वैल्यू रिसर्च से पूछें

मेरा पोर्टफ़ोलियो ₹50 लाख से ज़्यादा हो गया है, क्या अब PMS के ज़रिये निवेश करना चाहिए?

कॉर्पस बड़ा होने पर निवेश का रास्ता बदलना ज़रूरी नहीं, पहले जानिए PMS आपके लिए सच में क्या बदलता है

कॉर्पस बड़ा होने पर निवेश का रास्ता बदलना ज़रूरी नहीं, पहले जानिए PMS आपके लिए सच में क्या बदलता हैAprajita Anushree/AI-Generated Image

मेरा पोर्टफोलियो अब ₹50 लाख से ज़्यादा का हो गया है. क्या मुझे अब पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विस यानी PMS के जरिये निवेश करना चाहिए?- एक पाठक

वैल्यू रिसर्च के सीईओ धीरेंद्र कुमार कहते हैं कि पैसा एक हद तक बढ़ते ही एक ख्याल जरूर आता है - अब कुछ "एक्सक्लूसिव" होना चाहिए. यही सोच निवेशकों को PMS की ओर खींचती है. लेकिन सिर्फ़ इतनी रकम जुट जाना PMS में जाने की वजह नहीं होनी चाहिए. इस फै़सले से पहले ख़ुद से ये 5 सवाल जरूर पूछें.

1. टैक्स का असली गणित समझा है?

म्यूचुअल फ़ंड में फ़ंड मैनेजर स्टॉक ख़रीदता-बेचता रहता है, लेकिन उसका असर सीधे आपके डेली NAV में दिखता है - आपको हर ट्रांजैक्शन पर टैक्स नहीं चुकाना पड़ता. PMS में हर बार प्रॉफ़िट बुक होने पर वह टैक्स आप पर आता है, चाहे शॉर्ट टर्म हो या लॉन्ग टर्म. धीरेंद्र कुमार बताते हैं कि अगर म्यूचुअल फ़ंड के अंदर होने वाले सभी लेन-देन का हिसाब निवेशक के स्तर पर लगाया जाए, तो रिटर्न में करीब 10 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है. PMS में टैक्स का यह नुक़सान सीधे आपकी जेब से जाता है.

2. ट्रैक रिकॉर्ड कहां और कैसे वेरिफाई किया? 

हर पोर्टफ़ोलियो मैनेजर अपनी एक या दो रणनीतियां चलाता है, जिनका डेटा एसोसिएशन ऑफ पोर्टफ़ोलियो मैनेजर्स इन इंडिया (APMI) की वेबसाइट पर उपलब्ध है. निवेश से पहले वहां जाकर लंबी अवधि के रिटर्न जरूर देखें - अक्सर यह उतने प्रभावशाली नहीं निकलते जितना दावा किया जाता है.

3. रिटर्न का दावा और असली हिसाब एक जैसा है? 

म्यूचुअल फ़ंड में हर दिन की NAV सार्वजनिक होती है, आप उसी कीमत पर पैसा लगाते और निकालते हैं. PMS में बताया गया रिटर्न उतनी सख्ती से वेरिफाई नहीं होता. धीरेंद्र कुमार के मुताबिक PMS का रेगुलेशन ढीला है, जबकि म्यूचुअल फ़ंड कहीं ज़्यादा कड़ी निगरानी में काम करते हैं.

4. क्या यह सच में "एक्सक्लूसिव" सुविधा है? 

यह सोचना गलत है कि छोटे निवेशक म्यूचुअल फ़ंड में रहते हैं और पैसा बढ़ने पर PMS, फिर AIF और आखिर में अल्टरनेटिव्स की तरफ बढ़ना चाहिए. ऐसी कोई सीढ़ी नहीं होती - एक अच्छा, सीधा और कम लागत वाला म्यूचुअल फ़ंड लंबी अवधि में वही या उससे बेहतर नतीजा दे सकता है.

5. क्या फ़ंड कंपनी का सबसे अच्छा टैलेंट इसमें नहीं लगा है?

धीरेंद्र कुमार बताते हैं कि हर फ़ंड हाउस अपने सबसे अनुभवी लोगों को म्यूचुअल फ़ंड पर लगाता है, क्योंकि वहीं स्केल और कमाई दोनों हैं. फ़ंड अच्छा प्रदर्शन करता है तो ज़्यादा पैसा आता है और कंपनी को फ़ायदा होता है - यानी आपके और फ़ंड मैनेजर के हित एक जैसे हैं.

निष्कर्ष

सिर्फ ₹50 लाख की न्यूनतम सीमा पार कर लेना PMS में जाने की वजह नहीं होनी चाहिए. टैक्स दक्षता, पारदर्शिता और रेगुलेशन के लिहाज से म्यूचुअल फ़ंड कहीं मजबूत विकल्प है. जब तक कोई असाधारण कारण न हो, बड़ा कॉर्पस होने पर भी रणनीति बदलने की जरूरत नहीं है.

यह भी पढ़ेंः Mutual funds vs PMS: क्या अच्छा है आपके पैसे के लिए?

ये लेख पहली बार अगस्त 25, 2026 को पब्लिश हुआ.

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

नई SIP के लिए फिर खुले 3 ग्लोबल फ़ंड

पढ़ने का समय 6 मिनटआकार रस्तोगी

ख़ामोश पार्टनर

पढ़ने का समय 5 मिनटधीरेंद्र कुमार

SWP के लिए कौन सा फ़ंड सही होगा? जो पैसा सुरक्षित रखे और बढ़ाता भी रहे

पढ़ने का समय 6 मिनटअभिजीत पांडे

दो रेटिंग एजेंसियां, लेकिन एक-दूसरे से अलग होता दांव

पढ़ने का समय 6 मिनटसत्यजीत सेन

जो आपको दिखाई नहीं देता, वही आपको मिलता है

पढ़ने का समय 5 मिनटधीरेंद्र कुमार down-arrow-icon

म्यूचुअल फंड पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

रोज़ नहीं, साल में एक बार देखें

अपने पोर्टफ़ोलियो को रोज़ लाल-हरे रंग में देखने के बजाय, साल में सिर्फ़ एक बार ध्यान से देखना काफ़ी है

These are advertorial stories which keeps Value Research free for all. Click here to mark your interest for an ad-free experience in a paid plan

दूसरी कैटेगरी