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NSE का IPO 2016 में अटक गया था, लेकिन रिटर्न और रिस्क दोनों रहे ज़बरदस्त

इसकी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी SEBI की रेगुलेटरी कार्रवाई की जद में है.

इसकी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी SEBI की रेगुलेटरी कार्रवाई की जद में है.Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः NSE के IPO को लेकर लगभग एक दशक से चर्चाएं हो रही हैं. इस दौरान यह एक्सचेंज और बड़ा, और अमीर, और दबदबे वाला होता गया. लेकिन जिस इंजन ने इसे यहां तक पहुंचाया, वही अब सीधे SEBI के निशाने पर है.

NSE ने 2016 में IPO के लिए अर्ज़ी दी थी. लेकिन वो बिक्री कभी हुई ही नहीं. ट्रेडिंग तक ग़लत तरीक़े से पहुंच के एक घोटाले ने इस योजना को सालों के लिए रोक दिया. फिर आया एक दशक का इंतज़ार. इस बार IPO का साइज़ क़रीब ₹30,000 करोड़ है, जो भारत के इतिहास की सबसे बड़ी शेयर सेल है. सबसे बड़े साइज़ वाली हेडलाइन उस दशक को पीछे छोड़ देंगी. पर यही वो हिस्सा है जो आपको ख़रीदने या न ख़रीदने का फ़ैसला करने से पहले पढ़ना चाहिए.

2016 में इसे किसने रोका

रुकावट थी को-लोकेशन. 2010 और 2014 के बीच, कुछ ब्रोकर सबसे पहले NSE के डेटा सेंटर के अंदर एक बैकअप सर्वर से जुड़ जाते थे. इससे उन्हें बाज़ार का डेटा बाक़ी सबसे कुछ मिलीसेकंड पहले मिल जाता था. हाई-फ़्रीक्वेंसी ट्रेडिंग में, मिलीसेकंड ही पैसा होते हैं. एक फ़ोरेंसिक ऑडिट ने इस गड़बड़ी की पुष्टि की. SEBI ने जांच शुरू की और जब NSE ने 2016 में अपना प्रॉस्पेक्टस दाख़िल किया, तब यह मामला खुला हुआ था. इसके बंद होने को लेकर कोई उम्मीद भी नहीं थी. बाज़ार रेगुलेटरी के लिए लिस्टिंग रोकने को इतनी अनिश्चितता ही काफ़ी थी.

इसके बाद जो हुआ वो SEBI के जुर्मानों, ट्रिब्यूनल की लड़ाइयों और सुप्रीम कोर्ट से गुज़रता एक दशक लंबा संघर्ष था. यह लंबी कहानी अब अपने आख़िरी अध्याय में है, क्योंकि NSE ने SEBI के साथ ₹1,491 करोड़ की एक नई सेटलमेंट रक़म की पेशकश की है, जो ख़बरों के मुताबिक़ सुलझने के क़रीब है.

यही पृष्ठभूमि बताती है कि 2022 में आशीष चौहान का आना कितना अहम साबित हुआ. NSE की शुरुआती टीम के एक सदस्य, जिन्होंने बाद में BSE की 2017 की लिस्टिंग की अगुवाई की, वो लौटे और उन्होंने रेगुलेटरी भरोसा वापस लाने में मदद की, और लंबे समय से रुके इस IPO को फिर पटरी पर लाया.

पिछले दशक में इसने क्या बनाया

यहां वो हिस्सा है जो ज़्यादातर ख़बरें छोड़ देंगी. जो 10 साल NSE लिस्ट नहीं हो पाया, वही 10 साल उसकी सबसे तेज़ बढ़त के साबित हुए.

 
FY16 FY26
ऑपरेशंस से आमदनी ₹1,863 करोड़ ₹16,601 करोड़
एडजेस्टेड नेट प्रॉफ़िट ₹975 करोड़ ₹9,101 करोड़
रजिस्टर्ड निवेशक 2 करोड़ 12.9 करोड़
लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप ₹93 लाख करोड़ ₹411 लाख करोड़
डेरिवेटिव से आमदनी ₹900 करोड़ ₹11,478 करोड़
मुनाफ़े के आंकड़े ख़ास और एक बार के मदों के हिसाब से एडजस्टेड हैं.

आमदनी क़रीब नौ गुना बढ़ी. इन आंकड़ों के अंदर का बदलाव और भी कुछ कहता है. एक्सचेंज पैसा मुख्य रूप से हर बार किसी निवेशक के ट्रेड करने पर एक ट्रांज़ैक्शन फ़ीस लेकर कमाते हैं, साथ में लिस्टिंग फ़ीस, डेटा सेवाएं और तकनीकी सुविधाएं. फ़ाइनेंशियल ईयर 16 में, ट्रांज़ैक्शन चार्ज NSE की कुल आमदनी का 49.5% थे. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 तक यह हिस्सा बढ़कर 78.7% हो गया, जिसकी मुख्य वजह रही डेरिवेटिव ट्रेडिंग, ख़ासकर ऑप्शंस, जिसमें हाल के सालों में रिटेल के दम पर ज़बरदस्त बढ़त देखी गई. NSE बस उसी एक कारोबार में और गहरे उतरकर बढ़ा, जो सबसे तेज़ी से फैल रहा था. नतीजा यह कि ऑप्शंस अकेले क़रीब 60% ऑपरेटिंग आमदनी देते हैं, जो इस मिश्रण में सबसे बड़ा हिस्सा है.

जब ताक़त ही कमज़ोरी बन जाए

SEBI के अपने आंकड़े दिखाते हैं कि अकेले फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में 91% फ़्यूचर और ऑप्शंस रिटेल ट्रेडरों को शुद्ध नुकसान हुआ और उन्होंने मिलकर क़रीब ₹1.1 लाख करोड़ गंवाए. इसीलिए रेगुलेटरी इस हिस्से को धीमा करने पर तुला है. 2024 से उसने इक्विटी डेरिवेटिव के कई नियम बदले, जिनमें दोनों एक्सचेंज पर हफ़्ते की सात एक्सपायरी को घटाकर एक साप्ताहिक इंडेक्स एक्सपायरी करना शामिल है: NSE का निफ़्टी मंगलवार को, BSE का सेंसेक्स गुरुवार को. SEBI ने कॉन्ट्रैक्ट का साइज़ भी बढ़ाया और एक्सपायरी के क़रीब ज़्यादा मार्जिन लगाए.

फ़ाइनेंशियल ईयर 26 इन नियमों के तहत NSE का पहला पूरा साल था. ऑपरेशंस से आमदनी साल-दर-साल क़रीब 3% गिरी. एडजेस्टेड नेट प्रॉफ़िट ₹9,101 करोड़ रहा, जो फ़ाइनेंशियल ईयर 25 के ₹10,978 करोड़ से 17% कम है. इससे भी अहम, इक्विटी ऑप्शंस में NSE की बाज़ार हिस्सेदारी फ़ाइनेंशियल ईयर 24 के 97% से गिरकर फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में 75% रह गई. मुनाफ़े पर यह चोट इसलिए भी है क्योंकि कारोबार का कोई और हिस्सा इतना बड़ा नहीं कि ऑप्शंस की कमी को पूरा कर सके.

बाक़ी 21% आमदनी, जो डेटा फ़ीड, लिस्टिंग फ़ीस, इंडेक्स लाइसेंसिंग और को-लोकेशन चार्ज से आती है, वो बार-बार आने वाली, कम उतार-चढ़ाव वाली और बढ़ती हुई है. चूंकि डेरिवेटिव ने एक दशक तक पैसा छापा, NSE को कभी बाक़ी जगह अपनी क़ीमतें सुधारने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी. कैश-मार्केट के चार्ज कम बने रहे. लिस्टिंग फ़ीस दुनिया के दूसरे एक्सचेंजों से नीचे है. ये सारे रास्ते अब भी काफ़ी हद तक बिना छुए पड़े हैं. ये ऑप्शंस की तेज़ गिरावट की भरपाई तो नहीं करेंगे, पर फ़ासला ज़रूर कम कर सकते हैं.

BSE की टक्कर ने गर्मी बढ़ा दी

10 साल की सालाना मुनाफ़ा बढ़त लगभग एक जैसी है: NSE 30%, BSE 28%. यही एक नंबर दो अलग कहानियां छिपाए बैठा है. पहले पांच साल में NSE डेरिवेटिव में लगभग पूरे दबदबे से बढ़ा, जबकि BSE के पास डेरिवेटिव का कोई ख़ास कारोबार नहीं था और उसका मुनाफ़ा तो फ़ाइनेंशियल ईयर 16 और फ़ाइनेंशियल ईयर 21 के बीच घट ही गया. यह दशक भर की बराबरी पूरी तरह इसलिए है क्योंकि BSE ने पिछले चार साल में क्या किया.

नेट प्रॉफ़िट (करोड़ ₹)
NSE BSE
FY16 654 205
FY21 3,729 156
FY26 9,101 2,475
CAGR, 10 साल (%) 30.1 28.3
CAGR, 5 साल (%) 19.5 73.8
नेट प्रॉफ़िट ख़ास और एक बार के मदों को छोड़कर है, और रिपोर्ट की गई इकाई के आधार पर बताया गया है, इसलिए फ़ाइनेंशियल ईयर 16 का आंकड़ा ऊपर की टेबल के ₹975 करोड़ एडजेस्टेड-कंसॉलिडेटेड नंबर से अलग है. CAGR यानी सालाना बढ़त की दर.

पांच साल की प्रॉफ़िट ग्रोथ यही दिखाती है. BSE 73.8% की दर से बढ़ा, NSE 19.5% की. इसकी वजह वही रेगुलेटरी फेरबदल था जिसने NSE को चोट पहुंचाई. इसने BSE को इंडेक्स ऑप्शंस में वो मौक़ा दिया जो उसके पास पहले कभी नहीं था. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 इसे साफ़ दिखाता है: NSE का मुनाफ़ा गिरा, BSE का 88% बढ़ा. BSE अपनी कमाई के 64 गुना पर ट्रेड करता है, क्योंकि बाज़ार को उम्मीद है कि वो एक छोटे आधार से हिस्सेदारी छीनता रहेगा. NSE एक ऐसे बाज़ार की चोटी से बढ़ रहा है जिस पर उसका पहले से ही मालिकाना है.

एक बढ़िया कारोबार, जिसकी क़ीमत का आकलन ज़रूरी

फिर भी NSE भारत के वित्तीय हाईवे पर एक टोल बूथ है. हर ट्रेड जो होता है, हर कॉन्ट्रैक्ट जो सेटल होता है, हर पैसिव फ़ंड जो निफ़्टी से बेंचमार्क होता है, NSE कुछ न कुछ कमाता है. यह इस बात में दिखता है कि वो कितनी दुर्लभ निरंतरता से पैसा कमाता है. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में उसने 51% का मुनाफ़ा मार्जिन दिखाया, मुनाफ़े का 84% डिविडेंड के तौर पर बांटा, और फिर भी ₹64,771 करोड़ के ट्रेज़री निवेश अपने पास रखे. यह कारोबार अपने चलने या बढ़ने की ज़रूरत से कहीं ज़्यादा नक़दी पैदा करता है, जो किसी बढ़िया कारोबार की पहचान है.

लेकिन सड़क रेगुलेटरी के हाथ में है. SEBI तय करता है कि NSE कौन से कॉन्ट्रैक्ट दे सकता है, किस साइज़ में, किन दिनों में, और कितने मार्जिन के साथ. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में उसने NSE की सबसे मुनाफ़े वाली लेन पर रफ़्तार धीमी कर दी, और वो गिरावट सीधे मुनाफ़े तक पहुंची. और यही मांग करता है कि इसके IPO की क़ीमत, जब घोषित हो, उसे इसी हिसाब से परखा जाए.

अनलिस्टेड मार्केट में इसके सौदे, ₹1,999.36 प्रति शेयर पर हो रहे हैं, जो फ़ाइनेंशियल ईयर 26 की कमाई के मुक़ाबले क़रीब ₹4.95 लाख करोड़ का मार्केट कैप बताते हैं, यानी क़रीब 54 गुना. यह एक ऐसे कारोबार के लिए असहज हो सकता है जिसके सबसे मुनाफ़े वाले प्रोडक्ट को SEBI जानबूझकर छोटा कर रहा है, और जो एक ऐसे बाज़ार की चोटी से बढ़ रहा है जिस पर उसका पहले से दबदबा है. हालांकि, प्राइस बैंड अभी घोषित होना बाक़ी है. एक बार वो आ जाए, तो परीक्षा आसान होगी: क्या क़ीमत आपसे उस बढ़त के पैसे मांग रही है जो NSE पहले ही कमा चुका है, या उस बढ़त के जो आगे सच में मुमकिन है?

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यह भी पढ़ें: भारत में IPO आख़िर कैसे काम करते हैं?

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