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सिर्फ़ रिटर्न देखकर क्यों धोखा खा सकते हैं म्यूचुअल फ़ंड निवेशक?

हो सकता है आपका फ़ंड वो रिटर्न देने के लिए आपकी सोच से कहीं ज़्यादा जोख़िम उठा रहा हो.

हो सकता है आपका फ़ंड वो रिटर्न देने के लिए आपकी सोच से कहीं ज़्यादा जोख़िम उठा रहा हो.Anand Kumar/AI-Generated Image

पाठक का सवाल: क्या आप म्यूचुअल फ़ंड के लिए अल्फ़ा समझा सकते हैं? - कल्पेश सावंत

आप अपने म्यूचुअल फ़ंड का रिटर्न देखते हैं. नंबर अच्छा दिखता है, बल्कि बाज़ार से भी बेहतर. आपको लगता है कि आपने एक समझदारी भरा चुनाव किया है.

लेकिन क्या हो अगर वो रिटर्न एक ऐसी क़ीमत चुकाकर आया हो, जो आपको कभी दिखी ही नहीं? क्या हो अगर आपके फ़ंड ने ज़रूरत से कहीं ज़्यादा जोख़िम उठाया हो? और आपको उठाए गए जोख़िम के बदले उतना भी न मिल रहा हो, जितना एक ज़्यादा सावधान फ़ंड उतना ही रिटर्न देकर देता?

यही वो फ़ासला है जिसे अल्फ़ा भरने की कोशिश करता है. अल्फ़ा सिर्फ़ यह नहीं देखता कि किसी फ़ंड ने अपने बेंचमार्क को हराया या नहीं. यह देखता है कि उसने जितना जोख़िम उठाया, उस हिसाब से वो हराया या नहीं. आसान शब्दों में कहें, तो अल्फ़ा से फ़ंड मैनेजर की असली मेहनत का पता चलता है. यह बताता है कि कमाई क़िस्मत या ज़्यादा जोख़िम से नहीं, बल्कि हुनर से हुई.

एक आसान उदाहरण

मान लीजिए एक फ़ंड ने तीन साल में 20% रिटर्न दिया, जबकि उसके बेंचमार्क ने 15%. यानी फ़ंड ने बेंचमार्क से 5% ज़्यादा कमाया. लेकिन क्या यही अल्फ़ा है?

ज़रूरी नहीं. यह इस बात पर टिका है कि फ़ंड ने कितना जोख़िम उठाया.

अब मान लीजिए फ़ंड का बीटा 0.85 है. इसका मतलब है कि फ़ंड बाज़ार से थोड़ा कम ऊपर-नीचे होता है. जब बाज़ार 1% ऊपर या नीचे जाता है, तो यह फ़ंड सिर्फ़ 0.85% ऊपर या नीचे जाता है. और मान लीजिए जोख़िम-मुक्त दर 3% थी, यानी वो रिटर्न जो आपको एक सुरक्षित सरकारी बॉन्ड पर मिलता.

अब अनुमानित रिटर्न और अल्फ़ा ऐसे निकलते हैं:

अनुमानित रिटर्न = जोख़िम-मुक्त दर + बीटा × (बाज़ार का रिटर्न − जोख़िम-मुक्त दर) 

= 3% + 0.85 × (15% − 3%) 

= 3% + 0.85 × 12%

 = 3% + 10.2%

 = 13.2%

अल्फ़ा = असली रिटर्न − अनुमानित रिटर्न 

= 20% − 13.2%

= 6.8%

अब एक बात ग़ौर कीजिए. फ़ंड ने बेंचमार्क से 5% ज़्यादा कमाया था. लेकिन उसका असल अल्फ़ा 6.8% निकला, यानी और भी ज़्यादा. ऐसा इसलिए क्योंकि फ़ंड ने यह रिटर्न बेंचमार्क से कम जोख़िम उठाकर कमाया. जो फ़ंड बाज़ार से कम जोख़िम ले और फिर भी उससे आगे निकल जाए, उसने सच में कमाल किया है. अल्फ़ा इसी कमाल को पकड़ता है. सिर्फ़ ज़्यादा रिटर्न देखकर यह बात पता नहीं चलती.

पॉज़िटिव अल्फ़ा का मतलब है मैनेजर ने सच में कुछ जोड़ा. नेगेटिव अल्फ़ा का मतलब है उसने कुछ नहीं जोड़ा. और शून्य का मतलब है उसने ठीक उतना ही दिया, जितनी उसके जोख़िम से उम्मीद थी.

कौन सी कैटेगरी सबसे ज़्यादा अल्फ़ा देती है?

सिद्धांत में बात साफ़ है. लेकिन आज भारत के एक्टिव फ़ंड में अल्फ़ा असल में दिखता कैसा है?

अल्फ़ा लीडरबोर्ड

यहीं पर एक्टिव मैनेजमेंट असल में वैल्यू जोड़ रहा है

कैटेगरी
पॉज़िटिव अल्फ़ा वाले फ़ंड (%) सबसे ज़्यादा अल्फ़ा वाले 5 फ़ंड का औसत अल्फ़ा - 3 साल (%)
वैल्यू 95.7 7.4
लार्ज और मिड-कैप 92.3 8.4
लार्ज-कैप 77.4 4.7
फ़्लेक्सी-कैप 71.4 7.3
स्मॉल-कैप 70.8 7
मिड-कैप 65.5 4.8
कैटेगरी वैल्यू रिसर्च के मुताबिक़. डेटा 29 जून 2026 तक. अल्फ़ा डेटा वाले एक्टिव फ़ंड के आधार पर.

वैल्यू और लार्ज-एंड-मिड-कैप फ़ंड सबसे आगे हैं, जहां 10 में से 9 से ज़्यादा फ़ंड पॉज़िटिव अल्फ़ा दे रहे हैं. 65.5% के आंकड़े के साथ मिड-कैप सबसे पीछे है. हर कैटेगरी के सबसे ज़्यादा अल्फ़ा वाले पांच फ़ंड देखें, तो चार कैटेगरी में औसत अल्फ़ा 5% से ऊपर है और लार्ज-एंड-मिड-कैप 8.4% के साथ सबसे आगे. एक बात ध्यान रखें, ये आंकड़े हर कैटेगरी के सिर्फ़ टॉप पांच फ़ंड के हैं, पूरी कैटेगरी के नहीं. 

अल्फ़ा अकेले क्या नहीं बता सकता

जिस फ़ंड का एक या दो साल में अल्फ़ा मज़बूत हो, ज़रूरी नहीं कि अगले साल भी वैसा ही रहे. बाज़ार बदलते रहते हैं. जो किसी तेज़ी के दौर में काम आया, हो सकता है गिरावट में काम न आए. एक अच्छे नंबर से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है हर तरह के बाज़ार में एक जैसा बने रहना.

इसलिए अल्फ़ा को दूसरे पैमानों के साथ मिलाकर देखिए. स्टैंडर्ड डेविएशन बताता है कि रिटर्न महीने-दर-महीने कितना ऊपर-नीचे होता है. शार्प रेशियो बताता है कि फ़ंड ने उठाए गए हर जोख़िम के बदले कितना रिटर्न कमाया. ये सब साथ मिलकर किसी एक नंबर से कहीं ज़्यादा साफ़ तस्वीर देते हैं.

एक्टिव फ़ंड के लिए, लंबे समय तक लगातार पॉज़िटिव अल्फ़ा ध्यान देने लायक़ बात है. इससे पता चलता है कि फ़ंड मैनेजर ने सिर्फ़ बढ़ते बाज़ार पर सवारी नहीं की, बल्कि सच में अपनी फ़ीस कमाई है. फिर भी, फ़ंड चुनते वक़्त बाक़ी बातों पर भी ग़ौर ज़रूर कीजिए.

किस फ़ंड ने सच में अपना अल्फ़ा कमाया है, और क्या उनमें से कोई आपके पोर्टफ़ोलियो के लायक़ है, यही जानने के लिए वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र बना है. यह किसी एक पैमाने से आगे जाकर आपको साफ़ बताता है कि क्या रखना है, क्या छोड़ना है और आगे क्या ख़रीदना है.

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यह भी पढ़ें: सस्ता इंडेक्स फ़ंड ही सबसे अच्छा नहीं होता: ट्रैकिंग एरर और ट्रैकिंग डिफ़रेंस समझिए

ये लेख पहली बार जून 30, 2026 को पब्लिश हुआ.

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