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आपकी जोखिम सहने की क्षमता कितनी है?

ज़्यादातर लोगों की जोखिम सहने की क्षमता असल में शून्य होती है. आप भले ही आर्थिक रूप से काफ़ी मज़बूत हों, फिर भी पैसा गंवाने का ख़याल आपको बर्दाश्त न हो. इसका हल है - टाइम-बेस्ड एसेट एलोकेशन अपनाना.

ज़्यादातर लोगों की जोखिम सहने की क्षमता असल में शून्य होती है. आप भले ही आर्थिक रूप से काफ़ी मज़बूत हों, फिर भी पैसा गंवाने का ख़याल आपको बर्दाश्त न हो. इसका हल है - टाइम-बेस्ड एसेट एलोकेशन अपनाना.Aditya Roy/AI-Generated Image

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कई साल पहले मुझे एक युवक का ईमेल मिला, जिसने क्विज़ गेम शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में अच्छी-ख़ासी रक़म जीती थी. जीती हुई रक़म शो के आख़िरी इनाम के क़रीब भी नहीं थी, लेकिन इस किशोर के लिए इतनी ज़रूर थी कि वो अपनी पसंद की पढ़ाई अच्छे से कर सके. उसने मुझसे इस बारे में बात करना चाहा कि शाहरुख़ ख़ान से जो पैसा मिला, उसे कैसे निवेश करे और सुरक्षित रखे.

उस लड़के से हुई बातचीत ने मेरी एक पुरानी सोच को और पक्का कर दिया - एक्सपर्ट का जादू, यानी यह पक्का भरोसा कि कोई बाहरी शख़्स सब कुछ जानता है, लोगों के निवेश के नज़रिए को बिगाड़ रहा है - ख़ासकर उन लोगों का जो बुद्धिमान हैं. एक ख़याल काफ़ी आम है - कि कुछ निवेश हमेशा अच्छे होते हैं, एक्सपर्ट्स को पता होता है वो कौन से हैं. बस किसी एक्सपर्ट से पूछना है और काम हो जाएगा.

यह बड़ा आसान लगता है, लेकिन सच नहीं है. असली सवाल "कौन सा निवेश अच्छा है?" नहीं, बल्कि "मेरे लिए कौन सा निवेश अच्छा है?" है. यह बात साफ़ और स्पष्ट लगती है, लेकिन असल में इसे बस ज़बानी तौर पर माना जाता है. कोई निवेश सबके लिए अच्छा नहीं होता. उस सवाल का सबसे ज़रूरी हिस्सा है 'मेरे लिए'.

लेकिन आपकी कौन सी बात तय करती है कि कौन सा निवेश आपके लिए सही है? आमतौर पर इसमें सबसे बड़ी भूमिका जोखिम सहनशीलता (risk tolerance) की होती है - और उसी के आधार पर फ़ाइनेंशियल प्लानर तय करता है कि आपको किस तरह का निवेश चाहिए. लेकिन यह धारणा ही ग़लत है. ज़्यादातर लोगों की जोखिम सहने की क्षमता असल में शून्य होती है - और जितना कम अनुभव हो, उतना ज़्यादा डर होता है. थोड़ा भी नुक़सान होते ही निवेशक भाग खड़ा होता है. वजह यह है कि पारंपरिक फ़ाइनेंशियल प्लानिंग सिर्फ़ आर्थिक जोखिम सहनशीलता नापती है, जबकि ज़रूरत है मानसिक जोखिम सहनशीलता की. आप भले ही आर्थिक रूप से मज़बूत हों, फिर भी किसी निवेश में घाटे का ख़याल बर्दाश्त नहीं होता.

इसका हल है टाइम-बेस्ड एसेट एलोकेशन और लगातार रिबैलेंसिंग. तरीक़ा यह है कि अपने निवेश को अलग-अलग समय-सीमाओं के हिसाब से पोर्टफ़ोलियो में बांटें और हर पोर्टफ़ोलियो में उसी हिसाब से जोखिम चुनें - आपके पास जितना ज़्यादा वक़्त है, उतना ज़्यादा जोखिम उठाया जा सकता है. साथ ही, यह एलोकेशन साल में कम से कम एक बार रिबैलेंस ज़रूर करें. इससे आप अपने आप ऊंचे दाम पर मुनाफ़ा बुक करते रहेंगे और कम दाम पर निवेश भी.

एक आदत जो हम में से ज़्यादातर को घबराहट की तरफ़ ले जाती है, वो है हर निवेश को अलग-अलग देखने की. इक्विटी में थोड़ा और डेट में थोड़ा लगाने का कोई फ़ायदा नहीं, अगर आप दोनों से हमेशा अलग-अलग मुनाफ़े की उम्मीद लगाए बैठे हैं. यह एक पोर्टफ़ोलियो है - और डेट का हिस्सा इसलिए है ताकि जब इक्विटी गिर रही हो, तो थोड़ी स्थिरता बनी रहे.

एक बात और - भले ही कोई निवेश सबके लिए अच्छा न हो, लेकिन हर निवेश ख़राब भी नहीं होता. अगर आप मुझसे पूछें कि ऐसे कौन से निवेश हैं जो किसी को भी नहीं करने चाहिए, तो मैं बिना ज़्यादा सोचे एक लंबी फ़ेहरिस्त बना सकता हूं. मैं सोचता हूं, इसमें भी कोई सबक़ छिपा है.

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