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सारांशः इन तीन कंपनियों के रेवेन्यू और मुनाफ़े में ज़ोरदार बढ़त देखने को मिली है, पूंजी पर अच्छा रिटर्न कमाया है और इन पर क़र्ज़ भी कम है, फिर भी इनके शेयर BSE 500 से पीछे रहे हैं. यह स्टोरी बताती है कि कुछ फ़ैक्टर्स कैसे शेयर की क़ीमत को कारोबार के प्रदर्शन से बिल्कुल अलग रास्ते पर ले जाती हैं.
आपने अक्सर ऐसी कंपनियां देखी होंगी जो काग़ज़ पर बहुत बढ़िया लगती हैं: मज़बूत कमाई, लगातार बढ़त, ज़्यादा मुनाफ़ा. पर उनके शेयर की क़ीमत कुछ और ही कहानी कहती है.
ऐसी स्थिति जितनी आप सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा आम है. शेयर की क़ीमत व अच्छे कारोबार के साथ-साथ न चलने की कई वजह हो सकती हैं, जैसे- बाज़ार का ज़्यादा क़ीमत चुकाने को तैयार न होना, कारोबार की बढ़त का धीमा पड़ना या उसकी कमाई की क्षमता कमज़ोर होना.
तो हम ऐसी ही कंपनियां खोजकर लाए हैं, जिनका कारोबार तो बढ़ता रहा लेकिन उनका शेयर निवेशकों की पसंद से बाहर होता गया.
तरीक़ा क्या रहा
हमने शुरुआत उन ग़ैर-फ़ाइनेंशियल कंपनियों को छांटकर की जिनका मार्केट कैप ₹1,000 करोड़ से ज़्यादा है.
हमने BFSI कंपनियों को बाहर रखा, क्योंकि उनका लगाई गई पूंजी पर रिटर्न (ROCE) और डेट-टू-इक्विटी रेशियो, आम कारोबारों से मेल नहीं खाता.
किसी कंपनी को इस सूची में आने के लिए, नीचे दी शर्तें पूरी करनी थीं:
- पांच साल में रेवेन्यू और टैक्स के बाद के मुनाफ़े (PAT) की CAGR ग्रोथ कम से कम 15%
- इस पूरे दौर में हर साल मुनाफ़ा, कभी घाटा नहीं
- ताज़ा सालाना रेवेन्यू और PAT, दोनों पांच साल के सबसे ऊंचे स्तर पर
- पांच साल का औसत ROCE 15% से ऊपर
- पांच साल में कुल ऑपरेटिंग कैश फ़्लो, कुल PAT का कम से कम 75%
- मौजूदा डेट-टू-इक्विटी 0.5 गुना से कम
- शेयर ने पांच साल में हर साल BSE 500 से कम से कम पांच प्रतिशत अंक कम रिटर्न दिया हो
इतने सारे फ़िल्टर क्यों? रेवेन्यू और मुनाफ़े की बढ़त बताती है कि कारोबार सच में फैला या नहीं; पूरे दौर में मुनाफ़ा बने रहने की शर्त, उन घाटे-से-मुनाफ़े में आने वाली कहानियों को हटा देती है जिनकी CAGR ग्रोथ गुमराह करती है. ROCE यह चेक करता है कि बढ़त के लिए लगाई गई पूंजी पर ठीक-ठाक रिटर्न मिला या नहीं, कैश में बदलने वाली शर्त देखती है कि मुनाफ़ा असल में कैश बना या नहीं, और डेट वाला फ़िल्टर उन कंपनियों को हटा देती है जिनकी बढ़त हद से ज़्यादा जोख़िम पर खड़ी है.
ऊपर के फ़िल्टर लगाने के बाद, हमारे पास तीन कंपनियां बचीं, जिनका सार नीचे की टेबल में है.
वो तीन कंपनियां जो इस कसौटी पर खरी उतरीं
लगातार ग्रोथ के बावजूद, इनके शेयर की क़ीमत पर दबाव बना हुआ है.
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कंपनी
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5 साल की रेवेन्यू ग्रोथ (% सालाना) | 5 साल की PAT ग्रोथ (% सालाना) | 5 साल का औसत ROCE (%) | डेट-टू-इक्विटी (गुना) | 5 साल का रिटर्न, BSE 500 के मुक़ाबले (प्रतिशत अंक सालाना) |
|---|---|---|---|---|---|
| IRCTC | 46.4 | 49.4 | 51.8 | 0.02 | -11.6 |
| R Systems | 17.3 | 17.9 | 26.6 | 0.34 | -6.6 |
| Avenue Supermarts | 23.3 | 22 | 18 | 0.1 | -8.2 |
IRCTC: ग्रोथ असली है, पर कमज़ोर बेस के कारण यह ज़्यादा दिखती है
IRCTC सबसे मज़बूत बढ़त वाली कंपनी दिखती है, जिसकी पांच साल की रेवेन्यू और PAT बढ़त क्रमशः 46% और 49% है. पर ये वही आंकड़े हैं जो बताते हैं कि किसी भी स्क्रीन को परखना क्यों ज़रूरी है.
FY21 कोविड वाला साल था, जब रेल यात्रा ठप होने से रेवेन्यू घटकर क़रीब ₹777 करोड़ और PAT ₹187 करोड़ रह गया था. उस कमज़ोर बेस से शुरू करने पर आगे की ग्रोथ बहुत बड़ी दिखती है; इसके बजाय FY26 की तुलना कोविड से पहले वाले FY20 से करें, तो सालाना ग्रोथ घटकर क़रीब 15% और 18% रह जाती है.
इंटरनेट टिकटिंग अब भी IRCTC की कमाई का इंजन है, पर ऑनलाइन की तरफ़ जाने का काम काफ़ी हद तक हो चुका है, इसलिए ग्रोथ की गुंजाइश अब कम बची है, जो लोगों के खिड़की से डिजिटल बुकिंग पर आने से मिलती थी. खानपान कारोबार तेज़ी से बढ़ सकता है, पर उसका मार्जिन कहीं कम है. इसका एकाधिकार ख़त्म नहीं हुआ है, पर बाज़ार अब IRCTC को एक जमे-जमाए कारोबार की तरह देखने लगा है, न कि उस तेज़ रफ़्तार वाली डिजिटल-टिकटिंग कहानी की तरह, जिसका दाम कभी उसने लगाया था.
IRCTC की डिरेटिंग के बारे में और पढ़ने के लिए, यहां क्लिक कीजिए.
R Systems: अधिग्रहण बढ़ते गए, पर अपने दम पर ग्रोथ कम रही
R Systems एक अलग मामला है. इसका रेवेन्यू और PAT क़रीब 17% और 18% की दर से बढ़े हैं, और पांच साल का औसत ROCE क़रीब 27% रहा है. फिर भी इसका शेयर BSE 500 से पीछे रहा.
इसकी सबसे ख़ास बात है, दूसरी कंपनियां ख़रीदना: 2023 में उसने Velotio को ख़रीदा, जिससे क्लाउड, DevOps, डेटा इंजीनियरिंग और जेनरेटिव AI की ताक़त जुड़ी, और नवंबर 2025 में Novigo Solutions पर दांव लगाया.
यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि IT सेवाओं का पूरा माहौल कमज़ोर है, इसलिए दिखाई गई ग्रोथ का बड़ा हिस्सा असल मांग के बजाय इन ख़रीदी गई कंपनियों से आ सकता है. इससे अपने आप उसकी क्वालिटी कम नहीं हो जाती: कंपनियां ख़रीदकर नई ताक़त और पैमाना जोड़ना समझदारी हो सकती है, बशर्ते मैनेजमेंट ज़रूरत से ज़्यादा दाम न चुकाए.
क़र्ज़ अभी तक चिंता की बात नहीं लगता; डेट-टू-इक्विटी क़रीब 0.3-0.4 गुना पर बना हुआ है. पर दो बातों पर नज़र रखनी चाहिए: कंपनियां ख़रीदने से, अपने दम पर हो रही कमज़ोर ग्रोथ छिप सकती है, और दिखाया गया मुनाफ़ा एक-बार वाली चीज़ों से भी बढ़ सकता है. ऐसे ही एक मामले में, इसके 2025 के मुनाफ़े में संपत्ति बेचने से हुए फ़ायदे का हाथ था.
असली सवाल यह है कि क्या इन अधिग्रहणों से आगे चलकर अच्छा रिटर्न मिल पाएगा. अगर ROCE और कैश कमाने की क्षमता अच्छी बनी रहती है और ख़रीदी गई कंपनियां कारोबार में ज़्यादा मूल्य जोड़ती हैं, तो हो सकता है बाज़ार इस पर ज़रूरत से ज़्यादा शक कर रहा हो. लेकिन अगर अधिग्रहण सिर्फ़ धीमी ग्रोथ को छिपाने का काम कर रहे हैं और साथ ही गुडविल व क़र्ज़ बढ़ते जा रहे हैं, तो शेयर की क़ीमत में गिरावट समझ में आती है.
Avenue Supermarts: कारोबार में ग्रोथ, लेकिन वैल्यूएशन नहीं बढ़ी
DMart स्टोर चलाने वाली Avenue Supermarts शायद इस स्क्रीन का सबसे सटीक उदाहरण है, जिसे खोजने के लिए ही यह बनाई गई थी.
पांच साल में इसका रेवेन्यू 23% और PAT 22% की दर से बढ़े, जबकि कंपनी पर क़र्ज़ कम रहा और उसने अपना मुनाफ़ा कैश में भी बदला. फिर भी इसका शेयर हर साल BSE 500 से आठ प्रतिशत अंक से ज़्यादा पीछे रहा.
इसकी वजह उम्मीदों से शुरू होती है. पांच साल के आंकड़े मज़बूत हैं, पर हाल की ग्रोथ धीमी पड़ी है: पिछले तीन साल में PAT ग्रोथ, पांच साल की दर से कहीं कमज़ोर रही है, जबकि ROCE भी FY23 के क़रीब 20% से घटकर FY26 में क़रीब 17% रह गया है.
DMart नए स्टोर खोलने में ज़ोर-शोर से पैसा लगाती रही है और FY26 तक 500 स्टोर तक पहुंच गई. पर जैसे-जैसे आधार बड़ा होता है, निवेशकों को सिर्फ़ यह नहीं देखना होता कि कितने स्टोर जुड़े, बल्कि यह भी कि वो कितना कमा रहे हैं और लगाई गई अतिरिक्त पूंजी पर कितना रिटर्न दे रहे हैं.
मुक़ाबला भी तेज़ हुआ है: क्विक कॉमर्स ने बड़े शहरों में सहूलियत को कहीं आसान बना दिया है, और शहरों के पुराने स्टोर पर पड़ते दबाव ने मुक़ाबले वाले सवाल को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल कर दिया है.
DMart की पुरानी ऊंची क़ीमत सिर्फ़ नए स्टोर खोलने की वजह से नहीं थी; निवेशकों ने उसके बेहद मज़बूत स्टोर हिसाब और दोबारा पैसा लगाने की लंबी गुंजाइश का दाम चुकाया था. सालों के कमज़ोर प्रदर्शन के बाद भी, इस शेयर की क़ीमत अब भी ऊंची है, इसलिए क़ीमत का काफ़ी गिर जाना अपने आप उसे सस्ता नहीं बना देता.
अहम सवाल यह है कि क्या पुराने स्टोर की बढ़त और नई पूंजी पर मिलने वाला रिटर्न इतना जम पाएगा कि बची हुई ऊंची क़ीमत का हक़ अदा हो सके. अगर हां, तो हो सकता है बाज़ार ज़रूरत से ज़्यादा निराश हो गया हो.
यह स्क्रीन हमें क्या बताती है
हमने अपनी खोज में ऐसी कंपनियां ढूंढीं जिनका कारोबार तो अच्छा चल रहा था, लेकिन उनके शेयर का भाव उस हिसाब से नहीं बढ़ा - बल्कि उल्टी दिशा में गया, यानी कारोबार अच्छा हुआ पर शेयर गिरा या कमज़ोर रहा.
पर इस स्क्रीन की अपनी सीमाएं भी हैं. पांच साल का CAGR इस बात पर बहुत निर्भर करता है कि आपने कौन से दो सिरे चुने, औसत ROCE हाल की गिरावट छिपा सकता है, और शेयर के रिटर्न की तुलना में डिविडेंड पूरी तरह नहीं गिना जाता. कोई भी आंकड़ों वाली स्क्रीन यह नहीं बता सकती कि कोई अधिग्रहण समझदारी भरा था या नहीं, मुक़ाबला बुनियादी तौर पर बदल गया है या नहीं, और आज की क़ीमत में जोख़िम पहले से शामिल हैं या नहीं.
इसीलिए हर स्क्रीन को रिसर्च की शुरुआत समझना चाहिए, उसका अंत नहीं. इसका काम यह बताना नहीं है कि क्या ख़रीदें. इसका काम है हज़ारों कंपनियों को घटाकर मुट्ठी भर तक ले आना, जो एक दिलचस्प सवाल खड़ा करती हैं.
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