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कम ख़बरें निवेश के लिए अच्छी हैं!

जो निवेशक वित्तीय ख़बरों पर हद से ज़्यादा नज़र रखते हैं, वे अक्सर ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया देकर ख़ुद का नुकसान करते हैं. ख़बरें छोटी अवधि की होती हैं, जिन्हें निवेशकों को ज़्यादातर नज़रअंदाज़ करना चाहिए

less-news-is-good-newsAditya Roy/AI-Generated Image

साल 2008 में हमने एक नया शब्द सीखा था - 'सबप्राइम'. और इसके साथ यह भी जाना कि इस शब्द ने भारतीय शेयर बाज़ार में किस तरह बड़ी गिरावट लाई. अमेरिका में हाउसिंग लोन का कारोबार कैसे चलता था या नहीं चलता था, यह भी ज़रूरत से ज़्यादा जान लिया. शेयरों की क़ीमतें जब धड़ाम हुईं, तो हमें दुनिया के आपसी जुड़ाव का सीधा अनुभव हुआ. फिर पार्टिसिपेटरी नोट्स और FII के पैसे हमारे कैपिटल मार्केट में आने का तरीक़ा भी समझ आया.

आज भी चिंता कई निवेशकों के लिए जैसे एक स्थायी आदत बन गई है. ऐसा लगता है जैसे शेयरों में निवेश करना किसी बम-निरोधक दस्ते में काम करने जैसा हो गया है - पता नहीं कब कोई नई और अनचाही मुसीबत फट पड़े. हर तरह और हर आकार के निवेशक लगातार घबराहट में जी रहे हैं. शेयरों की क़ीमतें और इंडेक्स हर छोटी-बड़ी ख़बर पर ज़रूरत से कहीं ज़्यादा ऊपर-नीचे होते दिखते हैं.

शेयर बाज़ार की इस अति-संवेदनशीलता के कई कारण हैं, लेकिन जो डर निवेशकों में बना रहता है, वह सीधे तौर पर फ़ाइनेंशियल मीडिया पर उनकी निर्भरता से जुड़ा है. यह बात ख़ासकर उन लोगों के लिए सही है, जो बिज़नेस TV चैनलों से चिपके रहते हैं.

2008 की घटनाओं को देखें तो साफ़ लगता है कि पार्टिसिपेटरी नोट्स के मामले ने डर, संदेह और उठापटक पैदा की. यह प्रतिक्रिया इस बात से आई कि जब SEBI ने अपने ड्राफ्ट नियम जारी किए, उसी दिन मीडिया ने किस तरह इसे पेश किया. ऐलान होते ही, लगभग तुरंत, तबाही की भविष्यवाणियों वाले TV शो आ गए जिन्होंने यह नतीजा निकाल दिया कि बस, शेयर बाज़ार का अब अंत हो गया. यह क़यामती सुर रात भर चलता रहा और जब अगली सुबह बाज़ार खुलने का वक़्त आया तो सबको पक्का यक़ीन हो गया था कि खुलते ही ज़बरदस्त गिरावट आएगी.

मैं यह नहीं कह रहा कि TV कवरेज ने गिरावट लाई, लेकिन इसने उस "पहले रिएक्ट करो, बाद में सोचो - या सोचो ही मत" वाली सोच को ज़रूर पुख़्ता किया, जो TV से शेयर बाज़ार की समझ लेने वाले निवेशकों में घर कर जाती है. मुझे लगता है कि असली समस्या TV पर शेयर बाज़ार की कवरेज के तरीक़े में ही है. यह मैं इसलिए समझ पाता हूं क्योंकि कभी-कभी मैं भी इस जाल में फंस जाता हूं. TV न्यूज़ की बनावट ही ऐसी है कि वह छोटी अवधि की, सुर्ख़ियों के क़ाबिल घटनाओं और उनके असर को ही अहम मानती है. और चूंकि TV एक बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचता है, इसका छिपा हुआ संदेश यही होता है कि ये छोटी अवधि की घटनाएं सभी निवेशकों के लिए मायने रखती हैं - और अगर आप निवेशक हैं तो हर मिनट ख़बर से चिपके रहिए और किसी भी वक़्त रिएक्ट करने को तैयार रहिए.

सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है. मेरे काम की वजह से मुझे बहुत से लोगों की निवेश से जुड़ी परेशानियों से रूबरू होने का मौक़ा मिला है, और मैं जानता हूं कि ऐसी ज़्यादातर परेशानियां महीनों और सालों में लिए गए फ़ैसलों से पैदा होती हैं. इन्हें सुलझाने के लिए भी ऐसे क़दम चाहिए जो लंबे वक़्त तक लगातार उठाए जाएं.

TV न्यूज़ एंकर की लगातार जोरदार आवाज़ से मत भटकिए - एक अच्छे निवेशक की पहचान रफ़्तार नहीं, बल्कि सोच-समझकर और संयम से क़दम उठाना है. TV न्यूज़ न देखना अब एक समझदार निवेशक की बुनियादी ज़रूरत बनती जा रही है.

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