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म्यूचुअल फ़ंड में Standard Deviation क्या होता है? इसे समझना क्यों ज़रूरी है?

यह बताता है कि किसी म्यूचुअल फ़ंड का रिटर्न अपने औसत रिटर्न से कितना ऊपर-नीचे जाता रहा है.

यह बताता है कि किसी म्यूचुअल फ़ंड का रिटर्न अपने औसत रिटर्न से कितना ऊपर-नीचे जाता रहा है.Photo: Manish Yadav

ज़्यादातर लोग म्यूचुअल फ़ंड चुनते समय सबसे पहले उसका रिटर्न देखते हैं. लेकिन सिर्फ़ रिटर्न देखकर निवेश का फ़ैसला करना सही नहीं है. कई बार दो फ़ंड लगभग एक जैसा रिटर्न देते हैं, लेकिन उनमें जोखिम का स्तर बिल्कुल अलग होता है. ऐसे में एक महत्वपूर्ण पैमाना है Standard Deviation. इसे समझकर आप यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि किसी म्यूचुअल फ़ंड के रिटर्न कितने स्थिर रहे हैं और उसमें उतार-चढ़ाव कितना रहा है?

Standard Deviation क्या होता है?

आसान भाषा में कहें तो Standard Deviation एक पाठक का सवालः Standard Deviation क्या होता है? क्या म्यूचुअल फ़ंड में निवेश से पहले इसे ज़रूर देखना चाहिए? यानी यह फ़ंड के रिटर्न में होने वाले उतार-चढ़ाव (Volatility) का पैमाना है. जितना ज़्यादा Standard Deviation होगा, फ़ंड के रिटर्न में उतना ही ज़्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है. वहीं, कम Standard Deviation का मतलब है कि रिटर्न तुलनात्मक रूप से ज़्यादा स्थिर रहे हैं.

एक आसान उदाहरण

मान लीजिए दो म्यूचुअल फ़ंड हैं. दोनों ने पिछले कुछ वर्षों में औसतन 12% सालाना रिटर्न दिया.

  • फ़ंड A का Standard Deviation कम है. इसके रिटर्न हर साल 10% से 14% के बीच रहे.
  • फ़ंड B का Standard Deviation ज़्यादा है. इसने कभी 30% तक रिटर्न दिया तो कभी 8% तक कमज़ोरी देखने को मिली.

दोनों का औसत रिटर्न एक जैसा हो सकता है, लेकिन फ़ंड B का सफ़र कहीं ज़्यादा उतार-चढ़ाव वाला रहा. यही अंतर Standard Deviation दिखाता है.

निवेशक के लिए इसे जानना क्यों ज़रूरी है?

अगर आप पहली बार निवेश कर रहे हैं या बाज़ार के बड़े उतार-चढ़ाव से घबराते हैं, तो कम Standard Deviation वाले फ़ंड आपके लिए ज़्यादा सहज हो सकते हैं. दूसरी तरफ़, अगर आपका निवेश का समय लंबा है और आप जोखिम उठा सकते हैं, तो ज़्यादा उतार-चढ़ाव वाले फ़ंड भी आपके पोर्टफ़ोलियो का हिस्सा बन सकते हैं.

हालांकि, कम Standard Deviation का मतलब हमेशा बेहतर फ़ंड नहीं होता और ज़्यादा Standard Deviation का मतलब हमेशा ख़राब फ़ंड भी नहीं होता. कई स्मॉल कैप या सेक्टोरल फ़ंड स्वाभाविक रूप से ज़्यादा उतार-चढ़ाव वाले होते हैं, लेकिन लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न भी दे सकते हैं. इसलिए इस पैमाने को हमेशा फ़ंड की कैटेगरी के हिसाब से देखें.

क्या सिर्फ़ Standard Deviation देखकर फ़ंड चुनना चाहिए?

नहीं. यह सिर्फ़ जोखिम का एक संकेतक है. किसी भी म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करने से पहले इन बातों पर भी ध्यान दें:

  • फ़ंड का लंबी अवधि का ट्रैक रिकॉर्ड
  • फ़ंड मैनेजर का प्रदर्शन
  • एक्सपेंस रेशियो
  • आपके फ़ाइनेंशियल गोल
  • आपकी जोखिम उठाने की क्षमता
  • Sharpe Ratio और Alpha जैसे अन्य जोखिम मापदंड 

किसी फ़ंड का मूल्यांकन हमेशा कई पैमानों को साथ देखकर करना चाहिए, न कि सिर्फ़ एक आंकड़े के आधार पर.

निष्कर्ष

म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करते समय सिर्फ़ यह मत देखिए कि किस फ़ंड ने सबसे ज़्यादा रिटर्न दिया. यह भी समझिए कि वह रिटर्न कितने जोखिम के साथ आया. Standard Deviation आपको यही तस्वीर दिखाता है. अगर आप इसे अपने निवेश के दूसरे महत्वपूर्ण पैमानों के साथ मिलाकर समझेंगे, तो बेहतर और ज़्यादा समझदारी वाला निवेश फ़ैसला ले सकेंगे.

यह भी पढ़ेंः सिर्फ़ रिटर्न देखकर क्यों धोखा खा सकते हैं म्यूचुअल फ़ंड निवेशक?

ये लेख पहली बार जुलाई 02, 2026 को पब्लिश हुआ.

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