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सारांशः 10 साल पहले VIP Industries के ब्रांड मज़बूत थे, दुकानों तक उसकी पहुंच गहरी थी और रेवेन्यू भी कहीं ज़्यादा था. आज Safari उससे बड़ी और ज़्यादा मुनाफ़े वाली कंपनी बन गई है. VIP अपना कामकाज आसान करने और अपनी पकड़ दोबारा बनाने में लगी है.
Safari और VIP भारत के सबसे बड़े लगेज ब्रांड में गिने जाते हैं. पर 10 साल पहले VIP इनमें बड़ी खिलाड़ी थी. FY16 में उसका रेवेन्यू क़रीब ₹1,192 करोड़ था, जबकि Safari का सिर्फ़ ₹271 करोड़ था. वजह? VIP के ब्रांड ज़्यादा मज़बूत थे, उसका मार्जिन ज़्यादा था और दुकानों तक उसकी पहुंच भी कहीं बड़ी.
पर 10 साल बाद तस्वीर पलट चुकी है. FY26 में Safari का रेवेन्यू ₹2,047 करोड़ रहा, जबकि VIP ने ₹1,858 करोड़ कमाए. इससे बड़ी बात यह कि Safari का EBITDA मार्जिन क़रीब 13% रहा, जबकि VIP ने अपना पुराना माल आक्रामक तरीक़े से निपटाने के बाद घाटा दिखाया.
दोनों के सामने हालात एक जैसे थे. लोग ज़्यादा घूमने लगे. बिना ब्रांड वाले सामान की जगह लोगों ने ब्रांडेड सामान लेना शुरू किया. और नरम सूटकेस की जगह सख़्त सूटकेस का चलन तेज़ी से बढ़ा. वो सख़्त लगेज वाला चलन दोनों में से कोई कंपनी नहीं चूकी. उन्हें एक-दूसरे से अलग करने वाली बात यह थी कि हर कंपनी का मैनेजमेंट कितनी तेज़ी से काम करता था, वे अपनी जटिलताओं को कितनी अच्छी तरह संभालते थे और इन्वेंट्री व कैपिटल के मामले में वे कितने अनुशासित रहते थे.
आंकड़े क्या कहते हैं
रेवेन्यू दोनों का लगभग बराबर है, पर कमाई की क्वालिटी में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है.
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पैमाना
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Safari Industries | VIP Industries |
|---|---|---|
| FY26 रेवेन्यू (₹ करोड़) | 2,043 | 1,858 |
| 5 साल की रेवेन्यू CAGR (FY21-26, %) | 44 | 25 |
| FY26 मुनाफ़ा/घाटा (₹ करोड़) | 125 | −338 |
| FY26 EBIT मार्जिन (%) | 9 | −13 |
| 5 साल का औसत ROCE (FY22-26, %) | 22 | 4 |
| FY26 इन्वेंटरी डेज़ | 86 | 150 |
| FY26 कुल उधार (₹ करोड़) | 115 | 738 |
EBIT मार्जिन में डेप्रिसिएशन का ख़र्च भी घटा दिया जाता है. डेप्रिसिएशन का मतलब है, फ़ैक्ट्री और मशीनें हर साल पुरानी होती जाती हैं और उनकी क़ीमत घटती जाती है, और उस घटी क़ीमत को हर साल खातों में ख़र्च के तौर पर दिखाया जाता है. इसीलिए EBIT मार्जिन, EBITDA मार्जिन से कम बैठता है.
Safari आगे कैसे निकली
साल 2011 में सुधीर जटिया ने Safari ख़रीदी. वो तब एक छोटी और पैसे से कमज़ोर कंपनी थी, जिसका रेवेन्यू सिर्फ़ ₹67 करोड़ था. जटिया का पहला लक्ष्य मुनाफ़ा कमाना नहीं, बाज़ार में अपनी जगह बनाना था. मैनेजमेंट ने डीलरों से रिश्ते दोबारा जोड़े और माल बेचने पर ज़ोर लगाया. इससे FY16 तक रेवेन्यू ₹271 करोड़ पहुंच गई.
और यहीं Safari में वो ख़ूबी दिखी, जो आगे उसकी पहचान बन गई. कंपनी किसी एक चलन पर दांव लगाकर बैठ नहीं गई, वो बाज़ार के साथ-साथ बदलती रही. जटिया के आने के वक़्त उसकी बिक्री में सख़्त सूटकेस का दबदबा था. फिर बाज़ार नरम लगेज की तरफ़ मुड़ा और Safari भी उसी के साथ मुड़ गई. कुछ साल बाद मांग दोबारा हल्के, सख़्त पॉलीकार्बोनेट सूटकेस की तरफ़ लौटी.
Safari ने भी वापसी की. कंपनी ने अपनी बैलेंस शीट भी शुरुआत में ही सुधार ली. पुराना माल बट्टे खाते में डाला, पुरानी पड़ चुकी मशीनें हटाईं और नई इक्विटी जुटाई. उसके बाद प्रोडक्शन की क्षमता धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ाई, वो भी सिर्फ़ तब जब पहले वाली क्षमता भर जाती थी.
उसने अपना निशाना भी सोच-समझकर चुना. उसने ब्रांडेड बाज़ार के उस हिस्से को पकड़ा जहां दाम कम रहते हैं, यानी वो ग्राहक जो अपना पहला ब्रांडेड सूटकेस ख़रीद रहा है. प्रीमियम ग्राहकों के लिए Samsonite से लड़ने की कोशिश उसने नहीं की. नतीजा यह कि FY15 और FY20 के बीच Safari का रेवेन्यू हर साल क़रीब 27% बढ़ा, जबकि VIP की ग्रोथ 11% रही.
तो VIP की बढ़त कैसे खत्म हो गई?
VIP ने 2010 के दशक में ज़्यादातर वक़्त एक सच में मज़बूत कारोबार चलाया. राधिका पीरामल की अगुवाई में उसने अपने पुराने पड़ते ब्रांड दोबारा खड़े किए. इनमें युवा ग्राहकों के लिए Skybags, कम दाम वाले हिस्से के लिए Aristocrat और Alfa, हैंडबैग के लिए Caprese, और प्रीमियम के लिए Carlton शामिल हैं. FY15 और FY20 के बीच उसका रेवेन्यू ₹1,017 करोड़ से बढ़कर ₹1,714 करोड़ हो गई, और EBITDA मार्जिन 8% से सुधरकर 17% पहुंच गया, जो उस साल Safari के 11% से आगे था.
दिक़्क़त कोविड के बाद शुरू हुई. ग्राहक तेज़ी से सख़्त लगेज की तरफ़ भागे, ई-कॉमर्स तेज़ी से बढ़ा, और डिज़ाइन पर ज़ोर देने वाली नई कंपनियां बाज़ार में आ गईं. वैसे VIP ने शुरुआत में अच्छी वापसी की भी. उसका रेवेन्यू FY22 के ₹1,290 करोड़ से उछलकर FY23 में ₹2,082 करोड़ हो गई.
पर FY24 एक चेतावनी लेकर आया. रेवेन्यू तो बढ़ती रही, पर EBITDA मार्जिन 15% से गिरकर 9% रह गया. और VIP के इन्वेंटरी डेज़ क़रीब 325 तक जा पहुंचे, जबकि Safari के 124 थे. इन्वेंटरी डेज़ का मतलब है, कोई माल ग्राहक तक पहुंचने से पहले कितने दिन बिना बिका पड़ा रहता है.
कंपनी ने ख़ुद माना कि उसके कई ब्रांड आपस में एक ही ग्राहक के पीछे भाग रहे थे. और कोई साफ़ नियम नहीं था कि कौन सा ब्रांड क्या बेचेगा, किसे बेचेगा, और किस रास्ते से बेचेगा. उसके गोदामों का इंतज़ाम भी टुकड़ों में बंट गया था. और बांग्लादेश वाली उसकी फ़ैक्ट्री अपनी क्षमता से कम चल रही थी.
बाक़ी कहानी मार्जिन बता देते हैं. FY23 तक भी VIP 15% से 16% तक मार्जिन के साथ, Safari से आगे थी. फिर FY24 में Safari 18% पर पहुंच गई और VIP गिरकर 9% पर आ गई. FY25 में यह फ़ासला और चौड़ा हुआ, जब Safari 13% पर थी और VIP क़रीब 4% पर. FY26 में VIP का रेवेन्यू क़रीब 15% गिर गया, साथ में अच्छा-ख़ासा ऑपरेटिंग घाटा भी हुआ, जो ऊपर की टेबल में −13% के EBIT मार्जिन के रूप में दिखता है. हालांकि नए मैनेजमेंट ने वो तकलीफ़ जानबूझकर पहले ही झेल ली, अपना माल बट्टे खाते में डालकर और डीलरों को सहारा देकर.
और अब दोनों की दिक़्क़तें आपस में बदल गई हैं
Safari अब वही जटिलता अपना रही है, जिससे वो कभी बचती थी. वो एक ब्रांड सीढ़ी बना रही है, आम बाज़ार के लिए मुख्य Safari ब्रांड, एक क़दम ऊपर प्रीमियम सेगमेंट के लिए Safari Select, युवा और डिज़ाइन पसंद करने वाले ख़रीदारों के लिए Urban Jungle, और सबसे ऊपर सुपर-प्रीमियम सेगमेंट के लिए Carlton जो जल्द आने वाला है. पर हर ब्रांड को अपनी दुकानें, अपनी मार्केटिंग और अपनी डिज़ाइन चाहिए. और Safari का ख़ुद का EBITDA मार्जिन इसका दबाव दिखाने भी लगा है. वो FY24 के 18% से गिरकर FY25 और FY26 में क़रीब 13% रह गया, क्योंकि विज्ञापन का ख़र्च और ऑनलाइन दामों की लड़ाई, दोनों बढ़े हैं.
और VIP इसका ठीक उल्टा कर रही है. वो अपनी वही जटिलता कम कर रही है, जो उसने ख़ुद जोड़ी थी. डीलरों के पास पड़ा माल 90 दिन से ज़्यादा से घटकर अब 60 दिन से नीचे आ गया है. कंपनी अपने SKU की गिनती 25 से 30% घटाने की योजना बना रही है, यानी वो अलग-अलग प्रोडक्ट कोड कम करेगी जो वो अपने पास रखती है. साथ ही वो 65 से ज़्यादा नए प्रोडक्ट भी उतार रही है. इसके अलावा वो अपने वेयरहाउस और लॉजिस्टिक्स वेंडर कम कर रही है, और बांग्लादेश वाली फ़ैक्ट्री का इस्तेमाल बढ़ा रही है.
फिर भी इसमें से कोई बात यह गारंटी नहीं देती कि VIP अपने ग्राहक वापस जीत लेगी. माल घटाना मैनेजमेंट के हाथ में है, बाज़ार में हिस्सा उसके हाथ में नहीं.
असली परीक्षा सेकंडरी सेल्स की है, यानी कोई डीलर असल में किसी ग्राहक को कितना बेच पाता है. वो आंकड़ा नहीं, जो सुर्ख़ियों में आता है, यानी कंपनी ने डीलर तक कितना माल भेज दिया. अगर सेकंडरी सेल्स भारी छूट दिए बिना बढ़ने लगे, तो यह सुधार असली माना जाएगा.
और वो मुश्किल सवाल
आज Safari ज़्यादा मज़बूत कारोबार है. और वो 10 साल तक बाज़ार के साथ बदलते रहने से बना है, किसी एक कोविड-बाद के उबाल से नहीं. उसके सामने खुला सवाल यह है कि जो ब्रांड आम बाज़ार के अनुशासन पर खड़ा हुआ, वो प्रीमियम कैटेगरी तक अपने पैर फैला पाएगा या नहीं. और वो भी उन मार्जिन को गंवाए बिना, जो उसे यहां तक लाए हैं.
और VIP का सवाल इससे भी बुनियादी है. जिस कंपनी ने अपनी जटिलता को अपने कामकाज से आगे निकल जाने दिया, क्या वो अपने आप को इतनी तेज़ी से आसान बना सकती है कि दोबारा मायने रखने लगे?
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