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मुफ़्त के पैसे का टाइम गया

इक्विटी निवेशकों को अनुमानों पर आधारित भविष्य के बारे में भूल कर वास्तविक और वर्तमान समय पर ध्यान देना चाहिए.

इक्विटी निवेशकों को अनुमानों पर आधारित भविष्य के बारे में भूल कर वास्तविक और वर्तमान समय पर ध्यान देना चाहिए.Illustration: Anand Kumar

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आमतौर पर साल के इस समय, लोग लिख रहे होते हैं कि बीता साल कैसा था और/या आने वाला साल कैसा होगा. पिछली जनवरी का एक लेख मुझे याद है जिसमें मैंने 2022 पर नज़र डाली थी और कहा था कि ये एक 'अच्छा बुरा साल' था. इस लेख में मेरा कहना था कि कागज़ पर, ऐसा लग रहा था कि ये एक बुरा साल होना चाहिए था, यूरोप में युद्ध, तेल की क़ीमतों का बढ़ना, चीन में कोविड को लेकर की गई कुछ मूर्खताएं जो अब याद नहीं आ रही हैं, जैसी तमाम बातें थीं. हालांकि, इन घटनाओं के बावजूद, ये निवेशकों के लिए एक बेहतर साल था. इसी हिसाब से, 2023 एक अच्छा साल था, तो औसत प्रत्यावर्तन के सिद्धांत (principle of mean reversion) के अनुसार, क्या अब हम एक बुरे साल, या शायद एक बुरे अच्छे साल में हैं? दरअसल इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

ज़्यादातर भविष्यवाणियां एक साल जितने छोटे से समय में बेकार हो जाती हैं, भले ही वे लंबे समय में अर्थपूर्ण लगें. इसी का एक दिलचस्प उदाहरण है. पिछले तीन साल में, अमेरिकी इक्विटी मार्केट में वॉल स्ट्रीट के प्रदर्शन का सर्व-सम्मत पूर्वानुमान 7%, 9% और 7% रहा है. और वास्तविक प्रदर्शन 27%, -19% और 24% था. क्या पूर्वानुमान हास्यास्पद रूप से ग़लत नहीं था? ये था, लेकिन असल में इसमें एक दिलचस्प बात है. तीन साल में कुल मिलाकर, पूर्वानुमान +25% था, और वास्तविक प्रदर्शन +28% था. इसलिए, जहां तीनों साल में से हरेक साल का पूर्वानुमान पूरी तरह से भ्रामक दिखाई दिया, वहीं असल में ग़लती पूर्वानुमान को वार्षिक रखने को लेकर रही, क्योंकि अगर ये तीन साल का पूर्वानुमान होता तो काफ़ी सटीक होता.

फिर भी, बड़े आर्थिक फ़ैक्टर्स में स्पष्ट रुझान होते हैं जो निवेशकों को प्रभावित कर सकते हैं, सबसे बड़ा फ़ैक्टर पैसे की लागत, यानी ब्याज दरें हैं. आम तौर पर, आर्थिक मामलों में आवाज़ उठाने वाला लगभग हर व्यक्ति ब्याज दरें कम चाहता है, लेकिन कुछ अपवाद भी हैं. कुछ दिन पहले, मेरे पसंदीदा निवेशक-लेखक, हॉवर्ड मार्क्स ने 'ईज़ी मनी' शीर्षक का एक बढ़िया नोट लिखा. आप शीर्षक पढ़ कर उम्मीद कर सकते हैं कि मार्क्स कम ब्याज दरों, और लिक्विडिटी के फ़्री फ़्लो के प्रशंसक नहीं है. उनका तर्क है कि ये नीतियां कम समय में आर्थिक विकास को प्रोत्साहित कर सकती हैं, लेकिन अक्सर मुद्रास्फ़ीति और एसेट बबल को जन्म देती हैं, जो लंबे समय के दौरान घातक असर डाल सकता है. मार्क्स बताते हैं कि हाल के वर्षों में बहुत ज़्यादा लिक्विडिटी के कारण कॉर्पोरेट क़र्ज़ (corporate debt) का स्तर अभूतपूर्व हो गया है और एसेट्स का ओवर-वैल्युएशन हो गया है, जिससे ब्याज दरें बढ़ने से बाज़ार के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है.

इस पत्र में एक दिलचस्प बात है जहां मार्क्स 'लॉन्ग स्टॉक' शब्द का इस्तेमाल करते हैं. यहां 'लॉन्ग' शब्द का मतलब वो नहीं है जो आमतौर पर इक्विटी निवेश में होता है, बल्कि इसका इस्तेमाल 'लॉन्ग बॉन्ड' के एनालॉग के तौर पर किया गया है. यहां वो कहते हैं: आसान-पैसा आने की स्थितियों में, लॉन्ग टर्म बॉन्ड ख़ासतौर पर से लुभावने लग सकते हैं... हालांकि, लॉन्ग बॉन्ड, शॉर्ट बांड की तुलना में रेट को लेकर ज़्यादा संवेदनशील होते हैं, जिसका मतलब है कि ब्याज दरों में दिए गए बदलाव के जवाब में उनकी क़ीमतें ज़्यादा बदलती हैं. और बाद में, मुझे ऐसा लगता है कि ब्याज दरें कम होने पर पूंजी का रुख़ अक्सर "लॉन्ग स्टॉक" की ओर एक जैसा होता है. इससे मेरा मतलब उन कंपनियों के शेयरों से है जिनके बारे में माना जाता है कि आने वाले कई साल के दौरान उनमें तेज़ बढ़ोतरी होगी. इन कंपनियों के लिए, परिभाषा के अनुसार, अधिक अनुमानित कैश फ़्लो दूर भविष्य में हैं. फिर भी, दरें कम होने पर निवेशक इन शेयरों की ओर ज़्यादा आकर्षित हो सकते हैं क्योंकि वो ज़्यादा रिटर्न चाहते हैं जो बड़ी तेज़ी लाएगा. इस कैश फ़्लो के लिए लंबे इंतज़ार के साथ कम ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट जुड़ी होती है... जिस तरह ब्याज दरों के बदलाव के जवाब में लॉन्ग बॉन्ड की क़ीमतों में ज़्यादा उतार-चढ़ाव होता है, उसी तरह तथाकथित "ग्रोथ स्टॉक" आमतौर पर आसान समय में दूसरों की तुलना में ज़्यादा बढ़ते हैं और इनमें पैसा खत्म होने पर अधिक गिरावट आती है.

ये एक सटीक मेल नहीं है, लेकिन इक्विटी निवेशकों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि क्या वो भविष्य की ग्रोथ से बहुत ज़्यादा प्रभावित हैं, ख़ासतौर पर जब वो ग्रोथ सस्ते पैसे के लगातार फ़्लो पर निर्भर करती है. उपभोक्ता उत्पादों और सेवाओं की तरह, मुफ़्त का समय ख़त्म हो गया है. पैसा--ख़ासकर समय के साथ पैसा--अब ज़्यादा मूल्यवान है, और भविष्य के लिए फ़ंड की जा रही हर चीज़ के असल मूल्य की बारीक़ी से जांच करनी होगी. मौजूदा समय में ये ज़्यादा महत्वपूर्ण है, ख़ासकर उन कंपनियों की प्रॉफ़िट कमाने की क्षमता को लेकर जिनमें आप निवेश करते हैं.

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