
मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो इस वाक्य को पढ़ेंगे और इससे सहमत नहीं होंगे, और शायद पूरी तरह से असहमत भी हों। जब भी मैं ऐसी किसी फ़ाइनेंशियल टैक्नीक (जैसे - एस.आई.पी.) की बात करता हूं, जिसे निवेशक अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, तो कई बार सोशल मीडिया और ई-मेल पर मेरा सामना एक किस्म के विरोध से होता है। निवेशक खुद को एक ऐसे तर्कशील-जीव (जाना-माना आधुनिक जीव, होमो इकॉनॉमिकस) के तौर पर देखना पसंद करते हैं, जो हमेशा अपने फ़ैसले साक्ष्यों के गुण-दोष की जांच-परख के बाद, विवेक से करता है। मगर क्योंकि सच इसके बिल्कुल उलट है, इसलिए मैं अपनी बात पर क़ायम रहूंगा।
आजकल, हममें से कई इक्विटी (या इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड) निवेशक चिंतित हैं। अक्सर रात में नींद की जगह, लगातार ऊपर जाते स्टॉक के खयाल छाए रहते हैं। पिछली फ़रवरी में जब चाइनीज़ वायरस ने हमला बोला, उसके बाद से बहुत सारे निवेशक भावनाओं के रोलर-कोस्टर में ऊपर-नीचे गोते लगा रहे हैं। पहले घबराहट ने घेरा, फिर ज़रा राहत आई, फिर उत्साह उमड़ा, जो धीरे-धीरे अति-उत्साह में तब्दील होने लगा, और अब हम बाज़ार को लेकर, मन में घुमड़ती हुई बेचैनी से गुज़र रहे हैं। एक सवाल रह-रह कर करवट ले रहा है - क्या ये सब सच है? क्या इक्विटी मार्केट ऊंचा, और ऊंचा ही उठता जाएगा? तब तक, जब तक ये एक ज़बर्दस्त ऊंचाई न हासिल कर ले, जहां ये मार्केट लंबे समय तक रहेगा। या फिर वही होगा जिसकी चिंता है कि इस सारे उछाल का अंत निश्चित है।
इस सवाल को लेकर मेरा जवाब ये है कि शॉर्ट-टर्म में कोई भी जवाब, एक अटकल भर है। लंबी अवधि के इक्विटी निवेश में, और उछाल आएगा। मगर मैं ये क्यों कह रहा हूं ये समझाने के लिए, मैं बस इतना ही कहूंगा, कि साल 2004 के मध्य में मुझसे पूछे गए एक सवाल के जवाब में भी मैंने यही कहा था। तब मुझसे पूछा गया था कि सेनसेक्स 5,000 पर पहुंच गया है, अब ये और ऊपर तो नहीं जा सकता? मगर मेरा जवाब एक एवरग्रीन जवाब है, क्योंकि यही सच भी है कि लंबी अवधि के इक्विटी निवेश में मार्केट ऊपर जाएगा, जाएगा, जाएगा।
अब वापस लौटते हैं एसेट-एलोकेशन और एसेट-रीबैलेंसिंग के मसले की तरफ़। इस सब का एक ही हल है, और वो ये कि एसेट-एलोकेशन पहले से तय प्लान के मुताबिक किया जाना चाहिए, और इस बुनियादी तकनीक या तरतीब से भटकना नहीं चाहिए। चलिए लगे हाथ कुछ और बुनियादी मसलों पर भी बात कर लेते हैं। एसेट-रीबेलेंसिंग का मतलब होता है, इक्विटी-बनाम-फ़िक्स का सवाल, ये काले-बनाम-सफ़ेद के शाश्वत द्वंद जैसा है। आपको इसके बीच में रहना होगा, न ज़्यादा इधर, न ज़्यादा उधर। हर साल एक-आध बार, आपको अपने पोर्टफ़ोलियो को रीबेलेंस कर ही लेना चाहिए। इसका अर्थ है, जैसा संतुलन आप चाहते हैं वो अब बिगड़ गया है, और आपको अपना निवेश एक तरह के एसेट से, दूसरी तरह के एसेट में शिफ़्ट करने की ज़रूरत है, जिससे आपके मनचाहे एसेट बैलेंस का प्रतिशत फिर से कायम किया जा सके।
जब इक्विटी के बढ़ने की रफ़्तार, फ़िक्स-इन्कम से ज़्यादा हो - जिसकी अक्सर उम्मीद भी रहती है - तो आपको समय-समय पर कुछ इक्विटी निवेश बेच देना चाहिए। और निवेश बेचने से मिली पूंजी को फ़िक्स-इन्कम में लगाना चाहिए, ताकि फिर से मनचाहा एसेट-बैलेंस पाया जा सके। अगर इक्विटी पिछड़ने लगे, तो आपको अपने फ़िक्स-इन्कम निवेश से कुछ पैसा निकाल कर, इक्विटी में डाल देना चाहिए। ये तरीका बहुत अच्छी तरह काम करता है, क्योंकि निवेश का बुनियादी आइडिया ही है कि आप मुनाफ़ा कमाएं, और सस्ते में एसेट खरीदें। हर कुछ समय बाद ये होना ही है कि परिस्थितियां वापस बाज़ार को एक औसत पर ले आएंगी, यानि इक्विटी फिर से पिछड़ जाएगी। मगर ऐसा होने के बावजूद आप बेहतर स्थिति में होंगे क्योंकि आपने अपना कुछ मुनाफ़ा बैंलेस करते हुए, सेफ़-एसेट में पहले ही रख लिया था।
मगर एक और बात, इस सब को ज़रूरत से ज़्यादा बौद्धिक बनाने की कतई ज़रूरत नहीं है। 35 या 40 प्रतिशत में व्यावहारिक तौर पर कोई फ़र्क नहीं है। मेरा आइडिया ये है कि हमेशा तीन ही तरह के संभावित इक्विटी-बनाम-डेट एलोकेशन होते हैं। और ये हैं - 1) बहुत सारी इक्विटी; 2) बहुत सारी फ़िक्स इन्कम; 3) इक्विटी और फ़िक्स इन्कम के बीच संतुलन। हो सकता है ये बात आपको प्रैक्टिकल नहीं लगी हो? अब मैं इसे दूसरी तरह से कहता हूं, क्योंकि इस तरह के एलोकेशन में वो सब फ़ैक्टर मौजूद हैं जिनकी आपको प्रैक्टिकल तौर पर ज़रूरत है। मैं इसे 25%, 50% और 75% के तौर पर डिफ़ाइन करता हूं, हालांकि ये नंबर आप अपने मुताबिक घटा-बढ़ा सकते हैं। दरअसल, जब आपकी ज़िंदगी में कमाने की शुरुआत होती है, तो ज़िम्मेदारियों कम होती हैं। तब आप निवेश की शुरुआत ज़्यादा इक्विटी से कर सकते हैं। मगर जैसे-जैसे ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ती है, या कभी मुश्किलें पेश आती हैं, तो आप अपने निवेश को इक्विटी, और डेट के बीच बैलेंस करने की तरफ़ मुड़ सकते हैं। और फिर एक वक्त आता है, जब आप रिटायर होने करीब पहुंचते हैं। तब तो आप पूरी तरह से अपने निवेश को डेट फ़ंड की तरफ़ शिफ़्ट कर सकते हैं।
अगर आपने इस तरकीब को सही तरीके से अपना लिया, तो ये बात बहुत मायने नहीं रखती कि अगले कुछ हफ़्ते, या कुछ महीनों में मार्केट ऊपर जा रहा है या क्रैश करने जा रहे है। क्योंकि तब तक आप निवेश में संतुलन रख कर, सही वक्त पर गलत निर्णय के पछतावे को पछाड़ चुके होंगे।


