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सारांश: यूनिवर्सिटीज़ चाहती हैं कि हज़ारों छात्रों को रहने की जगह मिले, लेकिन हॉस्टल चलाने का काम वो ख़ुद नहीं करना चाहतीं. एलिवेट कैंपसेज़ ने इसी ज़रूरत को अपना कारोबार बनाया. उसके समझौतों में इस बात की गारंटी भी है कि हॉस्टल के कम-से-कम तय बेड भरे रहेंगे. कारोबार का तरीक़ा ठीक लगता है. लेकिन इसके लिए निवेशक से कितनी क़ीमत मांगी जा रही है, ये हिसाब उतना आसान नहीं है.
एलिवेट कैंपसेज़ का IPO 23 सितंबर 2026 को खुलेगा और 25 सितंबर को बंद होगा. कंपनी पूरे ₹2,100 करोड़ नए शेयर जारी करके जुटा रही है. इसमें ऑफ़र फ़ॉर सेल के लिए कोई जगह नहीं है यानी पुराने शेयर नहीं बेचे जा रहे हैं. सिंगापुर की दो कंपनियां कंपनी की प्रमोटर हैं, जो ग्लोबल एसेट मैनेजर हिलहाउस इन्वेस्टमेंट के तहत आती हैं. दोनों में से कोई अपने शेयर नहीं बेच रही है. फिर भी इस IPO में एक पेच है.
कंपनी क्या करती है?
एलिवेट कैंपसेज़ के दो कारोबार हैं:
पहला, यूनिवर्सिटी कैंपस में हॉस्टल चलाना. यूनिवर्सिटीज़ छात्रों को रहने की जगह देना चाहती हैं, लेकिन हॉस्टल संभालने की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहतीं. एलिवेट उनके लिए हॉस्टल की इमारत बनाती या ख़रीदती है. फिर खाने, सुरक्षा, कपड़े धोने और दूसरी सुविधाओं का इंतज़ाम करती है और छात्रों से किराया लेती है. यूनिवर्सिटी कंपनी के साथ लंबे समय के लिए समझौता करती है. इसमें आम तौर पर गारंटी होती है कि कम-से-कम तय संख्या में बेड भरे रहेंगे. मार्च 2026 तक सात कैंपस में ऐसे 20,368 बेड कंपनी के अपने थे. इसके अलावा, कंपनी 14 कैंपस में 55,487 बेड वाले हॉस्टलों का कामकाज फ़ीस लेकर संभालती थी. इन हॉस्टलों की प्रॉपर्टी उसकी अपनी नहीं है.
दूसरा, स्कूल की ज़मीन और इमारत का मालिक बनकर उसे स्कूल चलाने वालों को किराये पर देना. ये K-12 स्कूल हैं, यानी किंडरगार्टन से 12वीं तक की पढ़ाई वाले स्कूल. स्कूल चलाने वाला किराये के साथ प्रॉपर्टी टैक्स, बीमा और रखरखाव का पूरा ख़र्च उठाता है. करार में आम तौर पर 10 से 30 साल का लॉक-इन होता है, यानी इतने समय तक करार में बने रहने की शर्त होती है. किराया हर साल बढ़ता है. मार्च 2026 तक दुबई में कंपनी के पास ऐसी दो स्कूल प्रॉपर्टी थीं: हार्टलैंड इंटरनेशनल स्कूल और नॉर्थ लंदन कॉलेजिएट स्कूल. इन्हें सितंबर 2025 में प्रमोटर से जुड़ी कंपनियों से ख़रीदा गया था.
IPO के बाद कंपनी भारत में 16 और K-12 स्कूल प्रॉपर्टी ख़रीदने की तैयारी में है. ये प्रॉपर्टी भी उसके अपने प्रमोटरों से जुड़ी कंपनियों की हैं. इनके लिए IPO से मिलने वाले ₹2,100 करोड़ में से ₹1,100 करोड़ दिए जाएंगे.
कंपनी की कमाई का हिसाब
| ब्योरा (₹ करोड़) | FY24 | FY25 | FY26 |
|---|---|---|---|
| कारोबार से रेवेन्यू | 347 | 369.8 | 568.6 |
| EBITDA (एक बार की ख़ास कमाई या ख़र्च हटाकर) | 230.2 | 267.1 | 440.1 |
| टैक्स के बाद मुनाफ़ा (PAT) | 39.7 | 49.7 | 173.8* |
| FY26 के मुनाफ़े में T.A. पई मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट का हॉस्टल बेचने से मिला ₹104.9 करोड़ का फ़ायदा भी शामिल है. ये रोज़मर्रा के कारोबार से होने वाली कमाई नहीं थी. इस फ़ायदे को एडजस्ट करने के बाद टैक्स के बाद मुनाफ़ा ₹68.8 करोड़ था. | |||
अहम रेशियो
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रेशियो
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FY24 | FY25 | FY26 |
|---|---|---|---|
| EBITDA मार्जिन (%) | 63.5 | 67.8 | 72.9 |
| कारोबार में लगी रक़म पर रिटर्न, ROCE (%) | 9.7 | 9.9 | 6.4 |
| इक्विटी के मुक़ाबले कर्ज़ (गुना) | 1.5 | 1.7 | 4.3 |
कारोबार कितना बड़ा है?
| ब्योरा | FY24 | FY25 | FY26 |
|---|---|---|---|
| कंपनी के अपने हॉस्टलों में बेड की संख्या | 17,995 | 17,995 | 20,368 |
| अपने हॉस्टलों में भरे हुए बेड (%) | 99.9 | 99.5 | 89.4 |
| दूसरे हॉस्टलों में कंपनी की देखरेख वाले बेड | 3,783 | 47,377 | 55,487 |
| K-12 स्कूल प्रॉपर्टी की संख्या | 0 | 0 | 2 (दुबई) |
| कॉलेज और यूनिवर्सिटी वाले तीन सबसे बड़े ग्राहकों से मिला रेवेन्यू (%) | 88.6 | 89 | 61.5 |
कंपनी के पक्ष में क्या है?
- लंबे समझौतों से नियमित कमाई में मदद मिलती है. यूनिवर्सिटीज़ के साथ कई साल के करार होते हैं. इनमें कम-से-कम तय संख्या में बेड भरे रहने की गारंटी होती है. कंपनी के अपने हॉस्टलों के इन करारों में गारंटी का वेटेड औसत 87.55% है. कारोबार का ख़र्च निकलने के बाद नक़दी लगातार बचती रही है. FY26 में ऑपरेटिंग कैश फ़्लो ₹297 करोड़ था. कंपनी फ़ीस पहले ले लेती है, इसलिए ग्राहकों से मिलने वाला बहुत कम पैसा अटका रहता है.
- भारत में छात्रों के रहने के अच्छे इंतज़ाम की बड़ी ज़रूरत है. देश के 58,600 से ज़्यादा कॉलेज, यूनिवर्सिटी और दूसरे उच्च शिक्षा संस्थानों में 4.33 करोड़ छात्र पढ़ते हैं. लेकिन कैंपस में अच्छी तरह चलाए जाने वाले हॉस्टल बहुत कम हैं. यूनिवर्सिटीज़ बढ़ेंगी और छात्र बेहतर रहने की जगह मांगेंगे, तो ये कमी और बढ़ेगी. कंपनी पहले से अच्छी रैंकिंग वाले संस्थानों के साथ काम कर रही है. इनमें OP जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, मणिपाल यूनिवर्सिटी जयपुर और IIT मद्रास शामिल हैं. IIT मद्रास में 1,878 बेड के प्रोजेक्ट के लिए कंपनी ने नवंबर 2025 में कंसेशन एग्रीमेंट किया था, जिसके तहत उसे प्रोजेक्ट बनाने और चलाने का अधिकार मिला.
- स्कूल की प्रॉपर्टी से लंबे समय तक किराया मिलता है. स्कूल चलाने वाले किराये के अलावा प्रॉपर्टी टैक्स, बीमा और रखरखाव का ख़र्च भी देते हैं. ऐसे समझौते को ट्रिपल-नेट लीज़ कहते हैं. कंपनी का काम प्रॉपर्टी का मालिक बने रहना और किराया लेना है. इन करारों में 10 से 29 साल का लॉक-इन है और किराया हर साल 3 से 5% बढ़ना तय है. इसलिए लंबे समय की कमाई का अंदाज़ा रहता है और प्रॉपर्टी संभालने का ज़्यादातर काम स्कूल चलाने वाले करते हैं.
कहां हैं परेशानियां?
- IPO का आधे से ज़्यादा पैसा प्रमोटर से जुड़ी कंपनियों को मिलेगा. 16 स्कूल प्रॉपर्टी ख़रीदने के लिए हिलहाउस से जुड़ी कंपनियों को ₹1,100 करोड़ दिए जाएंगे. यानी आम निवेशकों से जुटाए पैसे से प्रमोटर ग्रुप की ही प्रॉपर्टी ख़रीदी जा रही हैं. इनमें हैदराबाद की PE बोवेनपल्ली सबसे बड़ी ख़रीद है. इसकी एंटरप्राइज़ वैल्यू ₹593 करोड़ है, यानी कर्ज़ और नक़दी को ध्यान में रखकर निकाली गई कारोबार की क़ीमत. इस प्रॉपर्टी को लेकर इनकम टैक्स विभाग का बेनामी प्रॉपर्टी से जुड़ा नोटिस है. तेलंगाना हाई कोर्ट में भी एक मामला चल रहा है. दोनों मामले अभी सुलझे नहीं हैं.
- कर्ज़ बढ़ रहा है, लेकिन लगाए गए पैसे पर रिटर्न घट रहा है. कंपनी का कुल कर्ज़ FY24 में ₹985 करोड़ था, जो FY26 में ₹4,121 करोड़ हो गया. इसकी बड़ी वजह प्रमोटर ग्रुप से दुबई की स्कूल प्रॉपर्टी ख़रीदने के लिए लिया गया कर्ज़ है. कारोबार में लगी एडजस्टेड रक़म पर रिटर्न FY24 के 9.72% से घटकर FY26 में 6.42% रह गया. कंपनी की नक़दी घटाने के बाद जो कर्ज़ बचता है, उसे नेट डेट कहते हैं. एक बार मिले ख़ास फ़ायदे को हटाकर देखें, तो नेट डेट EBITDA का 6.23 गुना है. किसी भी कारोबार के लिए छह गुने से ज़्यादा का ये आंकड़ा ऊंचा है.
- कमाई कुछ ही ग्राहकों पर निर्भर है और एक अहम हॉस्टल में उम्मीद के मुताबिक़ बेड नहीं भरे हैं. FY25 में कंपनी का 89% रेवेन्यू सिर्फ़ तीन यूनिवर्सिटीज़ से आया था. FY26 में ये हिस्सा 61.5% रह गया. इससे लगता है कि अब कमाई के ज़्यादा स्रोत बन गए हैं. लेकिन इसकी बड़ी वजह दुबई की वे स्कूल प्रॉपर्टी हैं, जिन्हें प्रमोटर से ख़रीदा गया था. इनसे ₹167 करोड़ का किराया मिला. वहीं, बेंगलुरु का 1,162 बेड वाला वुडस्टॉक हॉस्टल लीज़ ख़त्म होने के बाद सितंबर 2025 से खाली था. मरम्मत और सुधार के बाद इसे जुलाई 2026 में दोबारा खोला गया.
- प्रमोटर कंपनियों के सारे शेयर गिरवी हैं. एलिवेट की दोनों प्रमोटर कंपनियों, जीनियस बिडको और जीनियस राजकोट, की मालिक जीनियस एसेटको है. एसेटको ने इन दोनों कंपनियों में अपनी पूरी हिस्सेदारी कर्ज़ देने वालों के पास गिरवी रखी है. अगर एसेट को अपने दूसरे कामकाज में पैसों की मुश्किल में फंसती है, तो कर्ज़ देने वाले इन कंपनियों का कंट्रोल ले सकते हैं. इससे एलिवेट में प्रमोटरों की पूरी हिस्सेदारी भी उनके कंट्रोल में आ सकती है. इसके अलावा, बिडको के पास मौजूद एलिवेट के 2.21 करोड़ शेयर भी अलग से गिरवी रखे गए थे. IPO से ठीक पहले ये गिरवी शेयर छुड़ा लिए गए. लेकिन संबंधित कर्ज़ बाक़ी रहा, तो लिस्टिंग के बाद शेयरों को फिर गिरवी रखा जा सकता है.
हमारी राय
₹362 के शेयर भाव पर कंपनी की मार्केट कैप ₹6,100 करोड़ बनती है. वहीं, एक बार के ख़ास फ़ायदे को हटाने के बाद मौजूदा कारोबार का टैक्स के बाद मुनाफ़ा ₹68.8 करोड़ था. यानी निवेशक से मुनाफ़े की क़रीब 89 गुना क़ीमत मांगी जा रही है. इस भाव पर पैसा लगाने का मतलब है कि आप कई बातों के सही होने की उम्मीद लेकर चल रहे हैं. सभी 16 स्कूल प्रॉपर्टी की ख़रीद बिना अड़चन पूरी हो, सबसे बड़ी प्रॉपर्टी का बेनामी मामला सुलझे, नई प्रॉपर्टी में स्कूल चलाने वाले समय पर किराया दें और सुधार के बाद खुले दोनों हॉस्टलों में लक्ष्य के मुताबिक़ बेड भर जाएं. एक रुपया लगाने से पहले इतनी सारी बातों का सही होना मान लेना आसान नहीं है.
कारोबार का तरीक़ा ख़राब नहीं है. हॉस्टलों के लंबे करार हैं और कम-से-कम तय संख्या में बेड भरने की गारंटी है. स्कूल की इमारतों से दशकों तक किराया मिल सकता है, जबकि उनका ख़र्च स्कूल चलाने वाले उठाते हैं. अगर शेयर सही क़ीमत पर मिले, तो इस कारोबार पर ग़ौर किया जा सकता है.
लेकिन IPO में पैसे का इस्तेमाल देखकर उत्साह कम हो जाता है. निवेशक मिलकर जो ₹2,100 करोड़ लगाएंगे, उसमें से ₹1,100 करोड़ सीधे प्रमोटर से जुड़ी कंपनियों को जाएंगे. ₹750 करोड़ उन कर्ज़ों को चुकाने में लगेंगे, जो पहले इसी ग्रुप से प्रॉपर्टी ख़रीदने के लिए लिए गए थे. यानी आपका पैसा कारोबार बढ़ाने के बजाय प्रमोटर को अपनी जुड़ी हुई कंपनियों की प्रॉपर्टी बेचकर पैसा निकालने का रास्ता दे रहा है.
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