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एक कहावत है (या शायद किसी कविता की पंक्ति) कि अच्छी बाड़ें अच्छे पड़ोसी बनाती हैं. यानी जब आपके और आपके पड़ोसी की ज़मीन के बीच की बाड़ मज़बूत और ऊंची हो, तो आपस में रिश्ते बेहतर रहते हैं. कुछ ग़लत होने पर एक-दूसरे पर शक करने की नौबत नहीं आती. इस कहावत का मतलब यह है कि अगर थोड़े अविश्वास को ही सिस्टम में बुन दिया जाए, तो चीज़ें बेहतर तरीक़े से चलती हैं और रिश्तों में भरोसा भी ज़्यादा होता है. ख़ास बात यह है कि यह अविश्वास सिस्टम का हिस्सा हो. किसी को यह तय नहीं करना पड़ता कि कोई ख़ास पड़ोसी भरोसेमंद है या नहीं. और किसी एक को अकेले बाड़ से बाहर रखने की शर्मिंदगी भी नहीं उठानी पड़ती.
इस नज़रिए से देखें तो एक सार्वभौमिक, सब पर लागू होने वाला अविश्वास ही ईमानदार और भरोसेमंद रिश्तों की बेहतर बुनियाद है. आप समझ ही गए होंगे कि मैं कहां जा रहा हूं. मेरा मानना है कि भारत के फ़ाइनेंशियल इंडस्ट्री में अविश्वास पर्याप्त नहीं है. आम लोगों और कंपनियों के बीच के लेन-देन में सिस्टम में बहुत ज़्यादा अविश्वास बुना जाना चाहिए. और जब सिस्टम यह काम न करे, तो हमें ख़ुद अपने व्यवहार में इसे शामिल करना होगा.
यह सिस्टम में बना हुआ अविश्वास एक बुनियादी सच्चाई को मानने से काम करता है: कि व्यक्ति हो या कारोबार, सब किसी और के नहीं बल्कि हमेशा अपने हित में काम करते हैं. जब उनका हित ग्राहक के हित से मेल खाता है, तभी वे ग्राहक के लिए काम करेंगे. लेकिन किसी तीसरे पक्ष के हित में काम करने का कोई सवाल ही नहीं उठता. यही चीज़ों का स्वाभाविक क्रम है, यही हमेशा से होता आया है. और अगर आप यह मानकर चलें कि ऐसा नहीं है, तो एक ग्राहक के तौर पर आपको नुक़सान उठाना पड़ेगा.
चलिए, IPO की क़ीमत तय करने की मिसाल को लेते हैं. आख़िर कोई यह क्यों सोचे कि प्रमोटर्स या उनके सलाहकार बाज़ार में जितनी रक़म वसूल हो सकती है, उतनी वसूलने से बाज़ आएंगे? वे दूसरों के लिए कुछ गुंजाइश क्यों छोड़ेंगे? निवेशक के तौर पर शुरू से यही मानकर चलें और फ़ैसले उसी के मुताबिक़ करें. यही सिद्धांत दूसरे फ़ाइनेंशियल लेन-देन पर भी लागू करें. बैंक, स्टॉकब्रोकर, म्यूचुअल फ़ंड सेल्समैन, इंश्योरेंस एजेंट, क्रेडिट कार्ड कंपनी के मामले में भी ऐसा ही है. अगर आप सामने वाले की दी हुई जानकारी के आधार पर कोई फ़ैसला ले रहे हैं, तो यह मान लेना सही है कि वह जानकारी उनके फ़ायदे के लिए तैयार की गई है, आपके लिए नहीं. मुझे पता है कि सिद्धांत में कहा जाता है कि उनका हित ग्राहक के हित से जुड़ा होता है, लेकिन यह सिर्फ़ सिद्धांत है, व्यवहार में ऐसा नहीं होता. जैसा कि महान निवेशक वॉरेन बफ़े ने कहा था: "नाई से कभी मत पूछो कि क्या तुम्हें बाल कटवाने की ज़रूरत है."
लेकिन ये वो बाड़ें हैं जो आप निजी तौर पर खड़ी कर सकते हैं. व्यापक स्तर पर, हमारे सिस्टम में शायद पर्याप्त अविश्वास नहीं बुना गया है. कई अनकही मान्यताएं हैं कि बाज़ार की ताक़तें उन लोगों को सबक सिखा देंगी जो ग्राहकों या निवेशकों के साथ ग़लत करते हैं. मुझे नहीं लगता कि यह उतनी अच्छी तरह काम कर रहा है, जितना करना चाहिए. ऐसा तंत्र लंबी अवधि में काम करता है. लेकिन एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में, ग्राहकों और निवेशकों की नई-नई खेप को ठगते रहने की काफ़ी गुंजाइश होती है और लंबी अवधि की चिंता नहीं करनी पड़ती.
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