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लाखों बग्स का मुकाबला AI नहीं कर सकता

AI के सब कुछ बदलने जैसी बातों से घबराने से पहले, AI चैटबॉट से मदद लेने की कोशिश करें

the-million-bug-reports-that-ai-cant-matchAditya Roy/AI-Generated Image

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मैं तब मानूंगा कि AI कस्टमर सर्विस की नौकरियां बदल रहा है, जब AI सपोर्ट एजेंट के साथ मेरा एक संतोषजनक अनुभव हो जाए. बस एक काम. असाधारण सेवा या किसी गर्मजोशी भरे मानवीय जुड़ाव की मांग नहीं कर रहा हूं. बस इतना चाहिए कि बातचीत गुस्सा न दिलाए. कई सालों से ऐसे चैटबॉट के साथ गोल-गोल घूमती बातचीत में फंसा रहा हूं, जो ऊपर से मददगार लगते हैं, लेकिन असल में समस्या समझते ही नहीं हैं. इसी वजह से AI के तुरंत हर चीज़ पर कब्ज़ा कर लेने वाली भविष्यवाणियों पर गहरा शक बना हुआ है.

ये सिर्फ़ मेरी निजी झुंझलाहट की बात नहीं है. ये टेक निवेश की दुनिया में चल रही AI घबराहट के बारे में कुछ बुनियादी बात उजागर करता है. सबको यक़ीन है कि AI एजेंट हर चीज़ बदल देंगे, SaaS कंपनियां खत्म हो जाएंगी, पारंपरिक सॉफ़्टवेयर कारोबार कुछ लोगों की छोटी टीम द्वारा संभाले गए, संभावनाओं पर आधारित कोड से मिट जाएंगे. नियंत्रित माहौल में AI जो दिखाता है और असली दुनिया की उलझनों से टकराने पर जो देता है, उसके बीच का फ़ासला अभी भी बहुत बड़ा है.

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व्हाइट हाउस के AI सलाहकार डेविड सैक्स ने हाल में एक बात कही. सेल्सफोर्स का उदाहरण देते हुए, उन्होंने कहा, “इसे ऐसे कोड से नहीं बदला जा सकता, जो किसी कोडिंग असिस्टेंट ने निकाल दिया हो और जिसे पूरी तरह परखा न गया हो.” उन्होंने आगे कहा, “सोचिए, पिछले 25 साल में सेल्सफोर्स के कोड बेस पर कितनी बग रिपोर्ट आई होंगी. शायद लाखों. उस सिस्टम को हज़ारों बड़े ग्राहकों और एंटरप्राइज़ में परखा गया है.” बात साफ़ है. ये दशकों के बग सिर्फ़ ग़लतियों को दुरुस्त करने की नहीं हैं. ये 25 साल की संस्थागत याददाश्त हैं, असली इस्तेमाल से सामने आए छोटे-छोटे ख़ास मामले हैं, समय के साथ उभरी नियमों की शर्तें हैं और वे इंटीग्रेशन से जुड़ी चुनौतियां हैं, जिनका अंदाज़ा किसी को नहीं था, जब तक वे संकट न बन गईं. इतना ज्ञान किसी AI इंजन से रातों-रात तैयार नहीं हो सकता, चाहे उसके डेमो कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों. मैं इस बात की तस्दीक निजी अनुभव से कर सकता हूं, क्योंकि Value Research के अंदरूनी सिस्टम और वेबसाइट के साथ पिछले 25 साल से यही काम देखता आया हूं.

ये मान लेना भरोसे से परे लगता है कि कोई कारोबार इन कसौटी पर खरे उतरे सिस्टम को हटाकर कल ही तैयार हुए संभावनाओं पर आधारित कोड से बदल देगा. ये वैसा ही है जैसे कोई निवेशक दशकों में बना डाइवर्सिफ़ाइड पोर्टफ़ोलियो छोड़कर उस फ़ंड के पीछे भागे, जिसने पिछले तिमाही में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया हो. ये तुलना यूं ही नहीं है. दोनों ही मामलों में जो चीज़ उबाऊ और धीमी दिखती है, वही अक्सर असली क़ीमत रखती है.

यही वह जगह है जहां AI की घबराहट एंटरप्राइज़ सॉफ़्टवेयर को ग़लत समझती है. ये सिस्टम इसलिए क़ीमती नहीं हैं कि वे बहुत आकर्षक हैं या सबसे नई तकनीक इस्तेमाल करते हैं. वे इसलिए क़ीमती हैं क्योंकि वे साधारण, स्थिर और परखे हुए हैं.

सोचिए, कारोबार को रोज़मर्रा में क्या चलाए रखता है. ये कॉन्फ़्रेंस में दिखाए जाने वाले चमकदार फीचर नहीं, बल्कि वह साधारण ढांचा है जो हर दिन भरोसे से काम करता है. जब कोई फ़ाइनेंशियल संस्था भुगतान प्रोसेस करती है, तो असली क़ीमत आधुनिक कोड में नहीं होती. असली क़ीमत इस भरोसे में होती है कि सिस्टम अचानक बंद नहीं होगा, नियमों का पालन करेगा, मुश्किल हालात में भी सही काम करेगा और अगर कुछ गड़बड़ हो जाए तो उसे ठीक करने की संस्थागत समझ मौजूद होगी.

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तो जो निवेशक इस डर में हैं कि AI सॉफ़्टवेयर कंपनियों को खत्म कर देगा, उनके लिए इसका मतलब क्या है? वे साधारण दिखने वाले, परखे हुए सिस्टम उतने नाज़ुक नहीं हैं, जितना सुर्खियां दिखाती हैं. हां, AI सॉफ़्टवेयर विकास को प्रभावित करेगा. हां, कुछ कंपनियां इसके अनुरूप ढलने में संघर्ष करेंगी. लेकिन ये मान लेना कि स्थापित एंटरप्राइज़ सॉफ़्टवेयर कारोबार इसलिए गायब हो जाएंगे क्योंकि अब कोड जल्दी तैयार किया जा सकता है, इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि इन कारोबारों की असली क़ीमत कहां से आती है. निजी अनुभव से कहूं तो किसी टेक-केंद्रित कारोबार की कुल क़ीमत का शायद 10 फ़ीसदी हिस्सा ही सॉफ़्टवेयर कोड से आता है.

ऐसा पहले भी देखा गया है. हर तकनीकी दौर में यही शोर उठता है कि इस बार सब कुछ बदल जाएगा. नाम बदलते रहते हैं. कभी क्लाउड कंप्यूटिंग, कभी ब्लॉकचेन, कभी मोबाइल-फर्स्ट और अब AI एजेंट. लेकिन मूल धारणा वही रहती है कि पुरानी तकनीक का इस्तेमाल करने वाले स्थापित कारोबार खत्म हो जाएंगे. फिर भी किसी तरह, वे साधारण कंपनियां जिनके लाखों ग्राहक हैं और दशकों की संस्थागत समझ है, टिके रहती हैं.

मैंने हाल में लिखा था कि AI एक अनिवार्य क्रांति है और इस बात पर कायम हूं. लेकिन तकनीक के काम करने के तरीके़ बदलने और स्थापित, कसौटी पर खरे सिस्टम को रातों-रात बेकार बना देने में बड़ा फ़र्क है. पहला काम हो रहा है. दूसरी बात ज़्यादातर घबराहट है.

इसलिए, इससे पहले कि इक्विटी होल्डिंग बेचने की जल्दबाज़ी की जाए क्योंकि AI कथित तौर पर सब कुछ बदल देगा, बेहतर होगा कि किसी अहम काम में AI का इस्तेमाल करके देखा जाए. अपने बैंक की ग़लती AI चैटबॉट से ठीक करवाने की कोशिश कीजिए. किसी बिलिंग विवाद को AI एजेंट से सुलझाने की कोशिश कीजिए. अगर एक भी संतोषजनक अनुभव मिल जाए, तो ज़रूर बताइए. इंतज़ार रहेगा.

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