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किर्लोस्कर न्यूमैटिक ने मार्जिन तो ठीक कर लिए, अब आगे क्या?

5 साल में मार्जिन में 7 प्रतिशत का सुधार हुआ, स्ट्रक्चरल बदलाव असली है, लेकिन आगे का सफ़र किस पर निर्भर है?

5 साल में मार्जिन में 7 प्रतिशत का सुधार हुआ, स्ट्रक्चरल बदलाव असली है, लेकिन आगे का सफ़र किस पर निर्भर है?Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः किर्लोस्कर न्यूमैटिक का मार्जिन पांच साल में 14 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत से ज़्यादा हो गया है. इस तरह का सुधार किसी एक अच्छी तिमाही से नहीं आता. कंपनी के अंदर कुछ स्ट्रक्चरल बदलाव हुआ है और बाज़ार ने इसे भांप लिया है. सवाल यह है कि क्या आसान फ़ायदे अब काफ़ी हद तक पीछे रह गए हैं.

पांच साल पहले किर्लोस्कर न्यूमैटिक अपने हर ₹100 के रेवेन्यू पर क़रीब ₹14 कमाती थी. आज यह रक़म ₹20 से ज़्यादा हो गई है. मार्जिन में इस तरह का सुधार किसी एक अच्छी तिमाही या कमोडिटी की अनुकूल चाल से नहीं आता. कंपनी के अंदर कुछ स्ट्रक्चरल बदलाव हुआ है.

पिछले एक साल में स्टॉक 40 प्रतिशत से ज़्यादा चढ़ा है. बाज़ार ने इसे नोटिस कर लिया है. अब जो सवाल पूछने लायक़ है, वह यह है कि क्या यह सुधार टिकाऊ है या आसान फ़ायदे काफ़ी हद तक मिल चुके हैं.

किर्लोस्कर न्यूमैटिक क्या बनाती है

किर्लोस्कर न्यूमैटिक कंप्रेसर बनाती है, यानी ऐसी मशीनें जो हवा या गैस को दबाकर इंडस्ट्रियल प्रोसेस को चलाती हैं. कंपनी का काम तीन सेगमेंट में बंटा है: डेयरी, फ़ूड प्रोसेसिंग और फ़ार्मास्युटिकल फ़ैसिलिटीज़ के लिए रेफ़्रिजरेशन और कूलिंग, जिसकी अब रेवेन्यू में 40 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सेदारी है और सबसे बड़ा सेगमेंट बन चुका है; ऑयल-एंड-गैस पाइपलाइनों और CNG स्टेशनों के लिए गैस कंप्रेशन, जो 30 से 35 प्रतिशत है; और मेटल, सीमेंट व टेक्सटाइल फ़ैक्ट्रियों के लिए एयर कंप्रेसर, जो बाक़ी का हिस्सा बनाते हैं.

वह सेगमेंट जिसने कंपनी बनाई, फिर धीमा पड़ गया

इतिहास में ज़्यादातर गैस कंप्रेशन ही कंपनी की रीढ़ था. किर्लोस्कर बड़े गैस कंप्रेशन पैकेज मार्केट में 50 से 55 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती थी और CNG मदर स्टेशनों में लगभग दो-कंपनियों का एकाधिकार था. ये वे कंप्रेसर हैं जो टैंकरों को भरते हैं, और टैंकर छोटे फ़्यूल स्टेशनों को सप्लाई करते हैं. एक स्टैंडर्ड CNG पैकेज की क़ीमत ₹12 से ₹15 करोड़ होती है. सबसे बड़े पैकेज 100 करोड़ तक पहुंचते हैं. नए खिलाड़ियों को टक्कर देने के लिए सालों का साबित ट्रैक रेकॉर्ड चाहिए. किर्लोस्कर के पास वह था.

फिर भारत का CNG विस्तार धीमा पड़ गया. नई कमीशनिंग खत्म होने लगी. इस सेगमेंट की रेवेन्यू में 45 से 50 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, वह सिकुड़ने लगा और अकेली प्रतिस्पर्धी ताक़त यह नहीं बदल सकती थी.

कस्टम प्रोजेक्ट से स्टैंडर्ड प्रोडक्ट की तरफ़

यहीं पर बिज़नेस में असली बदलाव आया.

किर्लोस्कर का रेवेन्यू लंबे समय से बड़े कस्टम-बिल्ट पैकेज यानी किसी ख़ास ग्राहक की साइट के लिए बने पूरे सिस्टम पर टिका था. इन्हें पूरा होने में 8 से 16 महीने लगते थे, रेवेन्यू सिर्फ़ कमीशनिंग के बाद बुक होता था और इस दौरान मार्जिन पर कच्चे माल की क़ीमतों के उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहता था.

कंपनी ने स्टैंडर्ड इक्विपमेंट - ऐसे स्टैंडअलोन कंप्रेसर जो कई ग्राहकों के लिए काम करें-की तरफ़ रुख़ किया. ये तैयार होते ही शिप हो जाते हैं. मैन्युफ़ैक्चरिंग साइकिल घटकर 4 से 16 हफ़्ते रह गई. इन्वेंटरी डेज़, यानी कच्चा माल रेवेन्यू बनने से पहले फ़ैक्ट्री में कितने दिन पड़ा रहता है, फ़ाइनेंशियल ईयर 24 में 104 दिन से घटकर फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में 88 दिन हो गए. कैश कन्वर्ज़न साइकिल, यानी इनपुट पर ख़र्च करने से लेकर ग्राहक से पेमेंट मिलने तक का कुल वक़्त, फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में 103 दिन से सुधरकर फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में 90 दिन पर आ गई.

पहले रेवेन्यू में 60 प्रतिशत पैकेज और 40 प्रतिशत इक्विपमेंट था. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 तक यह 50:50 पर आ गया और मैनेजमेंट फ़ाइनेंशियल ईयर 27 तक 65 से 70 प्रतिशत इक्विपमेंट का लक्ष्य रख रही है. किर्लोस्कर ने मैन्युफ़ैक्चरिंग भी इन-हाउस कर ली. पांच साल पहले आधे के क़रीब काम में कोर कम्पोनेंट का आयात होता था. आज सप्लाई चेन लगभग पूरी तरह 200 किलोमीटर के दायरे में है.

क्या कहते हैं आंकड़े

  FY26 FY25 FY24 FY23 FY22
रेवेन्यू (करोड़ ₹) 1,759 1,629 1,323 1,239 1,021
EBITDA मार्जिन (%) 20.5 18 15.5 13.5 13.8
मुनाफ़ा (टैक्स के बाद, करोड़ ₹) 258 211 133 109 85

EBITDA मार्जिन, यानी ऑपरेटिंग कॉस्ट काटने के बाद रेवेन्यू का जो हिस्सा बचता है, फ़ाइनेंशियल ईयर 22 में 13.8 प्रतिशत से बढ़कर फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में 20.5 प्रतिशत हो गया है. हर सेगमेंट अब अलग-अलग 18 प्रतिशत या उससे ज़्यादा दे रहा है. रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (ROCE) बढ़कर 30 प्रतिशत हो गया है. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में ऑपरेटिंग कैश फ़्लो ₹228 करोड़ रहा और कन्वर्ज़न रेट 86 प्रतिशत. कमाई कैश में बदल रही है, जो इस स्ट्रक्चरल बदलाव को सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं, असलियत में भी साबित करता है.

किर्लोस्कर उन प्रोडक्ट कैटेगरी में भी उतर आई है जहां कभी मल्टीनेशनल कंपनियां राज करती थीं. सेंट्रीफ़्यूगल कंप्रेसर, यानी तेज़ रफ़्तार घूमने वाले ब्लेड से हवा को दबाने वाली मशीनें, फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में ₹100 करोड़ की ऑर्डर बुकिंग पार कर गए और अब इनकी एयर कंप्रेसर डिवीज़न के रेवेन्यू में 15 से 18 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि इनका कुल संभावित बाज़ार ₹500 करोड़ का है. कमर्शियल एयर कंडीशनिंग कंप्रेसर में भी इसी तरह की एंट्री हो रही है और ₹300 करोड़ की कैपिटल कमिटमेंट सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम के तहत मंज़ूरी के इंतज़ार में है.

दो जोख़िम जिन्हें तरक़्क़ी भी छुपा नहीं सकती

पहला जोख़िम है दोनों तरफ़ से बढ़ता मुक़ाबला. Atlas Copco ने फ़ाइनेंशियल ईयर 24 में पुणे में मैन्युफ़ैक्चरिंग शुरू कर दी. किर्लोस्कर लाइफ़टाइम कॉस्ट पर मुक़ाबला करती है, लेकिन बहुत से ग्राहक क़ीमत की परवाह किए बिना प्रीमियम ब्रांड को पसंद करते हैं. नीचे से, मैनेजमेंट ने फ़ाइनेंशियल ईयर 26 की चौथी तिमाही में माना कि कंपनी ऑयल और गैस मार्केट में ऐसे छोटे खिलाड़ियों के मुक़ाबले हिस्सेदारी खो रही है जो कम क़ीमत पर काम करते हैं.

दूसरा जोख़िम ज़्यादा स्ट्रक्चरल है. पैकेज कहीं नहीं जा रहे. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में ₹150 से 180 करोड़ के बड़े ऑर्डर तैयार थे लेकिन ग्राहक साइट की मंज़ूरी में देरी की वजह से भेजे नहीं जा सके. डिलीवर किए गए 88 में से सिर्फ़ 46 कंप्रेसर कमीशन हुए, बाक़ी मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहे थे. रेवेन्यू 20 प्रतिशत के लक्ष्य के मुक़ाबले सिर्फ़ 8 प्रतिशत बढ़ा. जब तक पैकेज अहम रहेंगे, ग्रोथ ग्राहक की तैयारी पर निर्भर रहेगी. अगर प्रोजेक्ट में देरी हुई, तो रेवेन्यू आने में भी देरी होगी.

अभी कहां खड़ी है कंपनी

46 गुनी अर्निंग पर किर्लोस्कर, Elgi के 44 गुना और Ingersoll के 58 गुनी अर्निंग्स के बीच है. इसकी तीन साल की 36 प्रतिशत कंपाउंड सालाना मुनाफ़ा ग्रोथ दोनों से आगे है. पेंडिंग क्लियरेंस फ़ाइनेंशियल ईयर 27 की पहली छमाही में मिलने की उम्मीद है. अगर मिले, तो फ़ाइनेंशियल ईयर 26 की चूक एक बार की बात लगेगी. नहीं मिले, तो देरी अस्थायी नहीं रहेगी.

मिक्स में बदलाव एक लंबा खेल है. जितना ज़्यादा स्टैंडर्ड इक्विपमेंट पैकेज से आगे निकलेगा, बिज़नेस उतना कम ग्राहक की साइट से जुड़ी तैयारी पर निर्भर होगा. किर्लोस्कर पांच साल पहले से बेहतर बिज़नेस है. बाज़ार यह कहानी पहले ही क़ीमत में जोड़ चुका है. एग्ज़ीक्यूशन इस रफ़्तार से चलता है या नहीं, यह तय करेगा कि री-रेटिंग भी टिकती है या नहीं.

कोई बिज़नेस अपने वादे पर खरा उतर रहा है या चुपके से पिछड़ रहा है, यह किसी एक हेडलाइन में नज़र नहीं आता. यह तिमाही-दर-तिमाही दिखता है, ऑर्डर बुक में, मार्जिन ट्रेंड में और कैश कन्वर्ज़न में. Value Research Stock Advisor इसी तरह की ट्रैकिंग के लिए बना है, ताकि आप जान सकें कि भरोसा बनाए रखना है या फिर से सोचना है.

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