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Tata Motors: असल अपसाइकिल, लेकिन इस बदलाव की कामयाबी अभी साबित नहीं हुई

टाटा के बहुचर्चित नॉन-साइक्लिकल बिज़नेस को अभी आंकड़ों में ख़ुद को साबित करना है

टाटा के बहुचर्चित नॉन-साइक्लिकल बिज़नेस को अभी आंकड़ों में ख़ुद को साबित करना हैVinayak Pathak/AI-Generated Image

सारांशः Tata Motors का कमर्शियल व्हीकल बिज़नेस एक मज़बूत अपसाइकिल (उछाल) पर सवार है और मैनेजमेंट इसके पीछे चुपचाप चल रही एक और कहानी की तारीफ़ कर रहा है. लेकिन क्या डेटा इस बड़े दावे का समर्थन करता है, या एक कहानी निवेश के योग्य है और बाक़ी सब सिर्फ़ प्रचार है? हम यहां उस एक नंबर की पड़ताल कर रहे हैं जो सब कुछ तय करता है.

Tata Motors का कमर्शियल व्हीकल (CV) बिज़नेस इस वक़्त अच्छे दौर में है और यह उत्साह साफ़ तौर पर ऊपर तक पहुंच चुका है. मैनेजमेंट का कहना है कि साइक्लिकल बिज़नेस के नीचे एक नॉन-साइकलिकल बिज़नेस चुपचाप बन रहा है, जो साइकिल पलटने पर कंपनी को बेहतर तरीक़े से संभाल सकेगा. इरादा तो सही है. लेकिन पेच यह है कि तीन साल के रेवेन्यू का डेटा हालात के जस के तस होने की ओर संकेत करता है.

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के डेटा के मुताबिक़, फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में CV की रिटेल बिक्री 11.7 प्रतिशत बढ़ी और पहली बार 10 लाख यूनिट का आंकड़ा पार हुआ. यह बढ़त सभी सेगमेंट में दिखी: लाइट CV में 12.5 प्रतिशत, मीडियम CV में क़रीब 23 प्रतिशत और हेवी CV में लगभग 8 प्रतिशत. FADA के जनवरी के आंकड़े 15.1 प्रतिशत CV ग्रोथ की तरफ़ इशारा करते हैं, जिसमें बेहतर फ्रेट सेंटिमेंट और रिप्लेसमेंट-आधारित ख़रीद का हाथ रहा.

Tata Motors को इस सबका सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ है. यह अभी भी भारत की सबसे बड़ा CV मेकर है और फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में साइकिल इसके हक़ में मुड़ी. स्टैंडअलोन होलसेल 14 प्रतिशत चढ़ा, रेवेन्यू 11 प्रतिशत बढ़ा और EBITDA (अर्निंग्स बिफ़ोर इंटरेस्ट, टैक्स, डेप्रिशिएशन एंड अमॉर्टाइज़ेशन) मार्जिन 12 प्रतिशत से बढ़कर 13.2 प्रतिशत हो गया. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में पूरी इंडस्ट्री का वॉल्यूम 12.5 प्रतिशत बढ़ा, जबकि Tata Motors ने 11.6 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की.

बड़ा दावा

अकेला उछाल वह कहानी नहीं है जो मैनेजमेंट सुनाना चाहता है. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 की चौथी तिमाही की कॉल पर CFO जी वी रमणन ने कहा कि नॉन-साइक्लिकल रेवेन्यू, साइक्लिकल बिज़नेस की रफ़्तार से 2.7 गुना तेज़ी से बढ़ रहा है. साथ दी गई प्रेज़ेंटेशन में बताया गया कि फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में नॉन-साइक्लिकल ग्रोथ, साइक्लिकल ग्रोथ से 1.6 गुना ज़्यादा रही.

तो 'नॉन-साइक्लिकल' में क्या आता है? यह वो लाइफ़साइकल इकोसिस्टम है जो गाड़ी बिकने के बाद उसके इर्द-गिर्द बनता है. एक ट्रक फ़ैक्ट्री से निकलने के काफ़ी बाद तक रेवेन्यू देता रहता है. उसे स्पेयर पार्ट्स, सर्विसिंग, फ्लुइड्स, डायग्नोस्टिक्स, फ्लीट मेंटेनेंस, रीसेल सपोर्ट, रिमैन्युफ़ैक्चरिंग और आख़िरकार स्क्रैपेज की ज़रूरत पड़ती है.

टाटा इस लाइफ़साइकिल का ज़्यादा हिस्सा पाने के लिए फ्लीट एज (कनेक्टेड-व्हीकल प्लैटफ़ॉर्म), फ्लीट वर्स (डिजिटल कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म), टाटा ओके (यूज़्ड व्हीकल), प्रोलाइफ़ (रिमैन्युफ़ैक्चर्ड एग्रीगेट), Re.Wi.Re (व्हीकल स्क्रैपेज), स्मार्ट सिटी मोबिलिटी (e-bus ऑपरेशन) और पार्ट्स-एंड-सर्विसेज़ बिज़नेस का सहारा ले रही है. एनुअल रिपोर्ट में डाउनस्ट्रीम ग्रोथ का श्रेय गहरी स्पेयर्स और सर्विस पेनेट्रेशन को दिया गया है, और कहा गया है कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की पहुंच जेन्युइन पार्ट्स, ऑटोमोटिव फ्लुइड्स और फ्लीट मैनेजमेंट में और बढ़ी है.

तर्क तो ठीक है. लेकिन आंकड़े कुछ और ही बताते हैं.

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जो नंबर ग़ायब है

Tata Motors अपने नॉन-साइक्लिकल बकेट का रेवेन्यू या मार्जिन अलग से नहीं बताती. इसका सबसे क़रीबी और मापा जा सकने वाला विकल्प है, स्पेयर पार्ट्स और सर्विसेज़. फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में स्टैंडअलोन स्पेयर पार्ट्स रेवेन्यू ₹7,859 करोड़ और सर्विस रेवेन्यू ₹1,250 करोड़ रहा. मिलाकर यह ₹9,109 करोड़ बना, जो स्टैंडअलोन रेवेन्यू का 11.8 प्रतिशत है. अकेले स्पेयर पार्ट्स की हिस्सेदारी 10.2 प्रतिशत रही.

यह मायने रखता है, लेकिन यह कोई बड़ा बदलाव नहीं है. डिमर्जर से पहले के आंकड़े फ़ाइनेंशियल ईयर 26 की स्टैंडअलोन कंपनी से पूरी तरह मेल नहीं खाते, फिर भी दिशा समझने के लिए काम आते हैं. फ़ाइनेंशियल ईयर 23 में CV रेवेन्यू में प्रमुख स्पेयर्स और सर्विसेज़ की हिस्सेदारी 12.8 प्रतिशत, फ़ाइनेंशियल ईयर 24 में 13.3 प्रतिशत और फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में 12.7 प्रतिशत रही. मैनेजमेंट का तेज़ ग्रोथ वाला दावा सही भी हो सकता है और उसकी अंदरूनी परिभाषा स्पेयर्स और सर्विसेज़ से आगे भी जाती हो, लेकिन जो नज़र आ रहा है, वह लगातार तीन साल से रेवेन्यू के 12-13 प्रतिशत के आसपास ही टिका है.

कहानी में यही नंबर ग़ायब है.

इस पूल को असल में अहम बनाने के लिए तीन चीज़ों को एक साथ देखना होगा. रेवेन्यू शेयर बढ़ना चाहिए. वारंटी खत्म होने के बाद टाटा को ज़्यादा गाड़ियों को अपने ऑथराइज़्ड पार्ट्स-एंड-सर्विस इकोसिस्टम में रोकना होगा. साथ में, डाउनस्ट्रीम मार्जिन, कोर व्हीकल बिज़नेस के मार्जिन से काफ़ी ज़्यादा होने चाहिए. जब तक टाटा रेवेन्यू, मार्जिन, पेड डिजिटल यूज़र्स, सर्विस रिटेंशन और जेन्युइन-स्पेयर्स कैप्चर के नंबर सामने नहीं रखती, निवेशक इस पूल को CV इकोनॉमिक्स बदलने वाला नहीं, बल्कि सिर्फ़ किनारे पर थोड़ी मदद करने वाला मान सकते हैं.

भीड़ से भरा आफ़्टरमार्केट

प्रतिस्पर्धा इस चुनौती को और बड़ा कर देती है. ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) के मुताबिक़, भारत का ऑटोमोटिव आफ़्टरमार्केट फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में क़रीब ₹99,948 करोड़ का था और 6 प्रतिशत बढ़ा. लेकिन यह पूरा पैसा सिर्फ़ CV का नहीं है और OEMs को यह अपने आप नहीं मिल जाता. आफ़्टरमार्केट डिस्ट्रीब्यूटर्स, रिटेलर्स, गैराज, मैकेनिक, सर्विस प्रोवाइडर्स और कंपोनेंट मेकर्स के ज़रिए चलता है.

डिजिटल कहानी को भी ज़मीनी हक़ीक़त की उतनी ही ज़रूरत है. फ्लीट एज 10 लाख कनेक्टेड व्हीकल का आंकड़ा पार कर चुका है और पहली से चौथी तिमाही के बीच सब्सक्रिप्शन रिन्युअल क़रीब दोगुने हो गए. लेकिन इस मामले में टाटा अकेली नहीं है. आयशर के पास माई आयशर (My Eicher) और अपटाइम सेंटर (Uptime Centre) है, जहां 1.1 लाख से ज़्यादा कनेक्टेड व्हीकल रिमोटली मॉनिटर होते हैं और 98 प्रतिशत से ज़्यादा समस्याएं चार घंटे में सुलझ जाती हैं. अशोक लेलैंड के पास आईअलर्ट (iAlert), एएल केयर (AL Care), ले कार्ट (LeyKart) और अपटाइम सॉल्युशन सेंटर (Uptime Solution Centre) है. वॉल्वो के पास वॉल्वो कनेक्ट (Volvo Connect) है.

तो 'फ्लीट सॉफ़्टवेयर' अपने आप में कोई खाई नहीं है. असली खाई, अगर बनती है, तो इंटिग्रेशन से बनेगी, जब टाटा का बड़ा फ्लीट बेस, हेवी-CV में ताक़त, कनेक्टेड-व्हीकल स्केल, सर्विस की पहुंच, यूज़्ड-व्हीकल प्लेटफ़ॉर्म और रिमैन्युफ़ैक्चरिंग-एंड-स्क्रैपेज नेटवर्क, सब एक ही दिशा में जाते हुए नज़र आएंगे.

पुरानी कहानी, नए आंकड़ों का इंतज़ार

स्ट्रैटेजी को ख़ारिज करना ग़लत होगा. टाटा सच में एक लाइफ़साइकल फ्लाईव्हील बनाने की कोशिश कर रही है: गाड़ी बेचो, उसे कनेक्ट करो, मॉनिटर करो, सर्विस करो, जेन्युइन पार्ट्स और फ्लुइड्स सप्लाई करो, उसे दोबारा बेचो, एग्रीगेट रिमैन्युफ़ैक्चर करो और अंत में स्क्रैप करो.

लेकिन यह कोई नया बदलाव नहीं है. टाटा कई सालों से सर्विसेज़, कनेक्टेड व्हीकल और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म फैला रही है, और नॉन-साइक्लिकल की कहानी उतने ही समय से मैनेजमेंट की बात में चल रही है. जो नहीं बदला वह है रेवेन्यू का शेयर. फ़ाइनेंशियल ईयर 23 से 26 तक स्पेयर पार्ट्स और सर्विसेज़ CV रेवेन्यू के 12-13 प्रतिशत के आसपास ही टिके रहे. सालों के तेज़ ग्रोथ के दावों से दिखने वाली सुई नहीं हिली.

कुशनिंग का गणित भी आसान नहीं है. जो सेगमेंट रेवेन्यू का क़रीब 12 प्रतिशत लाता है, वह बाक़ी 88 प्रतिशत के धीमे पड़ने पर उसकी मार ज़्यादा नहीं झेल सकता. डाउनसाइकिल में असली स्टेबलाइज़र बनने के लिए इसका रेवेन्यू शेयर क़रीब दोगुना होना चाहिए और जिस रफ़्तार से नंबर बढ़ रहे हैं, ऐसा जल्द होने वाला नहीं लगता.

इसलिए निवेशकों को दोनों कहानियों को अलग रखना चाहिए. वॉल्यूम, रेवेन्यू और मार्जिन में असली बढ़त के साथ, Tata Motors CV एक असली अपसाइकिल में है. इसके लिए क़ीमत चुकाना ठीक है. नॉन-साइक्लिकल बदलाव एक ज़ाहिर की गई मंशा है, जो अभी तक साबित हुआ बदलाव नहीं. जब तक रेवेन्यू शेयर नहीं बढ़ता, मार्जिन सामने नहीं आते और आफ़्टरमार्केट की पकड़ मज़बूत नहीं होती, इसे क़ीमत में शामिल करने की कोई वजह नहीं है. साइकिल में निवेश किया जा सकता है. बदलाव को अभी भी हासिल करना बाक़ी है.

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