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NSE: आ रहा भारत का सबसे बड़ा IPO, लेकिन ग़लत समय पर क्यों?

NSE की लिस्टिंग एक रिकॉर्ड बनाएगी. लेकिन उसका मुनाफ़ा अभी 15% गिरा है और उस गिरावट के पीछे की वजह ही वो बात है जो निवेशकों को असल में पढ़नी चाहिए.

NSE की लिस्टिंग एक रिकॉर्ड बनाएगी. लेकिन उसका मुनाफ़ा अभी 15% गिरा है और उस गिरावट के पीछे की वजह ही वो बात है जो निवेशकों को असल में पढ़नी चाहिए.Vinayak Pathak/AI-Generated Image

सारांशः क़रीब ₹30,000 करोड़ के साथ NSE की लिस्टिंग भारत की अब तक की सबसे बड़ी होगी. लेकिन यह पूरी तरह एक ऑफ़र फ़ॉर सेल है, कोई नई पूंजी नहीं जुटा रही है और 15% मुनाफ़े की गिरावट के बाद आ रही है. इस गिरावट की वजह है नियामक की डेरिवेटिव ट्रेडिंग पर लगाम. यह लेख रिकॉर्ड से आगे उस सवाल को देखता है जो असल में मायने रखता है: एक लगभग मोनोपोली वाली कंपनी की क़ीमत क्या है, जब उसका मुख्य इंजन जानबूझकर धीमा किया जा रहा हो?

एक ख़ास तरह का IPO होता है जो ठीक ग़लत वक़्त पर आता है. ग़लत इसलिए नहीं कि बाज़ार नीचे है या मूड कमज़ोर है, बल्कि इसलिए कि बिज़नेस के भीतर ही कुछ बुनियादी बदल चुका है. और लिस्टिंग ठीक उसी वक़्त आ जाती है.

भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज देश का सबसे बड़ा IPO बनने वाला है. 17 जून 2026 को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने अपना ड्राफ़्ट प्रॉस्पेक्टस दाख़िल किया. इसमें अनुमानित ₹30,000 करोड़ के शेयर बेचे जाएंगे, इतने कि वो अब तक की लिस्ट में Hyundai Motor India को भी पीछे छोड़ दे. हेडलाइन इसी पर टिकी रहेंगी. वो लैंडमार्क, मील का पत्थर और ऐतिहासिक जैसे शब्द इस्तेमाल करेंगी.

लेकिन ज़्यादा काम का सवाल कुछ और है. NSE का सालाना मुनाफ़ा FY26 में 15% गिरा. इसलिए नहीं कि बाज़ार कमज़ोर था, बल्कि इसलिए कि नियामक ने जानबूझकर उस रिटेल ऑप्शंस की दीवानगी को ठंडा किया जिसने इस एक्सचेंज को इतना मुनाफ़ेदार बनाया था. तो आप सिर्फ़ यह तय नहीं कर रहे कि एक दबदबे वाली कंपनी की क़ीमत क्या है. आप यह तय कर रहे हैं कि उसकी क़ीमत ठीक उस वक़्त क्या है जब उसका मुख्य इंजन धीमा किया जा रहा है. और एक छोटा कॉम्पिटिटर पहले ही उसके छूटे हुए हिस्से समेटने लगा है.

यह वो सवाल है जिसका जवाब रिकॉर्ड नहीं देता.

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डील कैसी है?

इस ऑफ़र की कुछ बातें हेडलाइन के नंबर से ज़्यादा मायने रखती हैं.

फ़ीचर
ब्यौरा
अनुमानित आकार ₹30,000 करोड़
प्रकार 100% ऑफ़र फ़ॉर सेल (OFS)
बिकने वाले शेयर 14.9 करोड़

सबसे अहम बात है "ऑफ़र फ़ॉर सेल." इसका मतलब है कि इस इश्यू से NSE को कुछ नहीं मिलता. हर रुपया उन शेयरहोल्डरों के पास जाता है जो अपना पैसा निकाल रहे हैं, जिसमें स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, मॉर्गन स्टैनली की निवेश इकाई, टाइगर ग्लोबल, टेमासेक, कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड और कई सरकारी बीमा कंपनियां शामिल हैं. इनमें से कुछ शेयरधारक क़रीब एक दशक से इंतज़ार कर रहे हैं. उनके लिए यह लंबे समय से रुका हुआ मुनाफ़े का दिन है. यह विकास के लिए पैसा जुटाना नहीं है.

यह एक लंबी कहानी का अंत भी है. NSE ने पहली बार 2016 में लिस्ट होने की अर्ज़ी दी थी. लेकिन यह योजना सालों तक को-लोकेशन मामले में अटकी रही. इसमें आरोप था कि कुछ ब्रोकरों को एक्सचेंज के ट्रेडिंग सिस्टम तक ख़ास और तेज़ पहुंच मिली थी. NSE ने यह मामला निपटाने की पेशकश की है. मार्च 2026 में उसने अपनी प्रस्तावित सेटलमेंट रक़म बढ़ाकर क़रीब ₹1,491 करोड़ की और क़रीब ₹1,391 करोड़ अलग रख दिए. SEBI का अंतिम फ़ैसला अभी आना बाक़ी है. 2026 की शुरुआत में मिली एक शुरुआती मंज़ूरी ने अर्ज़ी का रास्ता साफ़ किया.

जो रिकॉर्ड यह तोड़ेगा

क़रीब ₹30,000 करोड़ के साथ NSE भारत की IPO की लिस्ट में सबसे ऊपर पहुंच जाएगा:

कंपनी
IPO का साइज़ साल
NSE (प्रस्तावित) ₹30,000 करोड़ 2026
Hyundai Motor India ₹27,859 करोड़ 2024
LIC ₹20,557 करोड़ 2022
Paytm (One97) ₹18,300 करोड़ 2021
Tata Capital ₹15,512 करोड़ 2025
Coal India ₹15,199 करोड़ 2010

और यह एक सुस्त साल में आ रहा है. भारत का प्राइमरी बाज़ार धीमा पड़ गया है. Equirus Capital की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2026 में अब तक क़रीब 23 कंपनियों ने थोड़े ₹27,000 करोड़ से ऊपर जुटाए हैं. यह 2025 के मुक़ाबले बड़ी गिरावट है, जब 103 इश्यू ने ₹1.76 लाख करोड़ जुटाए थे. इतने बड़े आकार की एक लिस्टिंग पूरा माहौल बदल सकती है. 

मोट: ऑप्शंस पर टिकी एक लगभग मोनोपोली

जोख़िम समझने से पहले NSE का दबदबा समझें. यह सिर्फ़ बाज़ार की अगुवा नहीं है. यह तो लगभग पूरा बाज़ार ही है. कैश-मार्केट में क़रीब 93% कारोबार इसी का है. इक्विटी फ़्यूचर में क़रीब 99.8%. इक्विटी ऑप्शंस में क़रीब 74.7%. ट्रेड हुए इक्विटी-डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट की संख्या के हिसाब से यह दुनिया का सबसे बड़ा एक्सचेंज है. इसके पास क़रीब 25.7 करोड़ निवेशक खाते हैं.

यह दबदबा सीधे मुनाफ़े में दिखता है. हर बार जब कोई ट्रेड करता है, एक्सचेंज को एक फ़ीस मिलती है, जिसे ट्रांज़ैक्शन चार्ज कहते हैं. यही फ़ीस कुल आमदनी के चौथे-पांचवें से ज़्यादा हिस्सा है. और इसमें भी एक ही प्रोडक्ट सबसे बड़ा बोझ उठाता है. अकेले इक्विटी ऑप्शंस इस ट्रांज़ैक्शन आमदनी का क़रीब 77% हैं. ऑप्शंस एक तरह के डेरिवेटिव हैं, यानी ऐसे कॉन्ट्रैक्ट जिनकी क़ीमत किसी शेयर या इंडेक्स से तय होती है. भारत दुनिया का सबसे व्यस्त ऑप्शंस बाज़ार एक रिटेल ट्रेडिंग बूम के दम पर बना, जो कुछ सालों तक ऐसा लगा जैसे कभी रुकेगा ही नहीं.

यह एक शानदार बिज़नेस है, जब तक वॉल्यूम बढ़ता रहे. दिक्कत तब आती है जब कोई जानबूझकर उस वॉल्यूम को घटा दे.

पेच: नियामक ही इंजन को ठंडा कर रहा है

ठीक यही हुआ है. जुलाई 2024 से SEBI ने डेरिवेटिव में उस रिटेल सट्टेबाज़ी पर लगाम कसनी शुरू की जिसे वो हद से ज़्यादा मानता था. अक्टूबर 2024 में उसने कई बदलाव किए, जैसे हफ़्ते में कम एक्सपायरी दिन, बड़े लॉट साइज़ और ज़्यादा न्यूनतम कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू. ये सीधे NSE की जड़ पर लगे.

FY26 के आंकड़े
स्थिति
ऑपरेशंस से आमदनी ₹16,601 करोड़ (3% कम)
नेट प्रॉफ़िट ₹10,302 करोड़ (15% कम, ₹12,188 करोड़ से)
इक्विटी-फ़्यूचर का रोज़ाना औसत कारोबार साल-दर-साल 14% कम
इक्विटी-ऑप्शंस का रोज़ाना औसत कारोबार साल-दर-साल 8% कम

रोज़ाना औसत कारोबार बताता है कि एक दिन में औसतन कितनी वैल्यू के कॉन्ट्रैक्ट ट्रेड हुए. चूंकि ऑप्शंस NSE की ट्रांज़ैक्शन आमदनी का 77% हैं, वहां ज़रा सी गड़बड़ी हो तो छुपने की कोई जगह नहीं बचती.

और एक कॉम्पिटिटर ने तेज़ी से मौक़ा लपका. SEBI के "हर एक्सचेंज पर हफ़्ते में एक एक्सपायरी" नियम ने NSE को अपना ज़्यादातर एक्सपायरी कैलेंडर छोड़ने पर मजबूर किया. जवाब में BSE ने अपने सेंसेक्स ऑप्शंस की एक्सपायरी शुक्रवार को रखी, जो NSE के गुरुवार से अलग दिन है, और छिटके हुए रिटेल ट्रेडरों को अपने पास खींच लिया. BSE का ऑप्शंस वॉल्यूम लगभग शून्य से बढ़कर बहुत बड़ा हो गया. चूंकि उसकी लागत NSE की लागत के मुक़ाबले बहुत कम है, वॉल्यूम का हर नया रुपया उसके मुनाफ़े में ज़्यादा सीधे जुड़ता है.

एक बात ऐसी भी है जिसे जश्न वाली ख़बरें अक्सर छोड़ देती हैं. SEBI के अपने शोध में पाया गया कि अकेले फ़्यूचर-और-ऑप्शंस ट्रेडरों ने तीन साल में क़रीब ₹1.8 लाख करोड़ गंवाए, जबकि बड़ी प्रोप्राइटरी डेस्क और विदेशी निवेशक दूसरी तरफ़ रहे यानी कमाते रहे. जिस रिटेल दीवानगी ने NSE की रिकॉर्ड कमाई खड़ी की, वो ज़्यादातर रिटेल लोगों के लिए एक हारने वाला खेल थी. ठीक इसी को ठंडा करने नियामक निकला था. तो NSE ख़रीदने वाला निवेशक, एक हद तक, उसी गतिविधि के भविष्य पर दांव लगा रहा है जिसे नियामक रोकने की कोशिश कर रहा है.

आख़िरी बात

आपके लिए, एक निवेशक के तौर पर, रास्ता हाइप से आसान है. प्राइस बैंड और SEBI के आख़िरी फ़ैसले का इंतज़ार करें. और ऑप्शंस पर इस निर्भरता को ईमानदारी से तौलें.

किसी बिज़नेस की असल क़ीमत तय करना, उससे अलग जो हेडलाइन कहती हैं, यही काम वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र करता है. हर रेकमेंडेशन बिज़नेस से शुरू होता है, शोर से नहीं: कंपनी क्या कमाती है, उसे क्या ख़तरा है और क्या उसकी क़ीमत इन दोनों को ईमानदारी से दिखाती है.

और याद रखें, इतिहास का सबसे बड़ा IPO भी आख़िर में बस एक और कंपनी है, जो आपसे यही पूछ रही है कि उसकी क़ीमत क्या होनी चाहिए.

वैल्यू रिसर्च की राय

बाज़ार चाहे रिकॉर्ड बनाए या न बनाए, सही फ़ैसला हमेशा बिज़नेस और क़ीमत पर टिका होता है. वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र आपको हाइप से अलग, असली बिज़नेस की पड़ताल में मदद करता है.

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यह भी पढ़ें: भारत में IPO आख़िर कैसे काम करते हैं?

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