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लाइफ़ साइकल फ़ंड: SEBI की नई फ़ंड कैटेगरी की आसान गाइड

नई म्यूचुअल फ़ंड कैटेगरी के बारे में ज़रूरी बातें

life-cycle-funds-a-simple-guide-to-sebis-new-fund-categoryAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः SEBI ने म्यूचुअल फ़ंड की एक नई कैटेगरी शुरू की है, जो पुराने रिटायरमेंट और चिल्ड्रेन फ़ंड की जगह लेगी. इनमें कुछ अहम बदलाव हैं. इनमें एक तय मैच्योरिटी वर्ष होता है, समय के साथ जोखिम घटाने का पहले से तय रास्ता होता है और एग्ज़िट-लोड के नियम होते हैं. नीचे पूरी जानकारी दी गई है.

मार्केट रेगुलेटर SEBI ने म्यूचुअल फ़ंड की एक नई कैटेगरी शुरू की है, जिसे लाइफ़ साइकल फ़ंड कहा गया है. ये फ़ंड पहले की सॉल्यूशन-ओरिएंटेड कैटेगरी यानी रिटायरमेंट और चिल्ड्रेन फ़ंड की जगह लेंगे, जिसे SEBI ने अब बंद कर दिया है.

इन दोनों में सबसे बड़ा फ़र्क़ स्ट्रक्चर का है. लाइफ़ साइकल फ़ंड एक तय मैच्योरिटी साल के साथ बनाए जाते हैं और एक तय रास्ते पर चलते हैं. इसका मतलब है कि जैसे-जैसे मैच्योरिटी का साल पास आएगा, इक्विटी और डेट का अनुपात अपने-आप बदलेगा. जबकि पुराने सॉल्यूशन-ओरिएंटेड फ़ंड सिर्फ़ किसी लक्ष्य के नाम से जुड़े होते थे, लेकिन उनमें मैच्योरिटी से जुड़ा एसेट एलोकेशन का तय रास्ता नहीं होता था.

मुख्य बात: टारगेट साल से जुड़ा ग्लाइड पाथ

लाइफ़ साइकल फ़ंड की एक तय मैच्योरिटी होगी और उस साल का नाम स्कीम के नाम में शामिल करना ज़रूरी होगा, ताकि निवेश की समय-सीमा साफ़ दिखे. ये स्कीम 5 से 30 साल की अवधि में हो सकती हैं और अवधि 5-5 साल के अंतर में तय होगी.

एसेट एलोकेशन मैच्योरिटी तक बचे सालों के हिसाब से बदलेगा. जब मैच्योरिटी दूर होगी, तब फ़ंड ज़्यादा इक्विटी रख सकता है. जैसे-जैसे मैच्योरिटी पास आएगी, इक्विटी कम होगी और डेट का हिस्सा बढ़ेगा.

ये बदलाव तय दायरे के अंदर होंगे. उदाहरण के लिए, 30 साल की मैच्योरिटी वाले एक लंबे लाइफ़ साइकल फ़ंड में शुरुआती सालों में इक्विटी 65 से 95 प्रतिशत तक हो सकती है और डेट 5 से 25 प्रतिशत तक.

जैसे-जैसे स्कीम मैच्योरिटी के पास आएगी, इक्विटी की सीमा घटकर 35 से 50 प्रतिशत हो जाएगी, जबकि डेट 25 से 50 प्रतिशत तक हो सकती है. नीचे दी गई टेबल 30 साल के फ़ंड के लिए SEBI का तय ग्लाइड पाथ दिखाती है.

इन फ़ंड में 10 प्रतिशत तक निवेश गोल्ड और सिल्वर से जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स, InvITs और एक्सचेंज-ट्रेडेड कमोडिटी डेरिवेटिव्स (ETCDs) में भी हो सकता है.

एसेट एलोकेशन: 30 साल का लाइफ़ साइकल फ़ंड

SEBI द्वारा तय ग्लाइड पाथ दिखाता है कि मैच्योरिटी क़रीब आने पर इक्विटी एक्सपोज़र कैसे कम होगा

मैच्योरिटी तक बचे साल
इक्विटी (%) डेट (%) गोल्ड/सिल्वर ETFs/ETCDs/InvITs (%)
15–30 65–95 5–25 0–10
10–15 65–80 5–25 0–10
5–10 50–65 5–25 0–10
3–5 35–50 25–50 0–10
1–3 20–35 25–65* 0–10
< 1 5–20 25–65* 0–10
जिन स्कीम में मैच्योरिटी तक 1 से 3 साल बचे हों, उनमें डेट इंस्ट्रूमेंट्स का निवेश सिर्फ़ AA या उससे ऊपर रेटिंग वाले इंस्ट्रुमेंट्स में होगा और उनकी बची अवधि स्कीम की टारगेट मैच्योरिटी से ज़्यादा नहीं होगी. सोर्स: SEBI

असल में, निवेश एक दायरे में तय है, इसलिए एक ही मैच्योरिटी साल वाले दो फ़ंड भी किसी समय अलग एसेट एलोकेशन रख सकते हैं. SEBI सीमाएं तय करता है, लेकिन इन सीमाओं के भीतर पोर्टफ़ोलियो को कहां रखना है, यह फ़ंड मैनेजर तय करेंगे.

लिक्विडिटी और एग्ज़िट लोड

ये फ़ंड ओपन-एंडेड होंगे और इनमें कोई अनिवार्य लॉक-इन नहीं होगा. निवेशक जब चाहें पैसा निकाल सकते हैं. लेकिन अगर निवेश के पहले तीन साल के भीतर यूनिट रिडीम की जाती है, तो एग्ज़िट लोड लगेगा:

  • एक साल के अंदर रिडीम करने पर 3 प्रतिशत का एग्ज़िट लोड लगेगा 
  • दो साल के अंदर रिडीम करने पर 2 प्रतिशत
  • तीन साल के अंदर रिडीम करने पर 1 प्रतिशत

यानी पैसा निकालने की सुविधा है, लेकिन जल्दी निकालना महंगा होगा.

स्कीम लॉन्च होने के बाद किन बातों पर ध्यान रखें

चूंकि यह नई कैटेगरी है, इसलिए शुरुआत में लाइफ़ साइकल फ़ंड का लंबा परफ़ॉर्मेंस रिकॉर्ड नहीं होगा. समय के साथ अलग-अलग मार्केट फेज़ में इनका व्यवहार साफ़ होगा.

किसी भी स्कीम का नतीजा इन बातों पर निर्भर करेगा:

  • एक्सपेंस रेशियो, जो लंबे समय में नेट रिटर्न पर असर डालेगा
  • तय दायरे के भीतर पोर्टफ़ोलियो कैसे बनाया गया है, जो हर फ़ंड मैनेजर के हिसाब से अलग हो सकता है
  • स्कीम का स्ट्रक्चर और मैच्योरिटी साल निवेशक की समय-सीमा से कितना मेल खाता है

ग्लाइड पाथ से बार-बार खुद एसेट एलोकेशन बदलने की ज़रूरत कम हो सकती है, लेकिन पैसा कब निकालना है, यह फ़ैसला निवेशक को ही करना होगा.

आप क्या समझे?

लाइफ़ साइकल फ़ंड एक मैच्योरिटी से जुड़े प्रोडक्ट हैं, जिनमें एसेट एलोकेशन तय रास्ते पर चलता है और टारगेट साल पास आने पर बदलता है. किसी भी कैटेगरी की तरह, हर स्कीम को उसके ग्लाइड पाथ, ख़र्च, पोर्टफ़ोलियो चुनाव और निवेशक की समय-सीमा के हिसाब से परखना ज़रूरी है.

एसेट एलोकेशन किसी भी लॉन्ग-टर्म योजना की असली बुनियाद है, और यह सही फ़ंड चुनने जितना ही अहम है. वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र में हम आपकी जोख़िम क्षमता, लक्ष्य और समय-सीमा के आधार पर सही मिश्रण तय करने में मदद करते हैं, और यह भी बताते हैं कि उस एलोकेशन को कैसे बनाएं और ट्रैक पर रखें.

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ये भी पढ़ें: ग़लत समय में बेस्ट फ़ंड भी कुछ नहीं कर सकता, क्या करें निवेशक?

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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