हिस्सा हो जाएगा, मुश्किल काम बाक़ी रहेगा

रेगुलेटर ने इंश्योरेंस की मिस-सेलिंग की समस्या को दूर करने के उपाय के दोनों हिस्सों का ज़िक्र किया है, इनमें से सिर्फ़ आसान हिस्से के ही अमल में आने की संभावना है

These are advertorial stories which keeps Value Research free for all. Click here to mark your interest for an ad-free experience in a paid plan

दूसरी कैटेगरी