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चांदी में 88% की रैली, लेकिन 2026 निवेशकों को चौंका सकता है अगर…

चलिए इस बारे में विस्तार से जानते

चलिए इस बारे में विस्तार से जानतेAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः चांदी के प्रति जुनून असली है. लेकिन इसमें कूदने से पहले, पिछले 100 सालों का इतिहास देखना ज़रूरी है - जो इसकी चमक और इसके अंधेरे दोनों को दिखाता है.

जब किसी साल चांदी 50% से ज़्यादा बढ़ जाती है, तो लगने लगता है कि कमाई का मौक़ा छूट गया है या सफ़ेद धातु का नया दौर शुरू हो गया. लेकिन अगर इतिहास कोई संकेत देता है, तो ये है-ऐसी दमदार तेज़ी अक्सर एक हैंगओवर के साथ आती है.

पिछले दिनों सिल्वर ने तेज़ रफ़्तार पकड़ी है और औद्योगिक और रिटेल मांग के चलते रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई. ज़्यादातर इन्वेस्टर्स सेंटीमेंट और सेंट्रल बैंकों की ख़रीद के चलते बढ़ने वाले गोल्ड के उलट, सिल्वर को उद्योग की तरफ से मांग मिल रही है. ये सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर और 5G नेटवर्क तक में अहम हिस्सा है. मौजूदा दौर में जारी क्लीन-एनर्जी ट्रांज़िशन ने सिल्वर को ज़रूरी बना दिया है.

हालांकि, इस साल की लगभग 90% की तेज़ी सिर्फ़ इंडस्ट्रियल कारणों से नहीं आई. इसमें शॉर्टेज की कहानी भी शामिल है. दुनिया भर में मांग के मुताबिक़, खदानों में उत्पादन नहीं हो रहा है. इसके साथ सट्टेबाज़ी की दिलचस्पी और बढ़ती लीज़ दरों ने मिलकर एक असली “सिल्वर स्क्वीज़” बना दिया है.

तो इतिहास क्या बताता है? जब किसी कैलेंडर वर्ष में चांदी 50% से ज़्यादा रिटर्न देती है, तब उसके बाद क्या होता है?

इसका जवाब खोजने के लिए हमने पूरे 100 साल का डेटा देखा - और जो मिला, वो दिलचस्प भी है और जाना-पहचाना भी. चांदी में तेज़ी जोश के साथ-साथ लगभग तयशुदा पैटर्न में देखने को मिलती है.

1946: युद्ध के बाद की छलांग

मैक्रोट्रेंड्स के अनुसार, पहला बड़ा उछाल द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद आया. 1946 में चांदी 53.9% बढ़ी. लेकिन उत्साह ज़्यादा दिन नहीं रहा. अगले साल दाम 10% गिर गए और अगले चार साल तक चांदी कभी मामूली बढ़ी, तो उसमें कभी मामूली गिरावट रही. एक साल चांदी 2.8% बढ़ी तो अगले साल 2.7% गिर गयी. आगे की रैली के लिए 1951 तक इंतज़ार करना पड़ा, जब फिर से दोगुनी बढ़त देखने को मिली.

1967: वो रैली जो जल्दी ठंडी पड़ गई

दो दशक आगे बढ़ें. 1967 में सिल्वर ने 72.6% की दमदार छलांग लगाई, जो 20वीं सदी की सबसे बड़ी सालाना बढ़तों में से एक थी. लेकिन हैंगओवर जल्दी आया. 1968 में दाम 13.5% गिरे, फिर 1969 में 8.2% और 1970 में 8.9% की गिरावट रही.

1973: दो साल का चमत्कार

1973 में चांदी फिर से बाज़ार की पसंद बनी, जो ऑयल शॉक और महंगाई की चिंताओं के बीच 60% से ज़्यादा उछल गई. इस बार बढ़त एक साल और चली, 1974 में और 37% बढ़ी. लेकिन जैसे ही निवेशकों ने सोचा “इस बार हालात अलग हैं”, 1975 में दाम फिर 7% गिर गए.

1979: सदी का जुनून

फिर आया सिल्वर का सबसे बड़ा दौर. 1979 में दामों ने 435% की छलांग लगाई - हंट ब्रदर्स ने ग्लोबल सिल्वर मार्केट पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की. ये जूनून सिल्वर को लगभग $50 प्रति औंस तक ले गया.

लेकिन जब रेगुलेटर सामने आए और एक्सचेंजों ने ट्रेडिंग लिमिट लगाई, तो बुलबुला फूट गया. 1980 में सिल्वर 51.9% गिरी और लंबी मंदी शुरू हुई. अगले 13 सालों में से 11 साल लाल निशान में रहे - 1979 की सट्टेबाज़ बढ़त लगभग मिट गई.

2009–2010: नया दौर, वही पैटर्न

अगला बड़ा उछाल ग्लोबल मंदी के बाद आया. 2009 में चांदी 57.5% बढ़ी, जिसे कम ब्याज दरों और राहत पैकेज से जुड़ी लिक्विडिटी से सपोर्ट मिला. लेकिन इस बार रैली यहीं नहीं रुकी. 2010 में और 80% की बढ़त देखने को मिली.

फिर गिरावट आई. 2013 से 2018 के बीच चांदी बार-बार टूटी. और, 2013 में 35%, 2014 में 18% और 2016 में 13.6% की गिरावट देखने को मिली.

उछाल और गिरावट का साइकल

पिछले सौ सालों में हर बड़ी रैली - चाहे 1946 हो, 1967, 1973, 1979 या 2009 - के बाद सुस्ती देखने को मिली.

सिल्वर में निवेश की सबसे मुश्किल बात ये है कि क्रैश के बाद रिकवरी में बहुत वक़्त लग सकता है. जनवरी 1980 में जब सिल्वर ₹10,000 प्रति किलो पार कर गई, तो लगा नया दौर शुरू हुआ है. लेकिन निवेशकों को 24 साल इंतज़ार करना पड़ा - अप्रैल 2004 में जाकर सिल्वर फिर उसी स्तर को पार कर पाई.

अगर वो पुरानी बात लगे, तो हाल का दौर याद कीजिए - 2011 के पीक के बाद सिल्वर को अपने उच्च स्तर को छूने में क़रीब आठ साल लग गए.

क्या याद रखना चाहिए

भले ही, मौजूदा रैली सिर्फ़ सट्टेबाज़ी से नहीं, बल्कि औद्योगिक मांग से चल रही है, फिर भी इससे अस्थिरता मिटती नहीं. हां, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स और EVs की लंबी कहानी से इसके लिए मज़बूत ढांचागत मांग तैयार होती है, लेकिन इतिहास बताता है कि वॉलेटिलिटी के लिए तैयार रहना चाहिए.

सिल्वर में निवेश डाइवर्सिफ़िकेशन के लिए किया जा सकता है, पर इसे रैली के पीक पर पकड़ने की कोशिश न करें. गोल्ड के उलट, सिल्वर में संस्थागत ख़रीद का वही गहरापन नहीं है - और जब सट्टेबाज़ी ठंडी पड़ती है, तो गिरावट अक्सर तेज़ होती है.

वैल्यू रिसर्च में हम महंगाई और करेंसी कमज़ोरी से बचाव के लिए गोल्ड को ज़्यादा स्थिर हेज़ मानते हैं. फिर भी, इसका हिस्सा कुल पोर्टफ़ोलियो के 10% से ज़्यादा नहीं होना चाहिए.

तो भले ही आज सिल्वर की कहानी चमकदार और न रुकने वाली लगती हो, लेकिन याद रखिए - हर अच्छे दौर के साथ कुछ मुश्किलें भी आती हैं.

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