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एक दुखद कहानी का सुखद अंत

फ़्रैंकलिन टेंम्पलटन में आई मुसीबत की शुरुआत कैसे हुई और निवेशक इससे क्या सीख सकते हैं

फ़्रैंकलिन टेंम्पलटन में आई मुसीबत की शुरुआत कैसे हुई और निवेशक इससे क्या सीख सकते हैं

फ़्रैंकलिन की घटना अब अपनी स्वाभाविक परिणति पर पहुंच चुकी है। निवेशकों का तक़रीबन सारा पैसा रिकवर हो गया है और किसी ने कुछ नहीं गंवाया है। शुरुआत से ही लग रहा था कि इस पूरे मामले का अंत कुछ इसी तरह से होगा। और अगर मुठ्ठी भर निवेशक ग़लत मश्विरे पर नहीं चले होते तो इतनी देर भी नहीं लगती। मामला काफ़ी पहले सुलझ गया होता और इतने सारे निवेशक वो यंत्रणा नहीं भुगतते, जो उन्होंने भुगती। उससे भी बड़ी बात है कि फ़्रैंकलिन टेंप्लटन जैसी शानदार एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) की साख - जो सही कारणों से और लंबे समय में बनी थी - वो बेवजह तार-तार नहीं हुई होती।
जो लोग अब भी पूरी कहानी नहीं समझे, उनके लिए मैं कम-से-कम शब्दों में इसे कहने की कोशिश करता हूं।
फ़्रैंकलिन टेंप्लटन की कुछ फ़िक्स्ड-इन्कम स्कीमें थीं, जिन्हें ज़्यादा-फ़ायदे (high-yield) वाले फ़ंड्स के तौर पर डिज़ाइन किया गया और बेचा गया। इनका निवेश ऐसे कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में था, जिनके रिटर्न बेहतर थे और एक हद तक इनमें रिस्क भी ज़्यादा था। साल 2020 में जब चीनी वायरस ने दुनिया भर में कहर बरपाया, तब इनमें से कई बॉन्ड्स अपनी लिक्विडिटी खो बैठे। पैसा निकालने की निवेशकों की मांग पूरी करने के लिए इन्हें बेचना मुश्किल हो गया। ऐसे में अप्रैल 2020 के आख़िरी हफ़्ते तक फ्रैंकलिन टेंम्पलटन ने अपने छः डेट फ़ंड बंद कर दिए, और इस तरह से निवेशकों की ₹25,000 करोड़ से ज़्यादा रक़म फ़्रीज़ हो गयी। भारत में ओपन-एंड-फ़ंड्स के इतिहास में ये अभूतपूर्व घटना थी। AMC ने ये एक्शन इसलिए लिया क्योंकि बॉन्ड मार्केट फ़्रीज़ हो गए थे और वो अपने पास रखे बॉन्ड, उस संख्या में नहीं बेच पा रहे थे जिससे निवेशकों के अपना पैसा निकालने की मांग पूरी की जा सके।
फ़ंड हाऊस का प्लान था कि फ़ंड बंद करने के उनके क़दम से रिडीम करने की निवेशकों की मांग कम हो जाएगी, जो ओपन-एंड फ़ंड्स में आम बात है। सोच ये थी कि जैसे-जैसे बॉन्ड्स बिकते रहेंगे, या मैच्योरिटी होगी तो बॉन्ड जारी करने वाली कंपनी से रिडीम किया जाता रहेगा। साथ ही जब-जब ब्याज के पेमेंट आएंगे, उन्हें भी बांट दिया जाएगा। इसी मसले पर सेबी ने रूलिंग दी कि ये प्रक्रिया, ई-वोटिंग के ज़रिए निवेशकों की रज़ामंदी से पूरी की जाएगी। हालांकि, सब-कुछ तब रुक गया जब कुछ निवेशकों ने कोर्ट में केस फ़ाईल कर दिया। ये लोग जांच की मांग कर रहे थे क्योंकि उन्हें फ़ंड्स में किसी तरह की अनियमितता का शक था।
उसी समय ये साफ़ दिख रहा था कि ये ग़ुस्सा कुछ फ़ंड डिस्ट्रीब्यूटरों द्वारा बड़ी सक्रियता से प्रमोट किया जा रहा है। शायद उन्होंने अपने कस्टमर्स को इन फ़ंड्स के हाई रिटर्न के साथ शामिल रिस्क के बारे में बिना बताए इनमें निवेश करने के लिए प्रेरित किया था। अब यही लोग, निवेशकों को बताने में लगे थे कि इसमें कोई-न-कोई गड़बड़ है। सच्चाई - जो बाद की घटनाओं से साफ़ हुई - वो ये थी, कि इन फ़ंड्स ने ऊंचा रिस्क लिया और बेहतर रिटर्न दिए। बिचौलियों के लिए ऊंचे रिटर्न बेचना आसान था, उन्होंने बेचा। निवेशकों को ऊंचे रिटर्न पाना पसंद था, उन्होंने ख़रीदा। और जब वायरस के चलते बॉन्ड मार्केट फ़्रीज़ हो गए, तो हर किसी ने दोष मढ़ने के लिए, किसी दूसरे को खोजना शुरु कर दिया।
ये एक खेदजनक सच्चाई है कि ज़्यादातर फ़ंड बेचने वाले और उनके निवेशक यह नहीं समझते कि मार्केट-आधारित सेक्योरिटीज़ में निवेश करने का क्या मतलब होता है। कुछ छोटे डेट फ़ंड का बंद होना तो 2018 से होता रहा है। हालांकि, ऐसे हर केस में निवेशकों और दूसरे लोगों ने उस फ़ंड को ही इसका ज़िम्‍मेदार माना है। वैसे तलाशेंगे, तो आपको कोई-न-कोई बलि का बकरा मिल ही जाएगा। पर एक समझदार निवेशक के तौर पर, आपको निवेश के सिद्धांतों पर ध्यान देना चाहिए। जिस फ़ंड में निवेश कर रहे हैं, उसके लिए कितना रिस्क ले सकते हैं इस पर गौर करना ज़रूरी है। अगर आपको बिल्कुल सुरक्षित फ़ंड ही चाहिए तो लिक्विड फ़ंड में निवेश करें। अगर आपका सवाल है कि रिस्क का स्तर कैसे तय करें और सही जानकारी कैसे पाएं, तो उसके लिए हर तरह की जानकारी मौजूद है, वैल्यू रिसर्च पर भी।
कुल मिला कर देखा जाए, तो ज़्यादातर इंटरमीडियरीज़ का फ़ोकस बेचने पर ही रहेगा। पर जब अलग-अलग स्कीमों में और इंटरमीडियरीज़ की सेवाओं में फ़र्क़ बहुत ही कम हो - जैसा डेट फ़ंड के केस में है - तब अक्सर वादे कुछ बढ़ा कर और रिस्क की जानकारी कुछ घटा कर दी जाती है। मगर ये पैसा आपका है और इसीलिए ज़िम्मेदारी भी आपकी ही है।
फ़्रैंकलिन के केस में, कुछ लोग जो महंगे वकीलों का और क़ानूनी प्रक्रिया का ख़र्च उठा सकते थे, उनकी बेवकूफ़ी से बहुत से लोगों के हितों को चोट पहुंची। अफ़सोस, ‘म्यूचुअल’ शब्द का ये दूसरा पहलू है। जिसमें आपकी क़िस्मत आपके साथी निवेशकों के साथ जुड़ जाती है।
ये एडीटोरियल म्यूचुअल फ़ंड इनसाईट में जून 2022 पहली बार में छपा था।

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