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Ambuja vs UltraTech: साइज़ दोनों ने बढ़ाया, लेकिन असल मुनाफ़ा किसने कमाया?

दूसरी कंपनियां ख़रीदकर अपना साइज़ बढ़ाने के बाद, UltraTech हर टन पर अपनी कमाई फिर से पटरी पर लाने में कामयाब रही लेकिन Ambuja अब भी विस्तार के ख़र्च से जूझ रही है

दूसरी कंपनियां ख़रीदकर अपना साइज़ बढ़ाने के बाद, UltraTech हर टन पर अपनी कमाई फिर से पटरी पर लाने में कामयाब रही लेकिन Ambuja अब भी विस्तार के ख़र्च से जूझ रही हैAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः दो सीमेंट कंपनियों ने दूसरी कंपनियां ख़रीदकर अपना साइज़ बढ़ाया, और FY24 में दोनों हर टन की बिक्री पर लगभग बराबर कमा रही थीं. तब से एक कंपनी काफ़ी आगे निकल गई है. सीमेंट कोई भी बनाए, बिकता लगभग एक ही प्राइस पर है. तो यह फ़र्क़ आ कहां से रहा है और क्या पीछे रह गई कंपनी इसे कम कर पाएगी?

FY24 में UltraTech और Ambuja, दोनों का हर टन पर EBITDA लगभग बराबर था. पर जून 2026 की तिमाही तक UltraTech हर टन पर ₹283 ज़्यादा कमाने लगी. यह फ़र्क़ बिजली-ईंधन के ख़र्च, ढुलाई, प्लांट में क्षमता इस्तेमाल और मुनाफ़े के हिसाब में नीचे जाकर, डेप्रिसिएशन में छिपा है.

ख़रीदारी का बोझ

2023 से 2025 के बीच दोनों ने दूसरी कंपनियां ख़रीदकर विस्तार किया. Ambuja ने Sanghi Industries और Penna Cement ख़रीदी और Orient Cement में हिस्सेदारी ली. UltraTech ने India Cements और Kesoram का सीमेंट कारोबार ख़रीदा. हर ख़रीद से नई क्षमता, नए प्लांट और ज़्यादा इलाक़ों तक पहुंच मिली. पर साथ में ऐसे प्लांट भी आए, जिन्हें अपने कारोबार में मिलाना और कुशलता से चलाना ज़रूरी था.

FY24 में Ambuja ने हर टन पर ₹1,103 कमाए, जो UltraTech के ₹1,090 से थोड़ा ज़्यादा था. FY25 में दोनों की कमाई घटी, क्योंकि सीमेंट के प्राइस नरम पड़े और नए प्लांटों ने बोझ बढ़ाया. UltraTech का हर टन पर EBITDA गिरकर ₹925 रह गया.

दोनों का रिपोर्ट कार्ड

पैमाना कंपनी FY24 FY25 FY26 Q1 FY27
बिक्री (मिलियन टन) UltraTech 119 135.8 152.1 41.3
  Ambuja 58 63.5 73.7 17.1
बिक्री में ग्रोथ (%) UltraTech 12.6 14.1 12 12.2
  Ambuja 7.4* 9.5 16.1 -7.1
डेप्रिसिएशन (बिक्री का %) UltraTech 4.4 5.3 5.2 4.9
  Ambuja 4.9 7.1 8.8 8.8
हर टन पर EBITDA (₹) UltraTech 1,090 925 1,119 1,214
  Ambuja 1,103 940 887 931
साल के आख़िर में क्षमता (MTPA) UltraTech 146.2 188.8 196.8 205.5
  Ambuja 78.9 100.2 109 109
प्लांट कितनी क्षमता पर चले (%) UltraTech 85 81 79 81
  Ambuja 79 71 70 65
*Ambuja की FY24 की ग्रोथ, FY23 के 15 महीने वाले साल के आधार पर निकाली गई है, इसलिए इसकी तुलना आम 12 महीने के साल से सीधे नहीं की जा सकती. MTPA यानी मिलियन टन सालाना.

दो एक जैसी कंपनियों की राहें अलग क्यों हुईं? असल में, सीमेंट बनाने में सबसे बड़े ख़र्च हैं बिजली-ईंधन, ढुलाई और कच्चा माल. बिजली-ईंधन आमतौर पर कुल ख़र्च का 25% से 35% होता है, ढुलाई 20% से 30% और कच्चा माल 10% से 25%. सीमेंट एक कमोडिटी है, यानी सबका माल लगभग एक जैसा. अगर कोई कंपनी ज़्यादा प्राइस मांगे, तो डीलर दूसरे ब्रांड का माल रख लेता है. इसलिए दोनों लगभग एक ही प्राइस पर बेचती हैं. बढ़त प्राइस से नहीं, लागत से ही मिल सकती है.

बिजली और ढुलाई: अलग-अलग रास्ते

FY24 से FY26 के बीच UltraTech ने हर टन पर बिजली-ईंधन का ख़र्च ₹248 घटाया (₹1,536 से ₹1,288). Ambuja का यह ख़र्च सिर्फ़ ₹34 घटा (₹1,394 से ₹1,360). इसकी एक वजह वक़्त है. UltraTech पहले ही वेस्ट-हीट रिकवरी, यानी प्लांट की बेकार जाने वाली गर्मी से बिजली बनाने और रिन्यूएबल एनर्जी में पैसा लगा चुकी थी, जिससे बाहर से बिजली ख़रीदने पर उसकी निर्भरता घटी. Ambuja ने भी रिन्यूएबल क्षमता बढ़ाई है, पर उसके प्लांट तक बिजली पहुंचाने वाली ट्रांसमिशन लाइनें अभी पूरी नहीं हुईं. इसलिए वो उस बिजली का बड़ा हिस्सा दूसरों को बेचती है और अपने भट्ठों के लिए महंगी बिजली ख़रीदती है.

ढुलाई में फ़र्क़ और भी साफ़ है. UltraTech का यह ख़र्च हर टन पर ₹87 घटा (₹1,468 से ₹1,381), जबकि Ambuja का ₹129 बढ़ गया (₹1,175 से ₹1,304). UltraTech का नेटवर्क बड़ा है, इसलिए वो ग्राहकों को उन प्लांट्स से माल भेजती है, जो मांग वाले इलाक़ों के क़रीब हैं और नए प्लांट जुड़ने से रास्ते और छोटे हो जाते हैं. Ambuja का दायरा भी बढ़ा है, पर उम्मीद के मुताबिक़ बचत अभी नहीं दिखी. शायद इसलिए कि ख़रीदे गए कुछ प्लांट दूर के बाज़ारों में माल भेजते हैं, हालांकि कंपनी ने इसे वजह के तौर पर पक्का नहीं किया है.

क्षमता तभी काम की, जब प्लांट चलें

भट्ठे, यानी वो गर्मी-रोधी चैंबर जिनमें सीमेंट का क्लिंकर पकाया जाता है, पूरी क्षमता के क़रीब चलें तो ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल करते हैं. UltraTech के प्लांट ज़्यादा क्षमता पर चले और उसकी कुशलता ख़रीदे गए प्लांटों तक भी पहुंची. India Cements में बिजली की खपत 85.36 से घटकर 77.60 kWh प्रति टन रह गई. Ambuja अब भी ख़रीदे गए कुछ प्लांटों की कुशलता बढ़ाने में लगी है. Sanghi और Penna सिर्फ़ 57% और 46% क्षमता पर चल रहे थे. जब प्लांट अपनी क्षमता से काफ़ी नीचे चलते हैं, तो उनका तय ख़र्च कम टन पर बंटता है और कम कुशलता से हर टन पर ऊर्जा की खपत भी बढ़ सकती है.

FY26 में UltraTech के प्लांट 79% क्षमता पर चले, जबकि Ambuja के 70% पर. Q1 FY27 तक यह फ़र्क़ और बढ़कर 81% बनाम 65% हो गया. सीमेंट प्लांट का तय ख़र्च भारी होता है, इसलिए ज़्यादा प्रोडक्शन से यह ख़र्च ज़्यादा टन पर बंट जाता है, जबकि कम चलने वाले प्लांट को वही ख़र्च कम प्रोडक्शन से निकालना पड़ता है. UltraTech का बड़ा आधार उसे नए प्लांटों की शुरुआती कमियां झेलने की ज़्यादा गुंजाइश देता है, जबकि Ambuja के Penna और Sanghi प्लांट अभी अपनी कमियों से जूझ रहे हैं.

डेप्रिसिएशन से फ़र्क़ और बढ़ता है

EBITDA, डेप्रिसिएशन और कर्ज़ की लागत से पहले का कामकाजी प्रदर्शन दिखाता है. डेप्रिसिएशन घटाने के बाद दोनों कंपनियों का फ़र्क़ और बढ़ जाता है.

FY26 UltraTech Ambuja
डेप्रिसिएशन (₹ करोड़) 4,644 3,570
औसत क्षमता (MTPA) क़रीब 192.8 क़रीब 104.6
क्षमता के हर टन पर डेप्रिसिएशन (₹) 241 341
प्लांट कितनी क्षमता पर चले (%) क़रीब 79 क़रीब 70
बिके हुए हर टन पर डेप्रिसिएशन (₹) 305 484
डेप्रिसिएशन (बिक्री का %) 5.2 8.8
औसत क्षमता यानी साल की शुरुआत और आख़िर की क्षमता का औसत.

Ambuja का कुल डेप्रिसिएशन UltraTech से कम है, पर वो कम टन की बिक्री पर बंटता है. और उसकी क्षमता के हर टन पर डेप्रिसिएशन भी ज़्यादा है, यानी सिर्फ़ प्लांट कम चलना इसकी वजह नहीं है. ख़रीदी गई कंपनियों को अपने कारोबार में मिलाते हुए, Ambuja ने बड़ी मात्रा में नई ग्राइंडिंग और क्लिंकर क्षमता भी चालू की है. और डेप्रिसिएशन उसी दिन से शुरू हो जाता है जिस दिन कोई संपत्ति इस्तेमाल में आती है, बिक्री बढ़ने से पहले ही. ख़रीदी गई संपत्तियों के इस्तेमाल की अवधि का हिसाब भी अलग हो सकता है. इसका असर EBIT मार्जिन में दिखता है. UltraTech का EBIT मार्जिन FY25 के 11.2% से बढ़कर FY26 में 14% हो गया, जबकि Ambuja का क़रीब 7.3% पर ही टिका रहा.

निवेशक आगे क्या देखें

Ambuja के अगले दौर में बात नई क्षमता जोड़ने की कम और ख़रीदी गई क्षमता से कमाई निकालने की ज़्यादा है. अगर Penna, Sanghi और दूसरे प्लांट ज़्यादा क्षमता पर चलें, तो डेप्रिसिएशन और तय ख़र्च ज़्यादा टन पर बंटेंगे. ढुलाई में बेहतर कुशलता और रिन्यूएबल बिजली का पूरा इस्तेमाल, यह फ़र्क़ और घटा सकते हैं. वहीं UltraTech को अपनी ख़रीदी कंपनियों को मिलाते हुए और नई क्षमता से कमाई करते हुए, अपनी बचत बनाए रखनी होगी. उसका बड़ा आधार उसे ज़्यादा सहारा देता है, पर विस्तार को फिर भी अपनी लागत ख़ुद कमानी होगी.

दोनों ने साइज़ ख़रीदा है. अब तक UltraTech इसे कम लागत और हर टन पर बेहतर कमाई में बदलने में ज़्यादा कामयाब रही है. Ambuja को दिखाना है कि उसकी ख़रीदी गई क्षमता, नेटवर्क और रिन्यूएबल निवेश भी ऐसा कर सकते हैं. जब तक उसके प्लांट ज़्यादा क्षमता पर नहीं चलते और फ़ायदा डेप्रिसिएशन से आगे निकलकर मुनाफ़े तक नहीं पहुंचता, तब तक सिर्फ़ बड़ा दायरा यह फ़र्क़ कम नहीं करेगा.

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