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दो रेटिंग एजेंसियां, लेकिन एक-दूसरे से अलग होता दांव

CARE और ICRA दोनों एक ही इंडस्ट्री पर राज करती हैं. फ़र्क़ इस बात का है कि वे अपनी कमाई का इस्तेमाल कैसे करती हैं.

CARE और ICRA दोनों एक ही इंडस्ट्री पर राज करती हैं. फ़र्क़ इस बात का है कि वे अपनी कमाई का इस्तेमाल कैसे करती हैं.Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः CARE Ratings और ICRA एक ही रेटिंग बिज़नेस में टॉप पर हैं, लेकिन इससे मिलने वाले पैसे को लेकर दोनों का तरीक़ा बिल्कुल अलग है. CARE अपने कोर रेटिंग बिज़नेस से मज़बूत मार्जिन कमा रही है, जबकि ICRA रिसर्च, एनालिटिक्स और टेक्नोलॉजी में भारी निवेश करके एक दूसरा ग्रोथ इंजन खड़ा कर रही है.

CARE Ratings और ICRA का काम एक जैसा है, लेंडर और बॉन्ड ख़रीदने वालों को यह बताना कि कोई क़र्ज़दार पैसा लौटाएगा या नहीं. दोनों बैंक लोन, बॉन्ड और स्ट्रक्चर्ड फ़ाइनेंस को रेट करती हैं. दोनों का बिज़नेस फ़ैक्ट्रियों पर नहीं, बल्कि लोगों और डेटा पर चलता है, इसलिए ग्रोथ के लिए ज़्यादा नई पूंजी की ज़रूरत नहीं पड़ती. और दोनों के लिए FY26 शानदार रहा.

लेकिन अब ये दोनों कंपनियां एक जैसा दांव नहीं रह गई हैं.

CARE के FY26 रेवेन्यू का क़रीब 89 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ़ रेटिंग से आया. वहीं ICRA में रेटिंग से ₹336 करोड़ और रिसर्च, एनालिटिक्स व फ़ाइनेंशियल टेक्नोलॉजी से ₹266 करोड़ आए, यानी 56:44 का बंटवारा. यह फ़र्क़ अब इतना बड़ा हो चुका है कि इन दोनों कंपनियों को परखने का तरीक़ा भी बदलना पड़ेगा.

पांच साल, दो अलग रास्ते

ICRA तेज़ी से बढ़ी है, जबकि CARE ने अपने रेटिंग बिज़नेस पर कहीं ज़्यादा निर्भर रहते हुए भी लगभग बराबर रिटर्न बनाए रखा है

कंपनी 5 साल का रेवेन्यू CAGR (%) 5 साल का टैक्स के बाद मुनाफ़े का CAGR (%) 5 साल का औसत ROE (%) 5 साल का औसत ऑपरेटिंग मार्जिन (%) FY26 में रेवेन्यू में रेटिंग का हिस्सा (%)
CARE Ratings 13.7 13.8 15.5 33.6 89.3
ICRA 14.8 17.2 15.6 32.2 55.9

CARE: पुराना बिज़नेस, लेकिन ज़्यादा मेहनत

CARE का रेटिंग रेवेन्यू FY26 में क़रीब ₹423 करोड़ तक पहुंच गया, यानी क़रीब 18 प्रतिशत की बढ़त. स्टैंडअलोन रेवेन्यू 15 प्रतिशत बढ़ा, जबकि स्टैंडअलोन ऑपरेटिंग मार्जिन 48 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो रेटिंग बिज़नेस के लिहाज़ से भी असामान्य रूप से ऊंचा है.

वजह सीधी है. CARE पहले से ही अपने एनालिस्ट रखती है, अपनी रेटिंग कमेटियां चलाती है और अपने डेटाबेस के लिए पैसे चुकाती है, यह सब अगला असाइनमेंट आने से पहले ही हो चुका होता है. जब रेवेन्यू 15 प्रतिशत बढ़ता है, तो इन कॉस्ट को उसी अनुपात में बढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती. FY26 में CARE की एम्प्लॉई कॉस्ट सिर्फ़ 11 प्रतिशत बढ़ी और स्टैंडअलोन रेवेन्यू में इसका 42 प्रतिशत योगदान रहा, जबकि ICRA में यह आंकड़ा लगभग 49 प्रतिशत रहा. रेवेन्यू का हर अतिरिक्त रुपया सीधे CARE के मुनाफ़े में जुड़ रहा है.

इससे यह साबित नहीं होता कि CARE को हमेशा के लिए कॉस्ट का फ़ायदा मिला रहेगा. दोनों कंपनियां लागत को अलग-अलग तरीक़े से बांटती हैं, और न ही कोई प्राइसिंग या एनालिस्ट के काम के बोझ को लेकर पूरी जानकारी देती है, इसलिए यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. लेकिन फ़िलहाल CARE अपने मौजूदा कॉस्ट बेस से ज़्यादा मुनाफ़ा निकाल रही है, भले ही वह लगभग पूरी तरह एक ही बिज़नेस पर निर्भर हो.

ICRA: आकार बढ़ाने के लिए मार्जिन की क़ुर्बानी

ICRA का रेटिंग बिज़नेस भी कमज़ोर नहीं है. FY26 में इसमें दहाई अंकों की अच्छी बढ़त रही. लेकिन रिसर्च और एनालिटिक्स, जिसमें रिस्क मॉडल, बॉन्ड वैल्यूएशन, बैंकिंग टेक्नोलॉजी और हाल ही में ख़रीदी गई Fintellix शामिल हैं, अब ₹266 करोड़ की हो चुकी है, यानी रेटिंग बिज़नेस के आकार का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा. सिर्फ़ Fintellix के लिए ICRA ने क़रीब ₹250 करोड़ चुकाए.

यहां सोच अलग है. कोई बैंक साल में एक बार रेटिंग एजेंसी को हायर करता है, लेकिन सॉफ़्टवेयर और रिस्क मॉडल का इस्तेमाल वह रोज़ कर सकता है. यह मौक़ा रेटिंग से कहीं बड़ा है और इसी वजह से ICRA अपनी बैलेंस शीट का पैसा इसे हासिल करने में लगा रही है.

हालांकि, इसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ रही है. ICRA के रिसर्च और एनालिटिक्स सेगमेंट का मार्जिन FY26 में सिर्फ़ 24 प्रतिशत रहा, जो CARE की इकोनॉमिक्स के आसपास भी नहीं है. रेटिंग बिज़नेस में एक बार इश्यूअर की रेटिंग हो जाने के बाद स्केल लगभग मुफ़्त में मिलता है. सॉफ़्टवेयर और कंसल्टिंग के साथ ऐसा नहीं होता. अगला कॉन्ट्रैक्ट जीतने के लिए अक्सर अगला एनालिस्ट हायर करना पड़ता है, और किसी प्रोडक्ट को पहले बनाना और बेचना पड़ता है तभी वह कमाई देता है. ICRA आज का पैसा एक ऐसे बाज़ार के लिए लगा रही है जो शायद आगे चलकर फ़ायदा दे.

CARE इस मामले को नज़रअंदाज़ नहीं कर रही. CareEdge Analytics भी इसी तरह के रिस्क प्रोडक्ट बेचती है, लेकिन CARE का पूरा नॉन-रेटिंग बिज़नेस FY26 में सिर्फ़ क़रीब ₹50 करोड़ ही ला पाया और लगभग ब्रेकईवन पर टिका रहा. ICRA की बढ़त वाक़ई असली है, दो दशकों का अनुभव और साथ ही Moody's की ग्लोबल रिसर्च व रेटिंग मेथडोलॉजी का साथ. CARE यही क्षमता कहीं छोटे बेस से, और वह भी ख़रीद के बजाय ख़ुद के दम पर बना रही है.

वह दरवाज़ा जिससे सिर्फ़ CARE गुज़र सकती है

ICRA, CRISIL और India Ratings, तीनों के पीछे ग्लोबल पैरेंट कंपनियां हैं, Moody's, S&P और Fitch, जिनकी पहले से ही इंटरनेशनल रेटिंग फ़्रैंचाइज़ी है, इसलिए इन तीनों के पास एक अलग ग्लोबल ब्रांड खड़ा करने की कोई ख़ास वजह नहीं है. CARE के पीछे ऐसा कोई पैरेंट नहीं है. CareEdge Global के ज़रिए, जो GIFT City यानी भारत के इंटरनेशनल फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ हब में स्थित है, वह एक स्वतंत्र इंटरनेशनल रेटिंग बिज़नेस खड़ा करने की कोशिश कर रही है और अब तक सॉवरेन रेटिंग्स और कई अरब डॉलर के कॉरपोरेट डेट को रेट कर चुकी है. यह अभी दशकों पुराने अनुभव वाली कंपनियों के सामने एक छोटा-सा शुरुआती प्रयोग ही है और यह उतनी ही आसानी से नाकाम भी हो सकता है जितनी आसानी से एक फ़्रैंचाइज़ी बन सकता है. लेकिन ICRA इस राह पर उतनी आज़ादी से नहीं चल सकती.

मार्केट ने फ़ासला क्यों पाट दिया

2022 के अंत में ICRA की क़ीमत क़रीब ₹4,400 करोड़ आंकी गई थी, जबकि CARE सिर्फ़ ₹1,800 करोड़ के आसपास थी. तब से यह फ़ासला कम होता गया है. इसकी वजह ICRA का कमज़ोर पड़ना नहीं है. उसका रेटिंग बिज़नेस लगातार बढ़ता रहा और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उसने अपना बड़ा मार्केट शेयर गंवाया हो. यह फ़ासला इसलिए घटा क्योंकि CARE ने वापसी की, उसकी रेटिंग ग्रोथ लौटी, उसका मार्जिन बढ़ा, IL&FS दौर के साख के संकट से हुआ मार्केट-शेयर का नुक़सान थम गया, और उसका नया बिज़नेस ब्रेकईवन की तरफ़ बढ़ने लगा. मार्केट ने वापसी करती हुई CARE को दोबारा सही क़ीमत दी. उसने कमज़ोर पड़ती ICRA को सज़ा नहीं दी.

निष्कर्ष

रेटिंग एक ऐसा बिज़नेस है जो अपनी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा कैश देता है. CARE और ICRA इस कैश का इस्तेमाल अलग-अलग तरीक़े से कर रही हैं. CARE इसे बचा रही है, अपने 48 प्रतिशत मार्जिन वाले बिज़नेस को कंपाउंड होने दे रही है, जबकि उसका नया वेंचर छोटा और ख़ुद के दम पर चल रहा है. ICRA इसे ख़र्च कर रही है, एक दूसरे बिज़नेस में जगह बनाने के लिए, जो पहले ही रेवेन्यू का 44 प्रतिशत है लेकिन उसका मार्जिन रेटिंग बिज़नेस के आधे से भी कम है.

आगे आने वाले नतीजे दो बातों से यह बहस सुलझा देंगे. पहला, यह देखना होगा कि क्या Fintellix के जमने के साथ ICRA के रिसर्च और एनालिटिक्स का मार्जिन 24 प्रतिशत से बढ़कर रेटिंग बिज़नेस की इकोनॉमिक्स के क़रीब पहुंचता है. दूसरा, यह जांचना होगा कि क्या CARE का नॉन-रेटिंग रेवेन्यू उस ₹50 करोड़ के आंकड़े को पार कर पाता है, जिसमें वह सालों से अटका हुआ है. जब तक इनमें से कोई बदलाव नहीं होता, CARE बेहतर बिज़नेस चला रही है. ICRA बड़ा बिज़नेस खड़ा कर रही है.

क्या इनमें से किसी कंपनी में निवेश करना चाहिए?

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