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जब फ़्री सर्विस की आपको 'क़ीमत' चुकानी पड़ती है

फ़िनटेक प्लेटफ़ॉर्म्स ने छुपे हुए चार्ज की कला में महारत हासिल कर ली है

when-free-costs-you-moneyAditya Roy/AI-Generated Image

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एक पुराना टेक्नोलॉजी शब्द है, जो अब रोज़मर्रा के इस्तेमाल से ग़ायब हो चुका है: Wysiwyg, जिसका उच्चारण ‘विज़ी-विग’ होता है. इसका मतलब है ‘What You See Is What You Get’. यह शब्द वर्ड प्रोसेसिंग के शुरुआती दौर में इस्तेमाल हुआ था, जब ऐसे सॉफ़्टवेयर को बताया जाता था, जिसमें स्क्रीन पर जो दिखता है, प्रिंट में भी वही आता है. न कोई छुपा हुआ सरप्राइज़, न कोई रहस्यमय फ़ॉर्मैटिंग बदलाव. जो दिखता था, वही सच में मिलता था. आज Wordstar और WordPerfect जैसी चीज़ें इतिहास बन चुकी हैं और हर वर्ड प्रोसेसर ‘Wysiwyg’ हो चुका है, इसलिए यह शब्द भी भुला दिया गया है.

काश, यही बात फ़िनटेक प्लेटफ़ॉर्म के बारे में भी कही जा सकती.

डिजिटल दुनिया लंबे समय से एक सरल सिद्धांत पर चल रही है: अगर किसी प्रोडक्ट के लिए पैसे नहीं दे रहे हैं, तो प्रोडक्ट ख़ुद आप हैं. हालांकि, अब ज़्यादातर लोग इसे समझ चुके हैं. आपकी नज़रें विज्ञापनदाताओं को बेची जाती हैं, आपका डेटा कमाई का ज़रिया बनता है और आपका ध्यान एक तरह की इन्वेंटरी हो जाता है. यह सौदा भले असहज लगे, लेकिन कम से कम काफ़ी हद तक साफ़ होता है. यह पता होता है कि Gmail मुफ़्त है क्योंकि Google विज्ञापन दिखाता है. यह भी समझ में आता है कि सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म आपकी पसंद और व्यवहार से जुड़ा डेटा इकट्ठा करते हैं.

हालांकि, फ़िनटेक प्लेटफ़ॉर्म इस पूरे चलन का एक अलग और ज़्यादा ख़तरनाक रूप पेश करते हैं. उन ऐप्स की बढ़ती संख्या को देखें, जो पूरी तरह फ़्री म्यूचुअल फ़ंड निवेश की सुविधा देते हैं. न सब्सक्रिप्शन फ़ीस, न ट्रांज़ैक्शन चार्ज, कुछ भी नहीं. फ़ंड डायरेक्ट प्लान में होते हैं, यानी प्लेटफ़ॉर्म को कोई कमीशन नहीं मिलता. तो फिर ये पैसे कैसे कमाते हैं?

जवाब उन तमाम चीज़ों में छुपा है, जो ये आगे चलकर बेचना चाहते हैं. प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूदगी का मतलब है कि आप उनके लिए महंगी और ज़्यादा फ़ीस वाली सेवाओं के संभावित ग्राहक हैं. आज म्यूचुअल फ़ंड में निवेश हो रहा है; कल स्टॉक ट्रेडिंग का लालच आ सकता है, जो धीरे-धीरे डेरिवेटिव्स की ओर ले जाता है, जहां असल कमाई रिटेल निवेशकों के नुक़सान से होती है. उसके बाद शायद निवेश पोर्टफ़ोलियो के आधार पर पर्सनल लोन या इंश्योरेंस पॉलिसी, या फिर ‘फ़ैमिली ऑफ़िस’ जैसे नाम से पोर्टफ़ोलियो मैनेजमेंट सर्विस ऑफ़र की जाए.

कुछ महीने पहले डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बीच प्लेटफ़ॉर्म के झुकाव पर लिखे एक लेख में यह बात सामने आई थी कि निवेश की असल दुनिया में यह फ़ैसला अक्सर निवेशक नहीं करता. यह फ़ैसला इस बात पर होता है कि प्लेटफ़ॉर्म के रेवेन्यू मॉडल के लिए क्या बेहतर है. यहां यह बात और भी ज़्यादा सख़्ती से लागू होती है. इन फ़्री प्लेटफ़ॉर्म की पूरी बनावट इस सोच पर टिकी होती है कि आख़िरकार निवेशक से क्या निकाला जा सकता है, न कि इस पर कि निवेशक के लिए क्या सबसे सही है.

और बात सिर्फ़ बिज़नेस मॉडल तक सीमित नहीं है. ज़्यादातर फ़िनटेक VC-फ़ंडेड होते हैं और लगातार घाटे में रहते हैं. ऐसे में वे धीरे-धीरे भरोसा बनाकर आगे बढ़ने का ख़र्च नहीं उठा सकते. तेज़ ग्रोथ उनके लिए ज़रूरी नहीं, बल्कि ज़रूरी शर्त होती है. वही फ़ंडिंग को बनाए रखती है और वैल्यूएशन की कहानी को ज़िंदा रखती है.

लेकिन सबसे परेशान करने वाला पैटर्न तब दिखता है, जब कुछ प्लेटफ़ॉर्म के म्यूचुअल फ़ंड सेक्शन में जाते ही दो विकल्प सामने आते हैं: फ़्री सर्विस या पेड सब्सक्रिप्शन. पहली नज़र में यह बिल्कुल आसान चुनाव लगता है. जब कुछ मुफ़्त मिल रहा है, तो पैसे क्यों दिए जाएं?

फ़्री विकल्प रेगुलर प्लान की ओर ले जाता है, जहां फ़ंड हाउस प्लेटफ़ॉर्म को कमीशन देता है, जो आपके रिटर्न से कटता है. पेड विकल्प, जो आमतौर पर एक मामूली फ़्लैट फ़ीस होता है, डायरेक्ट प्लान तक पहुंच देता है, जहां एक्सपेंस रेशियो काफ़ी कम होता है. समय के साथ यह अंतर कंपाउंड होकर बड़ी रक़म बन जाता है, जैसा पहले भी लिखा जा चुका है. यह कंज़्यूमर चॉइस के रूप में पेश किया गया एक डार्क पैटर्न है. यह उस स्वाभाविक मानवीय आदत का फ़ायदा उठाता है, जिसमें लोग मुफ़्त दिखने वाली चीज़ के लिए पैसे देने से बचते हैं. जो निवेशक ‘फ़्री’ पर क्लिक करता है, उसे लगता है कि वह समझदारी दिखा रहा है. असल में, वह ऐसे ऊंचे ख़र्च को स्वीकार कर रहा होता है, जो सालों तक चुपचाप उसकी संपत्ति को कम करता रहता है.

इस पूरे मामले को और भी खटकने वाला बनाता है यह सच कि यह जानकारी का असंतुलन जानबूझकर बनाया गया होता है. इन प्लेटफ़ॉर्म को अच्छी तरह पता होता है कि वे क्या कर रहे हैं. उन्हें मालूम है कि ज़्यादातर निवेशक एक्सपेंस रेशियो में नहीं जाएंगे या उस छोटे से फ़ीस अंतर का लॉन्ग-टर्म असर नहीं निकालेंगे. और वे इसी भरोसे पर टिके रहते हैं.

इसका मतलब यह नहीं है कि हर फ़िनटेक प्लेटफ़ॉर्म से दूरी बना ली जाए. कई प्लेटफ़ॉर्म ने सच में निवेश को आसान बनाया है और रिटेल निवेशकों के लिए पहुंच बढ़ाई है. लेकिन इनका इस्तेमाल खुली आंखों से करें. जब कुछ फ़्री लगे, तो यह सवाल ज़रूर उठे कि असल क़ीमत क्या चुकाई जा रही है. जब कोई विकल्प बहुत साफ़ और आसान दिखे, तो एक पल रुककर यह सोचें कि उस आसान चुनाव से फ़ायदा किसे हो रहा है.

निवेश में, ठीक टेक्नोलॉजी की तरह, जो दिखता है, वही मिलता है, ऐसा शायद ही कभी होता है. असल ख़र्च लगभग हमेशा बारीक़ अक्षरों में छुपा होता है या आजकल तो सीधे बिज़नेस मॉडल के अंदर ही छुपा होता है.

यह भी पढ़ेंः सबसे आसान एक्स्ट्रा रिटर्न जो कमाया जा सकता है

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