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सारांशः SEBI के दिसंबर 2025 के बदलाव म्यूचुअल फ़ंड्स में स्टैच्युरी लेवी को एक्सपेंस रेशियो से अलग करते हैं ताकि पारदर्शिता बढ़े, वहीं, ब्रोकरेज कैप घटाने से सीमित बचत संभव है.
SEBI की 17 दिसंबर 2025 की बोर्ड मीटिंग में म्यूचुअल फ़ंड की लागत को परिभाषित और दिखाने के तरीके़ में कई बदलाव किए गए. ख़बरों में जल्दी ही ये कहा जाने लगा कि एक्सपेंस रेशियो ‘कम’ कर दिए गए हैं, जिससे म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों के लिए सस्ते हो गए हैं. लेकिन हक़ीक़त इससे कहीं ज़्यादा बारीक है.
रेगुलेटर ने एक्सपेंस लिमिट्स का स्ट्रक्चर बदला है, निवेशक असल में किस बात का भुगतान कर रहे हैं इस पर पारदर्शिता बढ़ाई है और ब्रोकरेज कैप घटाए हैं. ये क़दम मोटे तौर पर सकारात्मक हैं, लेकिन निवेशकों की कुल लागत में वास्तविक कमी सीमित रहने की संभावना है और ये काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि फ़ंड हाउस कैसे प्रतिक्रिया देते हैं.
यहां बताया गया है कि क्या बदला है और इसका निवेशकों के लिए असल मतलब क्या है.
एक्सपेंस रेशियो को देखने का नया तरीक़ा
सबसे अहम बदलाव एक्सपेंस रेशियो लिमिट्स की परिभाषा से जुड़ा है. जिसे पहले निवेशक टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) कहते थे, अब उसे अलग-अलग हिस्सों में प्रभावी रूप से बांटा जाएगा. SEBI ने बेस एक्सपेंस रेशियो (BER) की अवधारणा पेश की है, जो म्यूचुअल फ़ंड चलाने की मूल लागत को दिखाएगी: फ़ंड मैनेजमेंट, एडमिनिस्ट्रेशन और डिस्ट्रीब्यूशन.
स्टैच्युरी और रेगुलेटरी लेवी अब इस कैप में शामिल नहीं होंगी. STT या CTT, GST, स्टैम्प ड्यूटी, SEBI फ़ीस और एक्सचेंज फ़ीस जैसे चार्ज अब BER के ऊपर अलग से लगाए जाएंगे.
यहां मक़सद साफ़ है. पास-थ्रू टैक्स और लेवी को अलग करके SEBI चाहता है कि निवेशक ये ज़्यादा साफ़ तौर पर देख सकें कि वे फ़ंड हाउस को किस बात के लिए भुगतान कर रहे हैं, और कौन-से चार्ज ऐसे हैं जो फ़ंड के कंट्रोल से बाहर हैं.
कम लिमिट्स, लेकिन सीधी लागत कटौती नहीं
एक्सपेंस स्ट्रक्चर को नए सिरे से परिभाषित करने के साथ-साथ SEBI ने इक्विटी-ओरिएंटेड स्कीम और इक्विटी के अलावा अन्य स्कीम, दोनों के लिए AUM स्लैब के हिसाब से स्वीकृत BER लिमिट्स घटाई हैं.
काग़ज़ों पर, ज़्यादातर स्कीम के लिए ये कमी क़रीब 10 बेसिस प्वाइंट्स की है और कुछ AUM स्लैब में 15 बेसिस प्वाइंट्स तक जाती है. संशोधित लिमिट्स नीचे दी गई हैं.
AUM के हिसाब से SEBI के एक्सपेंस रेशियो बदलाव (ओपन-एंडेड स्कीम)
ज़्यादातर स्कीमों में 10 बेसिस प्वाइंट की कटौती, कुछ में 15 बेसिस प्वाइंट
| AUM स्लैब (करोड़ ₹) | इक्विटी-ओरिएंटेड स्कीम: मौजूदा (लेवी सहित) | संशोधित (लेवी के बिना) | इक्विटी के अलावा स्कीम: मौजूदा (लेवी सहित) | संशोधित (लेवी के बिना) |
|---|---|---|---|---|
| 500 तक | 2.25 | 2.1 | 2 | 1.85 |
| 500–750 | 2 | 1.9 | 1.75 | 1.65 |
| 750–2,000 | 1.75 | 1.6 | 1.5 | 1.4 |
| 2,000–5,000 | 1.6 | 1.5 | 1.35 | 1.25 |
| 5,000–10,000 | 1.5 | 1.4 | 1.25 | 1.15 |
| 10,000–15,000 | 1.45 | 1.35 | 1.2 | 1.1 |
| 15,000–20,000 | 1.4 | 1.3 | 1.15 | 1.05 |
| 20,000–25,000 | 1.35 | 1.25 | 1.1 | 1 |
| 25,000–30,000 | 1.3 | 1.2 | 1.05 | 0.95 |
| 30,000–35,000 | 1.25 | 1.15 | 1 | 0.9 |
| 35,000–40,000 | 1.2 | 1.1 | 0.95 | 0.85 |
| 40,000–45,000 | 1.15 | 1.05 | 0.9 | 0.8 |
| 45,000–50,000 | 1.1 | 1 | 0.85 | 0.75 |
| 50,000 से ज़्यादा | 1.05 | 0.95 | 0.8 | 0.7 |
| स्रोत: SEBI | ||||
पहली नज़र में ये निवेशकों के लिए स्पष्ट फ़ायदा लगता है. लंबे समय में, लागत में छोटे-छोटे अंतर भी बड़ा असर डाल सकते हैं.
मसलन, ₹20 लाख का निवेश अगर 20 साल तक सालाना 12 प्रतिशत बढ़े, तो 1 प्रतिशत एक्सपेंस रेशियो पर ये क़रीब ₹1.61 करोड़ बनता है. इसमें 10 बेसिस प्वाइंट की कटौती से अंतिम कॉर्पस क़रीब ₹2.9 लाख बढ़ जाता है; 15 बेसिस प्वाइंट की कटौती से क़रीब ₹4.4 लाख का फ़ायदा होता है.
हालांकि, यहां एक अहम शर्त है. पहले एक्सपेंस रेशियो स्टैच्युरी लेवी को शामिल करने के बाद दिखाए जाते थे. नए फ्रेमवर्क में ये लेवी BER के बाहर हैं. नतीजतन, भले ही संशोधित लिमिट्स कम दिखें, निवेशकों द्वारा वहन की जाने वाली कुल लागत उतनी नहीं घटेगी जितना ख़बरों में बताया जा रहा है.
असल में, ये बदलाव मुख्य रूप से अनबंडलिंग और पारदर्शिता के बारे में है; लागत में कटौती इसका कम महत्व वाला और अपेक्षाकृत सीमित नतीजा है.
ब्रोकरेज कैप
दूसरा निवेशक-सम्बंधित बदलाव ब्रोकरेज लागत से जुड़ा है. SEBI ने वह अधिकतम ब्रोकरेज घटाया है जो म्यूचुअल फ़ंड्स दे सकते हैं (लेवी के बाद):
- कैश मार्केट ट्रांज़ैक्शंस: कैप घटाकर 6 बेसिस प्वाइंट, पहले क़रीब 8.6 बेसिस प्वाइंट
- डेरिवेटिव ट्रांज़ैक्शंस: कैप घटाकर 2 बेसिस प्वाइंट, पहले क़रीब 3.9 बेसिस प्वाइंट
ब्रोकरेज स्कीम के लिए एक वास्तविक लागत है, ख़ासकर उन स्कीम में जहां पोर्टफ़ोलियो टर्नओवर ज़्यादा होता है. यहां कम कैप से समय के साथ वास्तविक बचत हो सकती है. फिर भी, इसका असर बहुत बड़ा होने की उम्मीद नहीं है. प्रभाव अलग-अलग फ़ंड्स के लिए अलग होगा, जो इस पर निर्भर करता है कि वे कितनी बार ट्रेड करते हैं और फ़ंड हाउस ये बचत निवेशकों तक पहुंचाते हैं या कहीं और समायोजित कर लेते हैं.
निवेशकों के लिए सीख
SEBI के ये क़दम म्यूचुअल फ़ंड खर्चों में बड़ी कटौती से ज़्यादा, लागत डिस्क्लोज़र की सफ़ाई के तौर पर देखे जाने चाहिए.
एक्सपेंस रेशियो लिमिट्स की नई परिभाषा पारदर्शिता बढ़ाती है और निवेशकों के लिए ये समझना आसान बनाती है कि वे किस बात का भुगतान कर रहे हैं. लेकिन स्टैच्यूटरी लेवी अलग से जोड़ने के बाद, कुल लागत में वास्तविक कमी सीमित ही रहेगी.
ब्रोकरेज कैप में कटौती वह जगह है जहां निवेशकों को कुछ वास्तविक फ़ायदा दिख सकता है, ख़ासकर ज़्यादा टर्नओवर वाले एक्टिव फ़ंड्स में. यहां भी लाभ क्रमिक होंगे, बड़े बदलाव वाले नहीं.
हमेशा की तरह, लागत अहम है, लेकिन फ़ंड चुनने का बस एक हिस्सा. वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपको एक्सपेंस रेशियो ट्रैक करने, फ़ंड्स की समान आधार पर तुलना करने और अपने लक्ष्यों के मुताबिक़ निवेश चुनने में मदद करता है, ताकि लागत पारदर्शी रहे और सही संदर्भ में देखी जा सके.
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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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