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बफ़ेट के क़ारोबारी सिद्धांत

किसी भी कंपनी में निवेश से पहले वॉरेन बफ़ेट तीन क़ारोबारी सिद्धांतों पर अपना हर निवेश चेक करते हैं और हमेशा उन पर क़ायम रहते हैं।

किसी भी कंपनी में निवेश से पहले वॉरेन बफ़ेट तीन क़ारोबारी सिद्धांतों पर अपना हर निवेश चेक करते हैं और हमेशा उन पर क़ायम रहते हैं।

निवेश को लेकर वॉरेन बफ़ेट के कुछ सिद्धांत हैं। वो चाहे किसी भी कंपनी में निवेश करें, पर अपने हर निवेश को इन्हीं सूत्रों की कसौटी पर परखना नहीं भूलते। रॉबर्ट जी. हैग्सट्रॉम ने अपनी क़िताब ‘द वॉरेन बफ़ेट वे’ (The Warren Buffett way) में बफ़ेट के इन्हीं सूत्रों को लिखा है। अलग-अलग कैटेगरी के ये 12 सूत्र हैं जिन्हें चार-पार्ट की इस सीरीज़ के ज़रिए, हम आप तक ला रहे हैं।


सरल और आसान

सरल और आसान होने का क्‍या मतलब है? क्‍या आपको सिर्फ़ आसान कंपनियों को निवेश के लिए चुनना चाहिए? नहीं, इसका मतलब है निवेशक को उस कंपनी के बारे में अच्‍छी समझ होनी चाहिए, जिसमें वो निवेश कर रहा है। इंडस्‍ट्री की नेचर, बिज़नेस मॉडल, रेवन्‍यू का ज़रिया, नियम-क़ानून, इसके अलावा ये देखना भी ज़रूरी है कि क्‍या कंपनी के पास प्राइसिंग पावर है, उसका कंपटीशन कितना तगड़ा है, रॉ-मटीरियल की स्थिति क्या है, वगैरह... वगैरह।
ये कुछ पहलू हैं, जिनका निवेशकों को अध्‍ययन करना चाहिए और इन्‍हें समझना चाहिए। बफ़ेट इस पर ज़ोर क्‍यों देते हैं? इसकी वज़ह है। हम कंपनी में लंबे समय के लिए निवेश करना चाहते हैं, ऐसे में कंपनी भविष्‍य में कहां होगी, इसका आकलन हम तभी कर सकते हैं जब हम कंपनी को अच्‍छी तरह से समझते हों। एप्‍पल में उनके देर से निवेश करने की यही वजह थी। कंपनी और इंडस्‍ट्री में क्‍या हो रहा है, ये जानने से उस कंपनी को समझने में मदद मिलती है।

कंपनी चलाने में निरंतरता

वॉरेन बफ़ेट ऐसी कंपनियों से परहेज़ करते हैं, जो मुश्किल क़ारोबारी समस्‍याएं सुलझा रही हैं या किसी नई दिशा में जा रही हैं। उनके मुताबिक़ ये दिखाता है कि ऐसी कंपनियां अभी जो कर रही है, वो काम नहीं कर रहा। वे उन कंपनियों को पसंद करते हैं जो एक ही प्रॉडक्‍ट या सर्विस बरसों से दे रही हैं। अगर किसी कंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड स्थिर है, सिर्फ तभी आप इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वो कंपनी कहां जा रही है। यही वजह है, बफ़ेट टर्न-अराउंड कंपनियों के प्रशंसक नहीं हैं। सटीक निवेश करने पर इस तरह की कंपनियां बड़े पैमाने पर पैसा बना सकती हैं, लेकिन यही ऐसी ही कंपनियां बहुत सा पैसा बरबाद करने वाली भी हो सकती हैं।


लंबे समय में बेहतर संभावनाएं

बफ़ेट कंपनियों को दो कैटेगरी में बांटते हैं। पहली, मज़बूत कंपनियों का एक छोटा समूह जिन्‍हे ‘फ्रैंचाइज़ी’ कहा जाता है। दूसरी, आम कंपनियों का बड़ा समूह, जो ख़रीदे जाने लायक़ नहीं हैं। फ्रैंचाइज़ी ऐसी कंपनी होती है, जो प्रॉडक्‍ट या सर्विस मुहैया कराती है:

1- जिनकी लोगों को ज़रूरत हो या जिनको लोग चाहते हैं।
2- जिनकी जगह दूसरा आसानी से नहीं ले सकता।
3- जो बहुत ज़्यादा नियम-क़ानूनों से बंधी नहीं हैं।

अगर किसी कंपनी में ये तीन सूत्रों नज़र आते हैं, तो ये कंपनी को ऊंची प्राइसिंग पावर देते हैं। और ऊंची प्राइसिंग पावर, कैपिटल पर औसत से ऊपर रिटर्न मिलता है। ये कंपनी के चारों तरफ़ एक सुरक्षा-खाई बनाता है, इसे बफ़ेट ‘मोट’ (Moat is a water channel around a castle to defend it against an attack) कहते हैं, जो कंपनी को प्रतिद्वंदियों पर बढ़त देता है। एक औसत दर्जे की कंपनी (Mediocre company) वो होती हैं, जो एक जैसे प्रॉडक्‍ट बनाती हैं। इनमें बहुत अंतर नहीं किया जा सकता। ऐसा तब होता है जब मुनाफ़ा कम और अनियमित हो।


ये लेख पहली बार जुलाई 12, 2022 को पब्लिश हुआ.

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