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बाज़ार को लेकर पूरे भरोसे से की गई भविष्यवाणियां अक्सर सबसे अहम बात समझने से चूक जाती हैं

बाज़ार को लेकर पूरे भरोसे से की गई भविष्यवाणियां अक्सर सबसे अहम बात समझने से चूक जाती हैंAditya Roy/AI-Generated Image

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कुछ दिन पहले X पर एक दिलचस्प बहस नज़र आई. एक अमेरिकी ट्रेडर ने बड़े यक़ीन के साथ एक थीसिस पोस्ट की: AI की वजह से TCS और Infosys जैसी भारतीय IT कंपनियों का रेवेन्यू घटेगा. यह चिंता ग़लत नहीं है. कई एनालिस्ट यह सवाल उठा चुके हैं. लेकिन फिर उसने इस तर्क को कई क़दम आगे खींच लिया.

उसकी दलील थी: IT रेवेन्यू घटेगा, तो भारत का करंट अकाउंट डेफ़िसिट उतना ही बढ़ जाएगा. डेफ़िसिट बढ़ेगा, तो रुपया कमज़ोर होगा. इसलिए असली ट्रेड यह है कि भारतीय रुपये को शॉर्ट करो. सुनने में यह तर्क की एक साफ़ और सुलझी हुई कड़ी लगती है.

दिक़्क़त यह थी कि जैसा कई लोगों ने बताया, यह कड़ी इस तरह काम नहीं करती. कमज़ोर रुपया भारतीय निर्यात को सस्ता और ज़्यादा प्रतिस्पर्धी बनाएगा, जिससे डेफ़िसिट घटने का रुझान होगा, न कि वह बिना रुके बढ़ता रहेगा. करेंसी और करंट अकाउंट सीधी लकीर में नहीं चलते. वे एक लूप में चलते हैं, एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए, क्योंकि सिस्टम लगातार ख़ुद को एडजस्ट और ठीक करता रहता है.

यह वाक़िया मुझे मज़ेदार भी लगा और सीख देने वाला भी, क्योंकि भारतीय रिटेल निवेशक ठीक यही ग़लती बार-बार करते हैं. एक तथ्य या ट्रेंड को पकड़कर उसे एक साफ़, बिना टूटी हुई रेखा में आगे खींचते चले जाना, जैसे सिस्टम में बाक़ी कुछ भी इस पर प्रतिक्रिया नहीं देगा, कोई एडजस्टमेंट नहीं होगी. जैसे कोई दूसरे या तीसरे क्रम का असर होगा ही नहीं.

यह हर जगह दिखता है.

किसी कंपनी की दो तिमाहियां कमज़ोर रहती हैं  और निवेशक नतीजा निकाल लेते हैं कि वह स्थायी रूप से डूब रही है. वो भूल जाते हैं कि मैनेजमेंट लागत घटा सकता है, स्ट्रैटेजी बदल सकती है, या किसी प्रतिद्वंद्वी की चूक का फ़ायदा उठा सकती है. कोई सेक्टर 18 महीने तेज़ी से बढ़ता है और अचानक सब मान लेते हैं कि यह तेज़ी अनंत काल तक चलती रहेगी. यह भूलते हुए कि ऊंचे रिटर्न नया कैपिटल खींचते हैं, प्रतिस्पर्धा बढ़ाते हैं और आख़िरकार मार्जिन दबाते हैं. तेल की क़ीमतें चढ़ती हैं और फ़ौरन यह आम राय बन जाती है कि महंगाई बेलगाम हो जाएगी और अर्थव्यवस्था रुक जाएगी. यह भूलते हुए कि ऊंची क़ीमतें मांग घटाती हैं, विकल्पों की तलाश बढ़ाती हैं और नीतिगत प्रतिक्रियाएं भी आती हैं.

एक ख़ास मिसाल बताता हूं जो मैंने ख़ुद देखी. 2022 की शुरुआत में एक पाठक ने पूछा कि क्या उसे अपने सारे इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड बेच देने चाहिए, क्योंकि महंगाई तेज़ी से बढ़ रही थी और फेड ने ब्याज दरें बढ़ाना शुरू कर दिया था. उनका तर्क था: ऊंची दरें मतलब शेयरों की वैल्यूएशन कम होगी, इसलिए बाज़ार गिरेगा, इसलिए अभी निकल जाओ और जब हालात सामान्य हों तो फिर निवेश करना. यह कड़ी सुनने में ठीक लगती थी. महंगाई असली थी. दरें बढ़ रही थीं. नतीजा अटल लग रहा था.

वह जो चूक गया: बाज़ार पर दरों में बढ़ोतरी का बड़ा असर पहले दिख चुका था. कंपनियां अपने बिज़नेस मॉडल एडजस्ट कर रही थीं. कुछ सेक्टरों को दरसल ऊंची दरों से फ़ायदा हुआ. और उसकी 'हालात सामान्य होने पर वापस आने' की योजना यह मानती थी कि वह एग्ज़िट और एंट्री दोनों की सही टाइमिंग कर लेगा, जो लगभग कोई नहीं कर पाता. दो साल बाद, उस दौर में निवेशित रहने वाला, बाहर निकलकर 'क्लैरिटी का इंतज़ार' करने वाले से काफ़ी आगे है.

हर मामले में, सोचने वाले ने एक असली तथ्य पहचाना, लेकिन फिर उसे सीधी लकीर में आगे खींचता रहा, बिना यह पूछे कि सबसे ज़रूरी सवाल क्या है: आगे क्या होगा?

यहीं पर फ़ीडबैक लूप की अवधारणा काम आती है. किसी भी आर्थिक सिस्टम में हर क्रिया एक प्रतिक्रिया पैदा करती है. क़ीमतें बदलती हैं. प्रतिद्वंद्वी जवाब देते हैं. रेगुलेटर दख़ल देते हैं. उपभोक्ता अपना व्यवहार बदलते हैं. सिस्टम कभी स्थिर नहीं रहता. जब कोई आपके सामने आत्मविश्वास के साथ परिणामों की एक कड़ी पेश करे (A से B होगा, B से C, और इसलिए D करो) तो सही प्रतिक्रिया तर्क की तारीफ़ करना नहीं है. सही काम है यह पूछना कि इस कड़ी में क्या छूट गया है.

लगभग हर बार जो छूटता है, वह है वापस का लूप. वह हिस्सा जहां C खुद उन हालात को बदल देता है, जिनकी वजह से शुरुआत में A हुआ था.

अमेरिकी ट्रेडर का एनालिसिस इसलिए ग़लत नहीं था कि उसके अलग-अलग तथ्य ग़लत थे. AI शायद IT रेवेन्यू को प्रभावित भी करे. रुपया और कमज़ोर भी हो सकता है. उसका एनालिसिस इसलिए ग़लत था क्योंकि उसने एक सेल्फ़-करेक्टिंग सिस्टम को एकतरफ़ा रास्ता मान लिया.

रिटेल निवेशकों के लिए व्यावहारिक सबक़ सीधा है. जब भी आप, या कोई और, एक तथ्य से शुरू होकर तीन-चार तार्किक क़दमों के ज़रिए किसी निवेश के निष्कर्ष तक पहुंचने वाली बात बनाए, तो रुकिए. ज़रा आलोचनात्मक नज़र से सोचिए. तर्क की कड़ी जितनी लंबी और साफ़-सुथरी लगे, उतना ही ज़्यादा मुमकिन है कि कोई ज़रूरी बात छूट गई हो.

बाज़ार में चीज़ें हमेशा सीधी और अनुमान के मुताबिक़ नहीं होतीं. वे जीते-जागते सिस्टम हैं, जिनमें अनगिनत लोग हैं जो एक ही ख़बर पढ़ रहे हैं और उसके जवाब में अपना व्यवहार बदल रहे हैं. भविष्य वर्तमान से खींची गई सीधी लकीर नहीं है. वह एडजस्टमेंट और प्रतिक्रियाओं की एक श्रृंखला है जिसे कोई भी तर्क की कड़ी, चाहे कितनी भी सुंदर हो, पूरी तरह नहीं भांप सकती.

सबसे अच्छे निवेश फ़ैसले किसी घटनाक्रम का अनुमान लगाने पर नहीं टिके होते. वे इस स्वीकार्यता पर टिके होते हैं कि वह घटनाक्रम कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर, ज़रूर बाधित होगा.

यह भी पढ़ेंः महान निवेशक का सिद्धांत

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