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स्टॉक मार्केट का बेहतरीन समय

बहुत अच्छे, या कहें बेहतरीन स्टॉक्स भारी डिस्काउंट पर मिल रहे हैं। अनुभवी निवेशक जानते हैं कि उन्हें क्या करना है

बहुत अच्छे, या कहें बेहतरीन स्टॉक्स भारी डिस्काउंट पर मिल रहे हैं। अनुभवी निवेशक जानते हैं कि उन्हें क्या करना है

पिछले कुछ दशकों के दौरान जब से मैं इक्विटी मार्केट देख रहा हूं, तब से क़रीब पांच या छः बड़ी गिरावटों के दौर आए हैं। इनमें से हर दौर में, निवेशकों ने ऐसा माहौल बनाया है जैसे ‘आसमान फट पड़ा हो’। 90 के दशक में, मार्केट को लेकर इस तरह की घबराहट ट्रेड करने वालों की छोटी सी कम्यूनिटी तक सीमित हुआ करती थी। पर इंटरनेट के बाद, और अब सोशल मीडिया के दौर में आसमान ज़्यादा ज़ोर से, और ज़्यादा तेज़ी से, और ज़्यादा बड़ा हो कर फटने लगा है। आज, जब गिरावट साल 2000 या 2008-09 के आसपास भी नहीं है, तब भी इतनी हाय-तौबा लगातार मची है कि बाज़ार को लेकर निवेशकों की सोच बुरी तरह से प्रभावित है। इसके बावजूद, हर अनुभवी निवेशक जानता है कि गिरावट के इस दौर का असल मतलब क्या है।
बिना किसी अपवाद के कहा जा सकता है कि मार्केट की हर गिरावट या करेक्शन, ख़रीदने का बेहतरीन मौक़ा होता है। आज जो कुछ हो रहा है, वो इससे अलग नहीं है। आप इक्विटी में आई पिछली गिरावट के बारे में सोचिए, वो असल में गंभीर स्तर की गिरावट थी। साल 2020 के फ़रवरी महीने के बीच में, चीनी वायरस के क़हर के ठीक पहले, सेंसेक्स 41,000 पर था। फ़िलहाल ये 55,000 के आस-पास है। दो साल और एक तिमाही में ये शानदार 34 प्रतिशत बढ़ा है। और इसी दौरान, बरसों बाद ख़रीदने का एक शानदार मौक़ा भी आया! ये मौक़ा था जब पहली बार वायरस का ख़ौफ़ हर तरफ़ छाया हुआ था। सेंसेक्स तब, 30,000 के नीचे चला गया था। आप कहेंगे, “हां, पर किसमें इतनी हिम्मत और आत्मविश्वास था कि उस वक़्त ख़रीदता?” दरअसल, बहुत से लोगों ने ऐसा किया। साल 2020 में मार्च, अप्रैल और मई में हुए हर ट्रेड में, एक बेचने वाला था और एक ख़रीदने वाला। नहीं क्या? आखिर वो कौन थे जो ख़रीद रहे थे? वो दुनिया के सबसे स्मार्ट इन्वेस्टर थे। ज़रा सोचिए, दूसरों की घबराहट के चलते उन्होंने कितना ज़बर्दस्त फ़ायदा हासिल किया।
आज, मूड कुछ अलग है। आमतौर पर कहा जा रहा है कि आसानी से पैसा बनाने का समय चला गया है, और-बिज़नस और मार्केट दोनों में-लिक्विडिटी की समस्या बनी रहेगी। हो सकता है ये सही हो, या फिर ये ओवर-रिएक्शन भी हो सकता है, जो भी हो फ़िलहाल पक्के तौर पर कहना मुश्किल है। हालांकि, इस मसले पर एक इन्वेस्टर और एक एनेलिस्ट के तौर पर, मैं अपनी नींद ख़राब नहीं करूंगा। पर्सनली मेरा अपना, और वैल्यू रिसर्च में हमारा मक़सद है - इस मौक़ा का फ़ायदा उठाना, और इस मौक़े का फ़ायदा उठाने में दूसरों की मदद करना। एक पुरानी कहावत है, ख़रीदने का वही वक़्त है जब हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री हो (the time to buy is when there is blood on the streets). अगर मौजूदा गिरावट जारी रहती है या और गहरा जाती है, तो बाक़ी बातों को छोड़ कर आप इसे ही याद रखें।
‘इस बार बात अलग है’, ऐसा कहने वाली भीड़ के मुताबिक़, ग्लोबल मार्केट्स के टेक्नोलॉजी-बेस्ड स्टॉक्स पर ज़्यादा निर्भर होने से उतार-चढ़ाव बढ़ गए हैं और इसीलिए निवेशकों के लिए रिस्क भी ज़्यादा है। स्टॉक्स की तेज़ गिरावट का ज़िम्मेदार, ‘टेक’ को माना जा रहा है। पर मुश्किल ये है कि ऐसी कोई कैटेगरी ही नहीं है। मिसाल के तौर पर - एप्पल, नेटफ़्लिक्स, फ़ेसबुक और अमेज़न, या फिर पेटीएम या ज़ोमाटो के बीच कोई समानता नहीं है। इन सबको टेक क्यों कहलाना चाहिए? क्या इसलिए क्योंकि ये अपने बिज़नस में कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं? या इसलिए क्योंकि अपना सामान या सर्विस या फिर डिलिवरी के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं? आजकल, कौन ऐसा नहीं करता? सोचने का ये तरीक़ा ही बेमानी है और निवेशकों को भ्रम में डालने वाला है।
आपके और मेरे जैसे निवेशकों के लिए-जो इस मौक़े को भविष्य में फ़ायदा पाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं-मायने ये रखता है कि हम, हर कंपनी की जांच-परख अलग-अलग करें। हर छोटी बात मायने नहीं रखती, चाहे वो सेक्टर की हो या इंडिक्स की हो। पर हां, दूसरे नज़रिए से कहूं तो छोटी बातें भी मायने रखती हैं। आखिर यही बातें ख़रीदने के बेहतर मौक़े बनाती हैं।
अंत में एक निवेशक के तौर पर आपको तीन बुनियादी बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है, ये सिर्फ़ अभी के लिए नहीं, पर हमेशा के लिए है: टाईम, क्वालिटी और डाइवर्सिफ़िकेशन। बाक़ी सब कुछ ख़ुद-ब-ख़ुद ठीक हो जाएगा। याद रखिए, जो असल निवेशक हैं, वो ख़ुश हैं कि मार्केट नीचे हैं और हमें अच्छे शेयर, भारी डिस्काउंट पर ख़रीदने का मौक़ा मिल रहा है।

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